मैसूर से करीब 60 किमी. की दूरी पर एक ऐसे गांव की यात्रा पर हम निकले जो दक्षिण कर्नाटक की गोद में प्राकृतिक सौंदर्य और पौराणिक स्थलों को सहेजे व समेटे हुए है। समुद्र तल से करीब 3000 मीटर की उंचाई पर बसे श्रेष्ठ दुर्ग मेलूकोटे को यहां का हिल स्टेशन भी कहा जाता है। मेलूकोटे एक कन्नड़ शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है श्रेष्ठ दुर्ग। लेकिन मेलूकोटे शब्द बिगड़ते-बिगड़ते मेलकोटे में तब्दील हो गया है, इसलिए मेलकोटे ज्यादा चलन में है। गांव के दुर्ग की दीवारें तो ढह गई हैं, लेकिन दुर्ग के अंदर कई धरोहरें अब भी स्वर्णिम समय की गवाही देते नजर आते हैं। धार्मिक पर्यटकों और संस्कृत अकादमी होने के कारण संस्कृत स्कॉलर के बीच मशहूर रहा मेलूकोटे पर बॉलीवुड की भी नजरें इनायत हैं। इसलिए मैसूर के भव्य पैलेस देखने के बाद मेरे कदम मेलकोटे गांव की तरफ चल पड़े। मैसूर से करीब एक घंटे की दूरी के बीच टैक्सी ड्राइवर साहब से कुछ जानकारियां जुटाई जो दिलचस्प है। ड्राइवर नागी बताते हैं कि इस गांव में अक्षय कुमार की भूलभुल्लैया फिल्म की शूटिंग हुई। गांव का पौराणिक और ऐतिहासिक लुक होने के कारण यहां पीरियड फिल्में शूट किए जा रहे हैं। 

 

108 तलाबों वाला गांव 

सबसे खास यहां की राजबीथी यानी राजपथ है, जहां पर डेढ़ सौ साल पुराने करीब 70-80 घर हैं। जिसमें मंदिरों के पुरोहित लोग रहते हैं। ऐसी ही एक सड़क कन्नीगलबीथी है, जिसमें पंडित लोग रहते हैं। हमारे साथ आए संस्कृत के स्कॉलर डॉ. दिलीप कर बताते हैं गांव में छोटे बड़े तालाब मिलाकर करीब 108 तालाब हैं, इनमें से तो कुछ सीढीनुमा भी हैं। सभी तालाबों के बनने की कहानी भी दिलचस्प है। जैसे आका तंगी कोला यानी बड़ी बहन और छोटी बहन का तालाब। कहा जाता है कि गांव में दो बहनें थी। उसके नाम पर उनके पिताजी ने तालाब बनवाया, लेकिन दोनों की प्रकृति और कर्म के आधार पर इन तालाबों की सीरत तय हुई। स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार बड़ी बहन के कर्म पाप से भरे हुए थे इसलिए इस तालाब का पानी दूषित रह गया और छोटी बहन के कर्म अच्छे रहे, इसलिए तालाब का पानी पीने योग्य है। आज भी गांव के लोग पीने का पानी यही से पीते हैं।

