विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

इस नवरात्र कांगड़ा की 'नगरकोट वाली माता' के दरबार में लगाएं हाजिरी, यहीं गिरा था मां सती का दाहिना वक्ष

Published: Mon, 23 Mar 2026 12:17 PM (GMT+05:30)

क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा भव्य मंदिर है, जो सिर्फ एक धर्म नहीं बल्कि हिंदू, मुस्लिम और सिख- सभी की आस्था का अनूठा केंद्र है?

हिमाचल का वह शक्तिपीठ जहां गिरा था माता सती का दाहिना वक्ष (Image Source: Incredible India)

हिमाचल का वह शक्तिपीठ जहां गिरा था माता सती का दाहिना वक्ष (Image Source: Incredible India) 

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश के जिला कांगड़ा में स्थित ऐतिहासिक श्री बज्रेश्वरी देवी मंदिर की। चैत्र नवरात्र के खास मौके पर, आइए जानते हैं 'नगरकोट कांगड़ा वाली देवी' (Bajreshwari Devi Temple Kangra) के नाम से मशहूर इस चमत्कारी शक्तिपीठ की कुछ बेहद खास और रोचक बातें, जिन्हें पढ़कर आपका मन भी यहां दर्शन करने को मचल उठेगा।

Bajreshwari Devi kangra

(Image Source: Incredible India & Instagram) 

यहां गिरा था मां सती का दाहिना वक्ष

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कांगड़ा का यह ऐतिहासिक मंदिर एक प्रमुख शक्तिपीठ है। ऐसा माना जाता है कि यहां माता सती का दाहिना वक्ष गिरा था। इस मंदिर में मां बज्रेश्वरी एक 'पिंडी' के रूप में विराजमान हैं। लोगों का अटल विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहां आकर मां के दर्शन कर लेता है, उसके जीवन के सारे कष्ट और दुख पल भर में दूर हो जाते हैं।

तीन धर्मों का प्रतीक हैं मंदिर के तीन गुंबद

यह हिमाचल प्रदेश का सबसे भव्य और सुंदर मंदिर माना जाता है। बता दें, 4 अप्रैल 1905 को आए एक भयंकर भूकंप में यह मंदिर पूरी तरह जमींदोज हो गया था। इसके बाद इसे एक नई 'दक्षिण शैली' में दोबारा बनाया गया।

इस मंदिर की वास्तुकला की सबसे बड़ी खासियत इसके तीन गुंबद हैं, जो सर्वधर्म समभाव का खूबसूरत संदेश देते हैं:

  • पहला गुंबद: यह सिख धर्म के गुरुद्वारे के आकार का है।
  • दूसरा गुंबद: यह इस्लाम धर्म की मस्जिद के आकार का है।
  • तीसरा गुंबद: यह हिंदू संस्कृति के तहत एक पारंपरिक मंदिर के आकार का है।

Brajeshwari Devi Temple himachal

(Image Source: Incredible India) 

देसी घी से सजता है चमत्कारिक 'घृत मंडल'

चैत्र नवरात्रों में यहां उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन मकर संक्रांति पर यहां का नजारा बिल्कुल अलग होता है। हिमाचल प्रदेश में यह इकलौता ऐसा शक्तिपीठ है, जहां मकर संक्रांति के खास मौके पर देसी घी से मक्खन तैयार किया जाता है और उससे माता की पिंडी पर एक बहुत ही सुंदर 'घृत मंडल' सजाया जाता है।

ध्यानू भक्त की अनोखी भक्ति

मंदिर के प्रांगण में उत्तर प्रदेश के आगरा के रहने वाले 'ध्यानू भक्त' की प्रतिमा स्थापित है। कहा जाता है कि उन्होंने इसी प्रांगण में अपनी गर्दन काटकर देवी मां के दरबार में अर्पित कर दी थी। आज भी यूपी और राजस्थान से लाखों लोग उनके दर्शन करने आते हैं।

इनसे जुड़ी एक और दिलचस्प मान्यता है:

  • जब बरसात के मौसम में बारिश नहीं होती और सूखा पड़ता है, तो ध्यानू भक्त की मूर्ति पर गोबर का लेप लगाया जाता है।
  • मान्यता है कि ऐसा करने पर बारिश हो जाती है, जिससे किसानों और आम जनता को भयंकर गर्मी से राहत मिलती है।
  • जब बारिश हो जाती है, तो मूर्ति को 'पंच स्नान' करवाकर उस गोबर को साफ कर दिया जाता है।

पीले वस्त्र, पीतल का कड़ा और पीठ पर सिंदूर का छाप

श्रद्धालुओं और विशेषकर ध्यानू भक्त के वंशजों के लिए यहां यात्रा पूरी करने के कुछ खास नियम और दिलचस्प परंपराएं हैं:

  • पीले वस्त्र और पीतल का कड़ा: भक्त पीले कपड़े पहनकर मंदिर पहुंचते हैं। वापसी में वे पहाड़ी शैली में बना 'पीतल का कड़ा' पीले प्रसाद के रूप में खरीदकर अपनी कलाई में पहनते हैं। इस कड़े को पहनकर घर जाना बहुत शुभ माना जाता है।
  • सिंदूर का छाप: श्रद्धालु अपनी यात्रा शुरू करने से पहले अपने गांव में सीधे हाथ का लाल सिंदूर का छाप लगाते हैं। जब वे मंदिर में देवी दर्शन कर लेते हैं, तो स्थानीय पुजारी उनकी पीठ पर अपने हाथ का छाप लगाते हैं। यह छाप लगने के बाद ही उनकी तीर्थ यात्रा पूरी मानी जाती है।
  • वंशावली का रिकॉर्ड: इस मंदिर की एक खासियत यह भी है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा से आने वाले ज्यादातर श्रद्धालुओं के परिवारों का पूरा रिकॉर्ड यहां के पुजारियों के पास हमेशा उपलब्ध रहता है। यात्रा का पंजीकरण कराना भी यहां शुभ माना गया है।

कैसे पहुंचें मंदिर?

बज्रेश्वरी देवी मंदिर तक पहुंचना बहुत ही आसान है। आप हवाई, रेल या सड़क- तीनों मार्गों से यहां आ सकते हैं:

  • सड़क मार्ग: हिमाचल प्रदेश के प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग द्वारा यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा, यह मंदिर पठानकोट से 80 किलोमीटर और चंडीगढ़ से 220 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
  • रेल मार्ग: आप पठानकोट से जोगिंदर नगर जाने वाली नैरोगेज रेलवे लाइन का इस्तेमाल कर सकते हैं। कांगड़ा रेलवे स्टेशन से यह मंदिर महज 3 किलोमीटर की दूरी पर है।
  • हवाई मार्ग: सबसे नजदीकी एयरपोर्ट कांगड़ा है, जो मंदिर से सिर्फ 9 किलोमीटर दूर है। यहां दिल्ली, जयपुर, शिमला और चंडीगढ़ से रेगुलर फ्लाइट्स आती हैं।

यह भी पढ़ें- देवी के 51 शक्तिपीठों में सबसे खास है कामाख्या मंदिर, इस नवरात्र जरूर बनाएं मां के दर्शन का प्लान

यह भी पढ़ें- ऋषिकेश-हरिद्वार नहीं, इस नवरात्र पहुंच जाएं कसार देवी मंदिर; कदम रखते ही मिलती है असीम शांति