करीब सात-आठ साल हो चुके थे मुझे जबलपुर में। जब भी मौका मिलता मैं नर्मदा के किनारों पर जाकर बैठ जाता। एक अद्भुत-सा सुकून मिलता रहा मुझे। नर्मदा के किनारे मीलों फैले जंगल और उनमें उछल-कूद करते जानवर, अपनी ओर खींचते रहे हैं मुझे। ऐसे में जबलपुर के आसपास के टाइगर रिजर्व में कई बार जाने का मौका मिला तो लगा इन्हीं को तो खोज रहा था। बस निकला पड़ा मैं अपने चार दोस्तों के साथ बाघों से दो-दो हाथ..नहीं दो-दो आंख करने।

सफारी का आनंद

मौसम सुहावना था तो हम सबने सफारी पर जाने का फैसला किया। हमें बता दिया गया था कि अगर रेनकोट हो तो पहन लें, क्योंकि फुहार बारिश में भी बदल सकती है। टाइगर रिजर्व की भाषा में बाघ के दिखने को टाइगर शो कहते हैं। एक गाइड भी हमारी जीप पर था। सर्पीली पगडंडियों जैसी सड़क पर बढ़ती जीप प्रकृति के अद्भुत, अनबूझे, अनदेखे दृश्यों का हमें दीदार करा रही थी। जमीन से लेकर आसमान तक केवल और केवल हरा-हरा रंग ही बिखरा था। जमीन पर फैली घास और सड़क के दोनों ओर खड़े साल और बांस के लंबे-लंबे वृक्ष, जो ऊपर जाकर जैसे गले मिल रहे हों.. इनके बीच से कहीं-कहीं आसमान झांकता-सा दिखाई देता था। वहां था तो केवल हरा-हरा रंग..जीप का रंग भी हरा था। कान्हा की गिनती देश ही एशिया के सबसे अच्छे टाइगर रिजर्व के रूप में होती है। यह सबसे पुराने अभयारण्यों से एक है। 1955 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला था। तब से अब तक यह वन्यजीव संरक्षण में सबसे आगे है। तभी अचानक सामने एक बारहसिंगा दिखाई दिया। जैसा कि नाम से साफ है बारहसिंगा यानी बारह सींग वाला जानवर। एक वयस्क नर बारहसिंगा के सींग में 14 तक शाखाएं होती हैं। किसी-किसी में तो सींग की 20 शाखाएं पाई जाती हैं। कान्हा बाघ के अलावा बारहसिंगा के लिए भी विख्यात है।

यहां स्तनधारी जानवरों की करीब दो दर्जन प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें चीतल, सांभर, काले हिरण, नील गाय, लकड़बग्घा, सियार, भालू शामिल हैं। कुछ दूर और चलने पर नाचता हुआ मोर दिखाई दिया। 

पक्षियों की सैकड़ों प्रजातियां

कान्हा में पक्षियों की करीब ढाई-तीन सौ तरह की प्रजातियां पाई जाती हैं। मोर उनमें से ही एक है। अलग-अलग तरह के पक्षी, कबूतर, बाज यहां आमतौर पर दिखते रहते हैं। पार्क में दो नदियां भी हैं हेलॉन और बंजर। हेलॉन में अक्सर प्रवासी पक्षी दिख जाते हैं। प्रकृति के इन अनोखे दृश्यों की कल्पना तो हमने कभी की ही नहीं थी। केवल टाइगर ही तो नहीं दिखे, बाकी जल, जंगल, जमीन, जंगली जानवर, पक्षी तो जैसे हमारे स्वागत में आतुर ही दिख रहे हैं। 

जब दिखा टाइगर शो

गाइड ने उसी जीप के पीछे चलने के लिए हमारे ड्राइवर को कहा। पास ही कहीं टाइगर शो होने की सूचना थी। गाइड ने हम सबको चेतावनी जैसी भाषा में कुछ टिप्स देने शुरू किए। उसने कहा, अगर टाइगर दिखाई दे तो सब बिल्कुल शांत बैठे रहें। आपस में कोई बात न करें। टाइगर कई बार हमला कर देता है। खासतौर पर तब, जब वह शिकार को अपना भोजन बना रहा हो। अपने-अपने कैमरे के शटर की आवाज भी म्यूट कर दें। जंगल की शांति में यह आवाज भी टाइगर को नाराज करने के लिए पर्याप्त है। सुबह नौ से दस बजे का वक्त रहा होगा। गुनगुनी धूप में आराम की मुद्रा में बैठे टाइगर को देख ऐसा लगा कि वह कल की बारिश से भीगे शरीर को धूप से गरमाहट दे रहा हो। लोग कैमरों और मोबाइल के साथ अपने मन-मस्तिष्क में इस दृश्य को कैद रहे थे। सच, मध्य प्रदेश की वाइल्ड लाइफ नहीं देखी तो कुछ भी नहीं देखा। 

कैसे पहुंचें

मध्य प्रदेश के वाइल्ड लाइफ टूरिज्म का आनंद उठाने के लिए आपको इस प्रदेश की राजधानी भोपाल या जबलपुर पहुंचना होगा। भोपाल तक देश के सभी हिस्सों से ट्रेन से पहुंचा जा सकता है। इसी तरह जबलपुर भी अधिकांश हिस्से से रेलमार्ग से जुड़ा है। दोनों ही शहरों तक हवाई सेवा भी उपलब्ध है। भोपाल से जबलपुर ट्रेन या वायुमार्ग से पहुंचा जा सकता है। फिर जबलपुर से कान्हा या बांधवगढ़ जाने के लिए आपको टैक्सी लेनी होगी। यहां आने से पहले ध्यान रखें कि अपनी यात्रा की बुकिंग यानी रिजॉर्ट या रेस्ट-गेस्ट हाउस में रुकने की और टाइगर रिजर्व में सफारी की पहले से बुकिंग करा लें। अब टाइगर रिजर्व में प्रतिदिन प्रवेश पाने वाले वन्यजीव प्रेमियों की संख्या और सफारी के लिए जीप की संख्या निर्धारित कर दी गई है। एक निश्चित संख्या के बाद पर्यटकों और जीप को प्रवेश नहीं दिया जाता है। 

जितेंद्र मोहन रिछारिया 

Posted By: Priyanka Singh

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