पहाड़ियों के बीच बसा गांव

इन किस्से कहानियों के दिलचस्प दौर के बीच हमारी गाड़ी मेलकोटे गांव में पहुंची। रास्ते भर खेत- खलिहान, गांव-देहात पीछे छूटते जाते नजारों के बीच उन कहानियों से मेलूकोटे गांव की कुछ तस्वीर भी जहन में उकर गईं थी, लेकिन गांव का सौंदर्य जहनी तस्वीर से कहीं ज्यादा उम्दा और रूह को छू लेने वाली है। मौसम भी खुशगवार रहने के साथ यहां प्रकृति ने अपना बेशुमार प्यार लुटाया है। पहाडि़यों के बीच बसे इस गांव में जहां तक नजर जाती है, वहां प्रकृति मुस्कुराती नजर आती है। इन नजारों के बीच ऐतिहासिक धरोहरों के खजाने भी बिखरे हुए हैं। राजबीथी यानी मुख्य सड़क के दोनों ओर नारियल, आम काजू के पेड़ ऐसे लगते हैं, जैसे- आगंतुकों का स्वागत करने के लिए ही लगाए गए हों, पर ऐसा नहीं हैं। यहां हर घर और खेतों के बाड़े में पेड़ लगाने की बरसों पुरानी परंपरा है। शायद इस परंपरा की वजह से ही यहां की शुद्ध हवाओं में मौजूद शीतलता लोगों के मन को तर कर जाती है। इन पेड़ पौधों के बीच कई दो मंजिला पुरानी इमारतें भी झांकती नजर आती हैं। कतारों से बनी पुरानी हवेलियों के दरों- दरवाजे, झरोखों, लकड़ी के छज्जों की बनावट की छटां को निहारते हुए नजरे हवेली के बड़े से आंगन में ठहरती है, जहां महिलाएं हल्दी के साथ कुछ मसाले सुखाती नजर आती हैं। कौतूहल के मारे वहां की एक महिला से इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे पूजा में हल्दी का इस्तेमाल करती हैं। बातों बातों में पता चला कि यह स्थल वैष्णव समुदाय के लोगों के चार महत्वपूर्ण स्थलों में से एक है। यहां एक कल्याणी तालाब व मंडप है, जो तीर्थ स्थल है, खासकर शादी ब्याह कराने, व मन्नत पूरी होने पर लोग यहां दूर-दूर से आते हैं। जिज्ञासा बढ़ी और कल्याणी तालाब में डुबकी लगाने का मन भी हो आया। 

सबसे बड़ा कल्याणी तालाब 

यहां का सबसे बड़ा और पवित्र तालाब है। तालाब के चारों ओर करीने से बनी सीढि़यां और उस पर बने उंचे मंडप 900 साल पहले की वास्तुकला का सुंदर उदाहरण है। ग्रामीण लोगों के अथक प्रयास से यह तलाब आज भी संरक्षित नजर आता है। तालाब के चारों ओर बने मंडप बेहद खूबसूरत घुमावदार आर्क के साथ निर्मित है जिसपर सजावट के लिए देवी-देवताओं की मूर्तियां तराशी गई है। तालाब से गांव के बाहर ऊंची चोटी पर बने योग नागेश्र्वर मंदिर का नजारा भी साफ दिखाई देता है। इस मंदिर के दर्शन के लिए करीब 600 सीढि़यां चढ़नी पड़ती हैं। यह मंदिर हजारों साल पुराना बताया जाता है, क्योंकि इसमें भगवान नरसिंह की योग मुद्रा वाली मूर्ति स्थापित है, जो अपने आप में अद्भुत और अलौकिक है। इस मूर्ति को देख कर अंदाजा लगाया जा सकता है कि योग का महत्व ईश्र्वर के लिए भी कितना हुआ करता होगा। वैसे तो यहां हर एक कदम पर एक पौराणिक कथा सुनने को मिल जाती है, जो कौतूहल पैदा करता है। 

छलवानारायण मंदिर 

जिसका निर्माण 1200 ई. में दार्शनिक रामानुजम ने कराया था। इस मंदिर में भगवान संपत्कुमार की मूर्ति की स्थापना उन्होंने की थी। मंदिर के संरक्षक और मैसूर महाराजा संस्कृत कॉलेज में प्राध्यापक डॉ. एमएल अल्वर भी इस सफर में हमसे कुछ जानकारियां सांझा की। प्रोफेसर अल्वर के पिताजी प्रोफेसर एम.ए लक्ष्मी ताताचार्य इस मंदिर के पुरोहित हैं। वे बताते हैं कि तमिलनाडु से दार्शनिक रामानुजम इस गांव में आए और यहां एक दुर्ग का निर्माण करवाया। फिर तालाब और मंदिर का निर्माण करवाया। छलवानारायण मंदिर में स्थापित भगवान संपत्कुमार की मूर्ति 900 साल पुरानी है। गांव के लोग भी काफी मिलनसार हैं, इसलिए कहानियां सुना देते हैं। मंदिरों के बीच से गुजरते हुए वेद-मंत्र उच्चारण के उद्घोष से भी पूरा पौरीणिक लोक-सा प्रतीत कराता है। 

