देवभूमि कहा जाता है केरल को। चारों ओर फैली बेशुमार हरियाली और प्रकृति की छटा देखते ही बनती है। कहीं नारियल पेड़ तो कहीं केले के, हरे-भरे चाय बागान, गर्म मसालों की खुशबू, घने जंगल और अरब सागर का अद्भुत सौंदर्य देखते ही बनता है। मंदिरों में बजती घंटियां तो घर के मुख्य दरवाजों पर रंगोली बना कर शाम को रखा जाता जलता दीया भारतीय संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सिखा जाता है। केरल की इस यात्रा में हमारा पहला पड़ाव कोच्चि था।

कोच्चि के मसाले

हमने केरल की दस दिन की यात्रा करनी थी, जिसमें पहले जाना था कोच्चि। सोचा नहीं था कि कोच्चि इतनी खूबसूरत जगह हो सकती है। दिल्ली से सुबह की फ्लाइट थी और तीन घंटे बाद ही हम कोच्चि में थे। दिल्ली की भागमभाग और शोर-शराबे के बाद यहां की शांत सुबह मन को सुकून पहुंचा रही थी। एयरपोर्ट से होटल के लिए रवाना होते हुए सड़क के दोनों ओर की हरियाली मन को प्रसन्न कर रही थी। सड़केें खाली, भीड़भाड़ नहीं। थोड़ा आगे बढ़ते ही मैं थोड़ा घबरा सी गई...। दरअसल मुझे चारों ओर पानी ही पानी नजर आने लगा था। मैंने ड्राइवर से गाड़ी रोकने को कहा और नीचे उतर कर इस दृश्य को समझने की कोशिश करने लगी। ऐसा लग रहा था, मानो किसी टापू के बीच खड़ी हूं। मुझे अफसोस हुआ कि हमें यहां एक ही दिन रुकना था और इतने में कोच्चि की खूबसूरती नहीं देखी जा सकती। यहां लोग एक-दूसरे मिलने नाव से जाते हैं। इसे अरब सागर की रानी कहा जाता है। यह गर्म मसालों का गढ़ है।

अगले दिन बेमन से मैंने कोच्चि को बाय कहा क्योंकि हमें मुन्नार के लिए निकलना था। यहां से हम किराए की कार से मुन्नार जा रहे थे, इसलिए जगह-जगह गाड़ी रोक कर हम प्राकृतिक दृश्यों के जरिये अपनी यादों को समृद्ध कर रहे थे।

 

मुन्नार के चाय बागान

मुन्नार पहुंचने के बाद तो मानो मैं कोच्चि को भूल ही गई। मेरी स्थिति उस मुसाफिर की थी, जो वहां से लौटना नहीं चाहता। मुन्नार चाय बागानों के बीच बसा छोटा सा हिल स्टेशन है। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई लगभग 1600 मीटर है। इसे दुनिया के दस महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों में से एक की उपाधि दी गई है। यहां देश-विदेश से लोग घूमने आते हैं। सांस लेने पर एक ताजगी का एहसास होता है। नीले आसमां की चादर तले धुंध के बीच नीचे चाय बागान और वहां से गुजरती सड़क कभी दिखती तो कभी छिप जाती। ऐसा लगता था कि प्रकृति लुकाछिपी का खेल खेल रही हो। 

कुमारकोम की महक

मुन्नार से कुमारकोम की यात्रा बहुत रोमांचक थी क्योंकि हमारा अगला पड़ाव ठेकरी में था। हमने उन जंगलों के बीच से सफर किया जहां मसालों की महक बसी थी। यह छोटे और सुंदर द्वीपों की जगह है। यहां केरल की सबसे बड़ी ताजे पानी की झील और बर्ड सैंक्चुअरी है। हम लोग शाम 4 बजे ठेकरी पहुंच गए। वहां के खूबसूरत होटल में रात गुजारने के बाद हम अगली सुबह कुमारकोम के लिए चल पड़े। प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य को निहारते हुए अंतत: कुमारकोम के लेक रिजॉर्ट पहुंचे, जो केरल की वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। कुमारकोम केरल का छोटा सा शहर है, जो यहां एक बार आता है, उसका फिर जाने का मन ही नहीं करता। सजे-धजे हाउसबोट में यात्रियों को लग्जरी सुविधाएं मिलती हैं। इसमें बेडरूम, किचन, लिविंग रूम और बैलकनी...जैसी सभी सुविधाएं मौजूद हैं। हमारा अगला पड़ाव कोवलम था। अब थोड़ी सी उदासी मन को घेरने लगी थी क्योंकि वह हमारा अंतिम पड़ाव था, इसके बाद घर वापसी थी। 

कोवलम में लहरों का शोर

कुमारकोम से कोवलम तक का सफर सड़क मार्ग से ही हुआ। सफर केरल के शहरों, बस्तियों और गलियों के बीच से जारी था। कटहल और नारियल के झुरमुट के बीच बने खूबसूरत घरों को देख सुकून का एहसास हो रहा था, साथ ही दिमाग में सवाल भी कौंध रहा था कि दिल्ली के लोगों के पास घर में बिताने के लिए कितना समय होता है? बहरहाल, शाम तक हम कोवलम पहुंच गए। यहां हमारा होटल ठीक समंदर के किनारे था और यह काफी ऊंचाई पर स्थित था। कमरे से ही समंदर की उठती लहरों को आसानी से देखा जा सकता था। लहरें जब किनारे से टकरातीं तो शोर उठता और फिर अगले ही पल लहरें दूर चली जातीं और माहौल में असीम शांति छा जाती।

दूसरे दिन सुबह हम पद्मनाभस्वामी का दर्शन करने गए। यह मंदिर तिरुवनंतपुरम में है। यह मंदिर दक्षिण भारतीय वास्तुकला का भव्य नमूना है। यहां भगवान विष्णु की विशाल मूर्ति विश्राम की मुद्रा में है। यहां की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां स्त्रियों को साड़ी और मर्दों को धोती पहन कर मंदिर में प्रवेश करना होता है। मंदिर के परिसर में यहां के राजा का महल है।

संध्या रानी 

Posted By: Priyanka Singh

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