जब मां बनीं स्टूडेंट और बेटियां टीचर: ऑनलाइन शॉपिंग से लेकर मेकओवर तक, ऐसे बदल रहा मां-बेटी का बॉन्ड
जीवन की पहली शिक्षक है मां तो बिटिया भी बन जाती है एक दिन उसकी पक्की सहेली। मां से मिलता ...और पढ़ें

डिजिटल दौर में ऐसे मजबूत हो रहा मां-बेटी का रिश्ता

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। देवयाना अपने कमरे में मोबाइल स्क्राल कर रही है। सोफे पर बिखरी हुई हैं उसकी किताबें और खाने-पीने के पैकेट। दरवाजा खुलता है और बालों में कंघा फंसाए उसकी मां रूबी कमरे में प्रवेश करती हैं। उनका हावभाव बता रहा है कि उन्हें आफिस जाने की जल्दी है।
वह जैसे ही आलमारी से कपड़े निकालकर ड्रेसिंग टेबल पर रखती हैं कि पीछे से देवयाना की आवाज आती है- क्या मम्मा, फिर से वही ओल्ड फैशन साड़ी। आपको अच्छा लगा तो पहन लो, लेकिन दूसरा ब्लाउज ट्राई करो तो ज्यादा सूट करेगा। आखिर ड्रेसिंग सेंस का एक अलग इंप्रेशन होता है न। वैसे, मेकअप आपका मैं करूंगी, इतनी तारीफ मिलेगी कि आप पार्लर जाना भूल जाओगी।
अरे नहीं बाबा प्लीज, फिर कभी तैयार कर देना। तुम अपने पेपर की तैयारी करो। मम्मा की बातों का देवयाना पर कोई असर नहीं हुआ। जैसे उसने कुछ सुना ही नहीं। उसने तो जैसे ठान लिया था कि मम्मा का मेकओवर करके रहेगी। रूबी को बिटिया की जिद का अंदाजा था इसलिए बुत बनकर खड़ी हो गईं- लो भई, जो करना है करो, पर जल्दी करना।
टेंशन क्यों ले रही आप, बस दो मिनट और रुको। आप ही तो कहती हो न कि टेंशन लेने से सब बिगड़ जाता है? देवयाना अपना काम जल्दी से पूरा करती है। मम्मा के लिए कैब बुक करती है। बेटी के बड़ी हो जाने का एहसास रूबी को आज पुलकित कर रहा था। कार में बैठते हुए उसकी नम आंखें मुस्कुरा रही थीं। जैसे कह रही हों- धन्यवाद बिटिया तुम्हारे होने के लिए।
समय के साथ इस तरह बदलते-ढलते मां-बिटिया के इस रिश्ते को घर, आस-पड़ोस और इंटरनेट मीडिया पर भी बखूबी देखा जा सकता है। जैसे, कुछ दिनों पूर्व इंस्टाग्राम पर एक वीडियो वायरल हुआ था। इस वीडियो में बिटिया मां को ऑनलाइन आर्डर करने का जो तरीका बता रही है मां उसे चरण दर चरण अपनी डायरी में लिखती जा रही है ताकि उनसे आगे कुछ ऑनलाइन आर्डर करने में कोई चूक न हो जाए।
बिटिया से सीखने का यह धैर्य और मां को सिखाने की यह उत्सुकता ही बता रही है मां-बिटिया के बीच बदलते रिश्ते की कहानी। एक-दूसरे से सीखने व सिखाने का यह उत्साह ही इस बंधन को और मजबूती देता है। बिटिया से जीवन को आसान करने वाले गुर सीखते हुए बच्चों की तरह उनकी आंखों में कौतूहल दिखता है। मांएं जब कुछ नया सीखकर आत्मनिर्भर बनने की खुशी में खिलखिला उठती हैं तो बेटियां इसे अपनी सबसे बड़ी जीत मानकर उमंगों से भर जाती हैं। ठीक उस शिक्षक की तरह जो अपने छात्र को सिखा पाने की कोशिशों के सफल होने पर खुशी महसूस करता है।
चुनौती यहां भी है
मां-बेटी का रिश्ता समय के साथ बदला है, पर मां बेटी के रिश्ते में एक बिंदु ऐसा आता है जब मां बिटिया पर भावनात्मक रूप से निर्भर हो सकती है। इतना कि वह हर बात खुलकर बताने लगती है। घर-परिवार ही नहीं बाहर की भी उन बातों को साझा करने लगती है जो उसे नहीं करनी चाहिए। जैसे, पति से कहासुनी, परिवार के किसी सदस्य का झगड़ा आदि-आदि। हालांकि, यदि बिटिया किशोर उम्र की है तो यह उसके अपने जीवन पर विपरीत प्रभाव छोड़ सकता है। हमेशा याद रहे कि आप मां हैं और आपको वही करना है जो बिटिया के हित में हो।
सृष्टि अस्थाना, मनोविज्ञानी
बिटिया ने सिखा दी अंग्रेजी
आरती अपनी दोनों बिटिया के अलग-अलग स्वभाव की चर्चा करते हुए उनकी बचपन की ढेरों किस्से साझा करती हैं। उनकी शैतानियां, चुहलबाजियां, खिलंदड़पन सबकी चर्चा करते हुए अचानक बिटिया के बड़े हो जाने के एहसास को बताते हुए भावुक हो उठती हैं। बेटियों से सीखने की बात पर ठहाके लगाते हुए कहती हैं- अब तो समय के हिसाब से बेटियों से भी सीखना ही होगा।
एक हमारा समय था जब हम मां से वो सब बातें कहना सोच भी नहीं सकते थे जो हमारी बेटियां धड़ल्ले से कह लेती हैं। बड़ी बिटिया नेहा उन्हें डिजिटल दुनिया में समायोजन के तरीके बताती है, आनलाइन शापिंग में मदद करती है तो छोटी ओजस्विनी उन्हें नए दौर में बेहतर बनने के उपाय समझाती है।
जैसे, ऑनलाइन मेड बुक करने में आरती कई बार मेड की पहचान को अधिक महत्व देती हैं तो ओजस्विनी हर इंसान की कीमत समझाती है। जब बेटियां उन्हें अंग्रेजी सीखने को कहती थीं तो उन्हें वह झिड़क देती थीं, पर अब बार-बार टोकने पर वह अंग्रेजी का सही उच्चारण करना सीख गई हैं।

