किला नहीं नगर है यह

शहर में दूर-दूर तक रेत के टीले फैले हुए हैं जो हवा और आंधियों के साथ अपना स्वरूप बदलते रहते हैं। इन्हीं रेतीले टीलों के मध्य त्रिकूट पहाड़ी पर बना है जैसलमेर फोर्ट यानी जैसलमेर का किला। नीला आसमान और चारों ओर फैली बंजर भूमि के बीच शान से खड़ा सुनहरा किला ऐसा प्रतीत होता है मानो इस शहर की जान हो। किले के आसपास बने सुनहरे मकान किसी देवता की शरण में झुके हुए भक्तों के समान दिखाई देते हैं। यह भारत का एकमात्र ऐसा किला है जिसकी सुंदरता इसके खंडहरों में नहीं, वरन इनमें बसे उन सैंकड़ों परिवारों के सदियों पुराने घरों में बसी है। चहकती संकीर्ण गलियों में साइकिल चलाते बच्चे, चौराहों पर बैठे पगड़ी पहने बुजुगरें की टोली, सुरमयी अंखियों से झांकती झरोखों में बैठी स्‍त्रियां और जगह-जगह लगी कठपुतलियां इस किले में राजस्थानी संस्कृति की झलक पेश करती हैं। किले के मध्य में स्थापित संगमरमर का तख्त आपको उन ऐतिहासिक यादों में ले जायेगा, जब जैसलमेर के राजा अपनी प्रजा के साथ हर्षोउल्लास व आनंदोत्सव में शामिल होते थे।

 

पानी के बिना निर्माण

कहा जाता है कि पानी के अभाव को ध्यान में रखकर इस किले का निर्माण पानी का उपयोग किये बगैर किया गया था। जैसलमेर के महारावल का पुराना निवास स्थान आज भी इस किले की शोभा बढ़ाता है। अनगिनत झरोखे और उनमें की गई बारीक नक्काशी आपको जैसलमेर की अनोखी कारीगरी एवं कला से रूबरू करायेंगी। यहां निर्मित जैन एवं हिंदू मंदिर तथा लगातार बजती घंटियां यहां आध्यात्मिकता की अनुभूति कराती हैं। किले के मुख्य चौराहे पर बनी सीमा दीवारों से हजारों सुनहरे घरों को देखकर आप किसी और दुनिया में खो जाएंगे। यह आकर्षक नजारा रेगिस्तान में दिखते चमकती मृगमरीचिका के समान ही प्रतीत होता है। पीले बलुआ पत्थरों से बना यह किला देखने में संतरे के रंग का लगता है। 250 फीट ऊंची पहाड़ी पर बने इस किले की दीवारें 30 फीट की हैं। इसमें 99 बुर्ज हैं। इसे राजपूत राजा जैसाल ने वर्ष 1156 में बनवाया था। कालांतर में इस किले पर बहुत से शत्रुओं ने हमले किए, लेकिन इस पर कोई कब्जा नहीं कर पाया।

 

घुमानचंद पतवा की हवेली

जैसलमेर की गलियों से गुजरते हुए छोटे-छोटे मकानों के बीच यदि आपको कोई भव्य इमारत दिख जाए तो समझ जाएं कि आप शहर के सबसे धनवान, जरी और अफीम के व्यापारी घुमानचंद पतवा की मशहूर हवेलियों के पास पहुंच चुके हैं। हवेली की दीवार पर सजी रंगीन कांच से बनी आकृतियां आपको 'मुगल-ए-आजम' फिल्म के उस शानदार महल की याद दिलाएंगी, जहां चारों तरफ सिर्फ आपका ही प्रतिबिम्ब नजर आएगा। हवेली के वैभव और विलासिता देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी राजा के महल में आ गए हों। चांदी और सोने से मढ़े गए आईने, अलमारियां और चारपाई पतवाओं की धन्वंतता का प्रमाण देती हैं।

 