कभी नहीं सूखता धनुषकोटि

रामायण और महाभारत काल से गांव के संबंध के बारे में पता चला कि इस गांव का संबंध भगवान राम से बड़ा गहरा है। मान्यताओं के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम, सीता और लक्ष्मण ने यहां कुछ देर के लिए विश्राम किया था। यहां ही भागवान राम ने सीता मैया की प्यास बुझाने के लिए अपने बाणों से इस छोटे पर्वत को भेद कर पानी निकाल कर माता की प्यास बुझाई थी। हजारों सदियां बीत जाने के बाद भी उस स्थान पर पानी की मौजूदगी है और राम भगवान के पदचिह्न भी हैं। इस स्थान को धनुषकोटि कहा जाता है। इस छोटे से जलस्त्रोत में आज भी मीठा पानी हमेशा रहता है, जो यहां आने वालों की प्यास को तृप्त करता है।

केले के पत्तों पर कलंबू

सैर सपाटे के बीच यहां खाने पीने की भी कई अच्छे होटल हैं। इस गांव के होटलों में वैसे ब्रेकफास्ट और खाने के लिए इडली, डोसा, सांबर वड़ा जैसे दक्षिण भारतीय व्यंजन पकाये जाते हैं, लेकिन आगंतुकों के लिए यहां खास व्यंजन भी पकाया जाता है। यह अलग बात है कि इन जायकों का नाम एक बार सुनकर जुबान फर्राटे से न ले पाएं। कलंबू, पुलियोगरे, शंकरे पोंगल, खारा पोंगल, नींबूभात, बीसीवलेभात जैसे कई व्यंजन जिसका जायका बस यहीं मिलता है। इस गांव का सिग्नेचर व्यंजन कलंबू है। यह दिखने में खिचड़ी की तरह लगता है, लेकिन इसके स्वाद में कड़ी पत्ते और दक्षिण भारत के तेज मसालों का स्पेशल तड़का होता है। दाल, चावल, स्थानीय सब्जी, इमली के साथ तैयार किए कलंबू वाकई अलग है, जिसका स्वाद हमेशा जुबान पर याद रहेगा। इसके साथ यहां इमली चावल और नींबू चावल का स्वाद भी बाकी स्थानों से जुदा है। शाम ढलने के साथ ही कॉफी स्टालों पर चाय और कॉफी की चुस्कियां ली जा सकती है। चाय की प्याली के संग यहां की नमकीन और मुर्ग भी आगे के सफर को रवां रखने में साथ देती है। इसलिए कुछ साथ भी रख सकते हैं।

कैसे यहां पहुंचें

मेलूकोटे से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन पांडवपुरा है। मैसूर से आने आने वाली कुछ ट्रेनें यहां रुकती हैं, मैसूर से बस, टैक्सी ली जा सकती है। बस सेवा बहुत अच्छी है। बैंगलुरु एयरपोर्ट से 160 किमी. की दूरी पर है मेलूकोटे।

कहां ठहरें

यहां के ग्रामीण लोग अपने घरों में लोगों को ठहराते हैं। पेइंग गेस्ट के तौर पर ठहरने की उत्तम व्यवस्था है, दक्षिण भारतीय व्यंजनों का भी इन घरों में ठहर कर लुत्फ लिया जा सकता है। यहां ठहरने के दो लाभ हैं -एक स्थान के बारे में बेहतर जानने का मौका मिलता है और गांव के रहन-सहन खानपान और आस्थाओं को भी करीब से देखने- समझने का मौका मिलता है। एक घुम्मकड़ और जिज्ञासू को और क्या चाहिए।

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Posted By: Priyanka Singh

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