उसने सीखा तो मैं क्यों नहीं
कनक को एक बेटा और एक बेटी है। बिटिया सान्वी की बातें करते हुए वह समय के हिसाब से बिटिया की परवरिश की चुनौती भी समझाती हैं। उनके अनुसार, अच्छा-बुरा क्या है, यह समझाना फर्ज है मां का। बिटिया इसमें बुरा भी मान जाती है, पर शायद आगे उसे इसका एहसास हो।
हालांकि, कनक यह कहना नहीं भूलतीं कि सान्वी बिटिया समझदार है। पढ़ाई में और व्यावहारिक जीवन में भी, पर क्या बिटिया से कुछ सीखती भी हैं- इस पर कनक थोड़ा ठहरकर कहती हैं- हां, क्यों नहीं? मैं उससे बहुत कुछ सीखती हूं। यह सब अदृश्य रूप से होता है। शायद बिटिया को इसका एहसास भी न हो।
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जो सबसे जरूरी चीज सीख रही हूं वह है कोई बात दिल पर नहीं लेनी चाहिए। किसी ने कुछ कह दिया तो उस पर मंथन करना सही नहीं। कनक के अनुसार, जब ऐसा होता है तो सान्वी मुझे समझाती है और उसकी सलाह मानकर मैं खुद को हल्का महसूस करती हूं। कनक आगे कहती हैं कि किसी का अपने स्वभाव को बदलना आसान नहीं, पर जब उम्र में इतनी कम होते हुए भी बिटिया यह सब सीख गई तो मैं क्यों नहीं कोशिश कर सकती?
तब रिश्ता और फलेगा
कुछ बातें ध्यान रखें तो यह रिश्ता और मजबूती से आगे बढ़ेगा, जैसे बिटिया पर अपनी राय न थोपें। प्रयास करें कि वह अपने अनुभवों से सीखे। उसे जीवन में क्या चुनना है, क्या नहीं इसका निर्णय करना आ जाए। उसे उसकी उम्र और वह जिस समय में बड़ी हो रही है यह समझ लें तो चीजें आसान हो जाएंगी। इसी तरह, बेटियों को भी चाहिए कि वे मां की उम्र और उसके दौर को समझने का प्रयास करें।
स्नेहा वशिष्ठ, रिलेशनशिप काउंसलर