पांच हवेलियों का समूह

हवेली के प्रांगण में कुल 5 हवेलियां हैं जो घुमानचंदजी के पांचों बेटों के लिए बनवायी गयी थीं। हर-एक हवेली के झरोखों में की गई कलाकारी और लकड़ी के अद्भुत कलापूर्ण दरवाजे इन हवेलियों को अतुल्य इमारत बनाते हैं। आप चाहें तो पारंपरिक राजस्थानी पोशाक पहनकर इन झरोखों में फोटो खिंचवा सकते हैं। हालांकि बढ़ते व्यापार के साथ पतवा परिवार दूसरे शहरों में जा बसा, किन्तु उनकी हवेलियां आज भी यहां आनेवाले हर यात्री को उनकी कामयाबी और शान की गाथा सुना रही हैं।

 

एक भूल की निशानी

इसके अलावा, नथमलजी की हवेली, जो एक 'आर्किटेक्‍चरल ब्लंडर' होने के कारण मशहूर है, वह भी देखने लायक है। जैसलमेर के रहने वाले दिलबरजी बताते हैं, 'इस हवेली का निर्माण दो वास्तुविद भाइयों ने अलग-अलग भागों से शुरू किया। दोनों की अलग ही निर्माण प्रक्रिया के कारण आज भी हवेली की वास्तुकला में चूक देखी जा सकती है। उनके हिसाब से हवेली की एक और खासियत यह है कि उस जमाने में चित्रकारों ने न ही पंखा देखा था न ही कोई गाड़ी, पर व्यापारियों के विवरण के हिसाब से चित्रकारों ने इन सारी चीजों की हूबहू तस्वीर दीवारों पर बना दी है।

 

नील गगन में देवता की सवारी

हल्के पीले पत्थरों से बना विशाल महल और उस पर सैर करती जहाज रूपी पांच मंजिला इमारत कुछ यूं नजर आती है जैसे नील गगन में किसी देवता की सवारी बादलों की सैर करने निकली हो। इसीलिए इस संरचना को 'बादल महल' के नाम से जाना जाता है। यह एक मुस्लिम वास्तुविद की अपने राजा के लिए अनोखी भेंट थी, जिसे देखकर आज भी राजपरिवार उनको याद करता है। इस इमारत की हर एक मंजिल पर अनगिनत झरोंखे बनाकर इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाकर वास्तुविद हिंदुस्तान और अपने वतन को अलविदा कर पाकिस्तान रवाना हो गया और अपनी अनमोल निशानी अपने प्रिय राजा के लिए छोड़ गया। ताजिया जुलूस में रखे जानेवाले इमाम हुसैन के मकबरे से समानता के कारण यह इमारत 'ताजिया टॉवर' के नाम से मशहूर है। जैसलमेर पर्यटन का मुख्य आकर्षण बने इस 'ताजिया टॉवर' को शहर के हर कोने तथा किले से भी देखा जा सकता है। इसके अलावा आप महल के मुख्य प्रांगण में बने मंदिर तथा म्यूजियम गए शाही आर्टिफेक्ट्स भी देख सकते हैं।

 

सर्दियों में डेजर्ट ट्रेकिंग का आनंद

न रास्ता हो, न मंजिलें, बस पांव तले शीतल सुनहरी रेत हो, आसमान का साथ हो और हवा के झोकों के साथ कभी न खत्म होता वार्तालाप हो, सूरज के ढलते ही दिन ढले और सूर्योदय के साथ एक नए युग की शुरुआत हो। यदि आप ऐसी सपनों की दुनिया में कुछ दिन बिताना चाहते हैं तो यूथ हॉस्टल एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित 'जैसलमेर डेजर्ट ट्रैकिंग प्रोग्राम' में शामिल हो सकते हैं। सैलानियों और शहर से कोसों दूर रेत के टीलों पर बने टेंट्स और थार रन के खुशनुमा माहौल में स्थानीय गायकों एवं नर्तकियों की कला देखते हुए दाल-बाटी और चूरमा खाने का जो आनंद है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। रेत के टीलों पर बैठकर सूर्य के नारंगी गोले को रेतरूपी लहरों में डूबता हुआ देखने का आनंद भी बिल्कुल निराला है। खाबा, बरना, साम, सुदासरी और खुरी जैसी जगहों पर जहां बड़े-बड़े थॉर के पेड़, पशु-पक्षियों और मीलों तक फैली रेत के अलावा कुछ नहीं दिखाई देता, वहां आप रेगिस्तान की सुंदरता एवं खामोशी का आनंद ले सकते हैं।

