त्योहारों के इस मौसम में गुलाबी सर्दी की आहट करीब से महसूस होती है। महाराष्ट्र में स्थित फलटण भी इन दिनों स्लेटी शॉल ओढ़े हुए है। इस छोटी सी नगरी में पेशवाओं के इतिहास और रंग-बिरंगी संस्कृति की खूबसूरत झलकियां देखने को मिलती हैं। पुणे से 100 किमी की दूरी पर स्थित फलटण मराठा पेशवाओं की राजधानी रही है। सबसे खास बात जो इस जगह की है वो है कि यह कस्बा महाराष्ट्र के सबसे कम प्रदूषित इलाकों में अव्वल है।खूबसूरती के साथ-साथ ये जगह एक इतिहास भी समेटे हुए है। वैसे महाराष्ट्र की ज्यादातर चीज़ें शिवाजी महाराज से जुड़ी हुई हैं। किले हों या महल, उनकी छाप हर एक जगह नज़र आती है। पराक्रम, कला और बेजोड़ता महज उनके व्यक्तित्व तक ही सीमित नहीं थी। उसकी मिसाल आपको शहर और इनमें रची-बसी चीज़ों में भी नज़र आएगा। 

राजवाड़ा मुधोजी मनमोहन पैलेस का मनभावन स्थापत्य

फलटण की गलियों से होते हुए खेतों की तरफ़ जाते हुए बीच रास्ते में राजवाड़ा पड़ता है। यह साल 1861 में तैयार हुआ था। इसे देखते ही नजर मानो ठहर जाती है और आंखें महल के कंगूरों पर जाकर अटक जाती हैं। ब्रिटिश काल के समय के इस महल का वास्तुशिल्प दो अलग हाथों का है। एक विदेशी और एक स्वदेशी। दो अलग हाथों की छाप लिए इस महल की आंतरिक सज्जा में सागवान लकड़ी की नक्काशी का काम बहुत महीन और नफीस है। इसकी छत से टंगे रंगीन कांच के बड़े-बड़े झाड़-फानूस महल की शोभा में चार चांद लगा देते हैं। खालिस चांदी का जड़ाऊ झूला और सोफा-सेट की रुपहली चमक बिजली की कौंध बन उतर आती है आंखों में। यह राजवाड़ा स्थापत्य शिल्प का अनूठा नमूना है इतिहास में। हिंदी और मराठी फिल्मों की शूटिंग यहां अक्सर होती रहती है। 'खट्टा-मीठा' फिल्म में आप इस महल की झांकी देख सकते हैं। महल के प्रवेश द्वार पर सिंहों की जोड़ी अपने गर्जन के साथ स्थापित है, जो सुनाती है गाथा पुरातन काल की। मुख्य द्वार मराठवाड़ा पद्धति से बना है। धरती पर खड़ी यह भव्य अट्टालिका आसमानी सफेद रंगों के सुंदर संयोजन से बनी आकाश को स्पर्श करती रहती है। 

Posted By: Priyanka Singh