हिमाचल के खानों पर मौसम का असर साफतौर से देखा जा सकता है। सर्दियों में जहां शरीर को गर्म रखने वाले भोजन बनाए और खाए जाते हैं, वहीं गर्मियों में शीतलता देने वाले खानों पर जोर दिया जाता है। औसतन एक पहाड़ी व्यक्ति दिन भर में 10 से 20 किलोमीटर पैदल चल लेता है, ऐसे में शरीर को ऊर्जा की बहुत जरूरत होती है, इसलिए खानों में पौष्टिकता का बड़ा महत्व है। सर्दियों के व्यंजनों में कुल्थ की खिचड़ी, उड़द की दाल की बड़ी, खट्टी बड़ी, सेपू बड़ी, बरेंदरी बड़ी और मक्के की रोटी खाई जाती है। यहां साल भर सिड्डू खाने का भी चलन है। चावल के आटे में मेवा या सब्जी भरकर भाप में पकाया गया सिड्डू चटनी के साथ गर्मागर्म परोसा जाता है। यह अपने आप में पूरा भोजन होता है।

पांगणा में फूड पर्यटन

तत्तापानी के नजदीक ही एक जगह है पांगणा। यहां पर आजकल एक अनोखी पहल की गई है। यहां के स्थानीय लोग समुदाय आधारित फूड पर्यटन योजना चला रहे हैं। इस योजना के अंतर्गत पाक कला कार्यक्रम के अंतर्गत महिलाओं द्वारा स्थानीय व्यंजन बनाकर परोसे जाते हैं। इस योजना का उद्देश्य पर्यटकों में हिमाचली स्वाद को लोकप्रिय बनाना है। यहां की ग्रामीण महिलाएं तरह-तरह की बडि़यां बनाने में पारंगत हैं। इस क्षेत्र में राजमा का भी अपना स्वाद है। जैसे-जैसे आप पहाड़ों की ऊंचाई की ओर जाएंगे, भोजन में मांसाहार की बहुलता देखने को मिल जाएगी। यहां बकरे का मांस तेज चटखदार मसलों के साथ पकाया जाता है। विवाह या अन्य सहभोज में सुकेती धाम का आनंद ले सकता है। इसमें धुली दाल, सेपुबड़ी, बदाने का मीठा, आलू-राजमा, कोहल का मदरा, उड़द की दाल, मक्के की रोटी और कढ़ी जैसे पारंपरिक व्यंजन परोसे जाते हैं। ये व्यंजन औषधीय गुणों से भरपूर हैं। 

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Posted By: Priyanka Singh

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