 

रण में जलतरंग

वीरान रेगिस्तान के बीच यदि मृगमरीचिका आए तो रण में भटकता इंसान खुशी से उसकी तरफ खिंचा चला जाता है। कुछ इसी तरह जैसलमेर के आकर्षक बंजर के बीच बना गडीसर तालाब सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। सूर्यास्त के समय जब एक ओर जैसलमेर किला कोई दिव्य इमारत सा प्रतीत होता है तो दूसरी ओर तालाब के किनारे बने मंदिर और बीच में बनी छतरियां पानी में लहराती हुई नजर आती हैं। अनगिनत पक्षी भी इस अद्भुत नजारे का लुत्फ उठाते नजर आते हैं। उनकी चंचलताभरी उड़ान देखकर ऐसा आभास होता है जैसे वह सूर्यदेव को अगली सुबह जल्दी आने का आगाज दे रही हों। बाकी शहरों में भले ही बड़ी-बड़ी नदियों पर बने घाट शहर की रौनक लगते हों किन्तु जैसलमेर के गडीसर तालाब पर बने घाटों की सुंदरता अतुलनीय है। एक जमाने में यह तालाब पूरे शहर के लिए पर्याप्त जल प्रदान करता था और जैसलमेर वासियों के लिए नदी की कमी पूरी करता था। आज हैंड-पंप और कैनाल की मौजूदगी से यह तालाब केवल एक धरोहर बनकर रह गया है। तालाब के किनारे बने घरों में आज भी सदियों पुरानी मूर्तियां पायी जाती हैं जो अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय खंडित की गयी थीं। गणगौर उत्सव के दौरान किले में रखी गयी देवी की सोने की मूर्ति को तालाब के किनारे स्थित शिव-मंदिर पर लाया जाता है। उस समय तालाब की सुंदरता इस आध्यात्मिक वातावरण से और ज्यादा निखर जाती है।

 

थार में रात का अलौकिक नजारा

जब तारों से सजी आसमानी छत हो, धरती मां की रेतरूपी गोद हो और ठंडी हवा बालों को सहला रही हो तो नींद सिर्फ सूरज की तपती किरणें ही उगा सकती हैं। जैसलमेर के नजदीक खुरी सैंड ड्यून्स पर कुछ ऐसी ही रातों में सितारों की बारात का नजारा देखने के लिए अमावस्या की रात सैकड़ों घुमक्कड़ आ पहुंचते हैं। यहां न कोई टेंट होते हैं न ही कोई सुविधा बस एक खानाबदोश जीव के जैसे प्रकृति के नयनाभिराम चमत्कारों से विस्मित होकर रोमांच के एहसास में खो जाना ही उद्देश्य होता है। यदि आप तारों और नक्षत्रों के जानकार हैं या उनमें दिलचस्पी रखते हैं तो 'मिनीटेलीस्कोप' ले जा सकते हैं और जिन तारों, ग्रहों एवं नक्षत्रों के बारे में केवल किताबों में पढ़ा है तो उन्हें जानने और देखने का यह एक उत्तम स्थान है।

 

लोदुर्वा मंदिर की आश्चर्यजनक वास्तुकला

जैसलमेर शहर 'सिल्क रूट' के समय होने वाले व्यापार का अहम हिस्सा था। हवेलियों में बने चित्र और मंदिरों की वास्तुकला इस बात का प्रमाण देती है कि इस व्यापार संबंध का उन पर गहरा असर था। एक ऐसा ही 'लोदुर्वा नामक जैन मंदिर जैसलमेर के नजदीक स्थित है जो पैगोडा के समान चीनी शैली में बनाया गया है। दीवारों पर किया गया जालिकाम कुछ इस तरह से डिजाइन किया गया है कि मंदिर में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को यह भगवान पाश्‌र्र्वनाथ को पहनाए हुए विशाल हार जैसा प्रतीत होता है। पा‌र्श्वनाथ देव की मूर्ति के इर्द-गिर्द बने सैकड़ों नाग प्रभु की प्रतिमा के प्रभामंडल की तरह सजे हुए हैं और मंदिर में बने परनाले हिंदूशैली के विपरीत ड्रैगन के मुख से बनाए गए है। पांच पायदानों जैसी संरचना में बना यह मंदिर दूर से एक स्तूप जैसा ही प्रतीत होता है और जैसलमेर में चीन एवं तिब्बती संस्कृति के प्रभाव की झांकी पेश करता है।

