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सुविधाओं के बीच भावनात्मक रूप से अकेले क्यों हो रहे हैं बच्चे? पेरेंट्स कैसे पहचानें खतरे के संकेत

Published: Sun, 19 Jul 2026 09:00 AM (GMT+05:30)

माता-पिता निश्चिंत हैं कि उन्होंने समय से बच्चे को स्कूल रवाना कर दिया। कभी व्यस्तता तो कभी तनाव के चलते ...और पढ़ें

अच्छे अंकों की रेस में मेंटल हेल्थ तो नहीं छूट रही पीछे? (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बीते साल नवंबर की एक सुबह जयपुर के एक नामी स्कूल में हुए हादसे में नौ साल की बच्ची अमायरा की जान चली गई। कुछ समय पूर्व सार्वजनिक हुई सीसीटीवी फुटेज से पता चल रहा है कि अमायरा सहपाठियों की बुलिंग का शिकार हो रही थी। 

क्लास टीचर द्वारा भी मदद न मिलने और लगातार सहपाठियों के मजाक का निशाना बनने, टीचर की उपेक्षा व घबराहट में आकर उसने आत्मघाती कदम उठा लिया। यह घटना चकाचौंध भरे महानगरीय परिवेश के उस स्याह सच का आईना है, जहां बच्चे सुविधाएं तो खूब पाते हैं, मगर भावनात्मक रूप से बिल्कुल अकेले हो चुके हैं। आखिर कमी कहां रह गई! 

डिजिटल दुनिया में बढ़ती दूरी 

जब कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक लगातार किसी दर्दनाक या गंभीर मानसिक अनुभव से गुजरता है, तो वह अवसाद में चला जाता है। इस दौरान वह पूरी तरह से निराश, असहाय और व्यर्थ महसूस करने लगता है। एक नौ साल के बच्चे का मस्तिष्क इतना विकसित नही होता कि वह इन जटिल भावनाओं को नियंत्रित कर सके या सही जगह मदद मांग सके। 

हाइपर-डिजिटलाइजेशन के दौर में बच्चे दुनिया से तो जुड़े हैं, पर भावनात्मक रूप से मीलों दूर हैं। जिस उम्र में बच्चों को इंसानों के साथ रहकर सहानुभूति सीखनी चाहिए, उन्हें स्क्रीन थमा दी जा रही है। घरों में संवाद मैकेनिकल हो गया है- 'खाना खा लिया?', 'होमवर्क पूरा हुआ?', 'मार्क्स कितने आए?', 'सो जाओ, उठ जाओ।' बच्चों के साथ कोई इमोशनल चेक-इन नहीं कर रहा है कि 'बेटा आज स्कूल में दिन कैसा रहा?', 'जब तुम खेलने गए तो क्या हुआ?'... कम उम्र में ही बच्चों से उम्मीद होती है कि वे आत्मनिर्भर और मजबूत बनें। 

मानसिक या भावनात्मक कमजोरी जाहिर करते बच्चे को 'मजबूत बनो' की घिसी-पिटी सलाह देकर उसकी बात को दबा दिया जाता है। नतीजतन, बच्चा सबसे अपनी तकलीफें छुपाने लगता है और बेहद अकेला महसूस करने लगता है। 

मानसिक स्वास्थ्य में भी आए अव्वल

आज हर तरफ सिर्फ अच्छे अंक और सबसे आगे निकलने की अंधी दौड़ मची है। हमें बच्चे के अंकों से ज्यादा उसके व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर फोकस करना होगा। अमूमन माता-पिता या शिक्षक बच्चे पर ध्यान तभी देते हैं जब वह गुस्सा करने लगता है, चीजें फेंकता है या आक्रामक हो जाता है, लेकिन हमें बच्चे को उस सीमा तक जाने ही नहीं देना है। वहीं कई बार अंतर्मुखी बच्चे अपनी तकलीफें अंदर ही अंदर दबा लेते हैं और कक्षा की भीड़ में कहीं गुम जाते हैं। बच्चे के समग्र विकास पर ध्यान देना होगा। उनसे पूछें -'तुम्हें स्कूल में कैसा महसूस होता है?', 'किस दोस्त के साथ रहना पसंद है?' और सबसे महत्वपूर्ण- 'कौन बिल्कुल पसंद नहीं है और क्यों?' स्कूलों में केवल एक काउंसलर होना नाकाफी है, क्योंकि अकेला इंसान हजारों बच्चों को नहीं संभाल सकता। शिक्षकों व अभिभावकों दोनों को लगातार 'सेल्फ-वर्क' करने की जरूरत है। 

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डॉ. दीपाली बत्रा, क्लिनिकल चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट

पहचानें रेड फ्लैग्स 

कक्षा में बच्चों के बर्ताव को डिकोड करना सबसे महत्वपूर्ण और प्राथमिक कदम है। अमायरा के मामले में वह कक्षा में स्पष्ट रूप से परेशान दिख रही थी। शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में आने वाले शुरुआती 'रेड फ्लैग्स' (चेतावनी के संकेत) को पहचानना आना चाहिए। इसके लिए स्कूलों में शिक्षकों को 'इमोशनल एंड पर्सनल वेलबीइंग' की नियमित ट्रेनिंग दी जानी चाहिए। 

हर एक्सप्रेशन पर तुरंत रिएक्ट करना जरूरी नहीं, हां, अगर बच्चा शून्य में ताक रहा हो, चेहरे पर खौफ या सदमे का भाव हो या वह बिल्कुल भावनाशून्य दिख रहा हो, तो शिक्षक को तुरंत आगे बढ़कर उससे बात करनी चाहिए। एक छोटा सा वाक्य जैसे- 'बेटा, क्या कोई बात है?', 'कोई मदद चाहिए?', 'कुछ बात शेयर करना चाहोगे?' जैसे वाक्य अनचाही स्थिति से बचा सकते हैं। 

साथ मिलकर बनेगी बात

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शिक्षकों पर सिलेबस पूरा करने व अनुशासन बनाए रखने का भारी दबाव होता है, जिस कारण अक्सर वे बच्चों की अन्यमनस्कता को अनसुना कर देते हैं। शिक्षकों के लिए इमोशनल इंटेलिजेंस की ट्रेनिंग आज सबसे बड़ी जरूरत है। यह केवल औपचारिकता न होकर बेहद गहन और नियमित होनी चाहिए। स्कूलों में होने वाली साइलेंट बुलिंग कक्षा से ज्यादा कारिडोर, खेल के मैदानों, वाशरूम या स्कूल बस जैसी जगहों पर होती है। बुलिंग को रोकने के लिए शिक्षकों के साथ ही स्कूल के हाउसकीपिंग स्टाफ, बस ड्राइवर और सुरक्षा गार्ड्स को भी जोड़ना होगा। अक्सर वे लोग ऐसी जगहों पर मौजूद होते हैं, जहां शिक्षक नहीं पहुंच पाते। अगर गार्ड्स और स्टाफ को भी थोड़े बुनियादी निर्देश और संवेदनशीलता की ट्रेनिंग दी जाए, तो वे ऐसी किसी भी संदेहास्पद या प्रताड़ना वाली गतिविधि को तुरंत रिपोर्ट कर सकते हैं। 

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कनिका मदान, स्कूल काउंसलर, डीपीएस, आर.के.पुरम, दिल्ली