 

कुलधरा के रहस्यमय खंडहर

एक तरफ जैसलमेर की रंगीन संस्कृति और वास्तुकला आपको मंत्रमुग्ध कर देगी तो दूसरी ओर शहर से कुछ ही किलोमीटर दूर वीरान खंडहरों में सूरज ढलते ही अजीब सन्नाटा छा जाता है। रात की काली चादर इन खंडहरों को और भयानक बना देती है। लोगों का मानना है कि चुड़ैलों और भूतों का वास इस जगह को डरावना बनाता है तो दूसरी ओर इतिहासकारों का मानना है कि सदियों पुराना अभिशाप जो पालीवाल ब्राह्मण की इस जमीन का त्याग करने के समय दिया गया था, वह इस क्षेत्र को आम इंसान के लिए वर्जित बनाता है। दिन के उजाले में यह परित्यक्त नगर एक आम खंडहर जैसा दिखता है और इतना जानदार प्रतीत होता है कि आप गलियों में खेलते बच्चे, आंगन में काम करती औरतों और नुक्कड़ पर सामान बेचते नौजवानों की कल्पना कर सकते हैं। त्यक्त मकानों की सुंदरता आपको उस दृश्य की कल्पना करने पर मजबूर कर देगी, जब भारी मन के साथ यहां के लोगों ने यह गांव छोड़ा होगा और अपने इस प्रिय नगर में कोई भी बस न पाए इसलिए पूरे दिल से कामना की होगी। कहा जाता है कि आज की तारीख तक कुलधरा में रात्रिवास करने वाले लोग या तो बच ही नहीं पाए या उनके साथ चौकाने वाली रहस्यमय घटनाएं घटी हैं और इसी कारण पर्यटन विभाग ने सूर्यास्त के बाद इस क्षेत्र में प्रवेश वर्जित घोषित कर दिया है।

 

रण उत्सव का आनंद

ढलते सूरज के साथ एकतारे के सुर हवाओं में घुलते हैं और कालबेलियां रास से महफिल में रंग भर उठते हैं। घूमर और तेराताली की लय के साथ आपका मन डोलने लगता है और राजस्थानी गीत, संगीत एवं नृत्य आपको झूमने पर मजबूर कर देता है। पुष्कर, जयपुर, बीकानेर, मंडावा और राजस्थान के कई अनसुने गांवों और कस्बों से भिन्न-भिन्न प्रकार के संगीतवाद्य बजाकर आपको अपने कौशल से मंत्रमुग्ध कर देंगे। तीन दिन के इस उत्सव में पूरे विश्र्व से हजारों लोग राजस्थानी संस्कृति का मजा लेने आते हैं और कई यात्री संगीतकारों के साथ बैठकें उनके वाद्यों की जानकारी भी लेते हैं। यदि आप चाहें तो 2-3 दिन रहकर संगीतकारों के साथ बैठकर उनके वाद्य बजाना भी सीख सकते है।

 

क्या खरीदें

यहां से राजस्थानी मिरर वर्क एम्ब्रॉयडरी, वुडन बॉक्स और सिल्वर जूलरी जरूर खरीदें। हाथ से बुने ब्लैंकेट और यहां के ट्रेडिशनल कालीन भी खास हैं। एंटीक और ओल्ड स्टोनवर्क का सामान भी आपका मन लुभाएंगे। यहां के सदर बाजार, खादी ग्रामोद्योग एंपोरियम, राजस्थानी गवर्नमेंट शॉप, पंसारी बाजार, मानक चौक और गांधी दर्शन से खरीदारी कर सकते हैं।

 

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Posted By: Molly Seth