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स्कूल, ट्यूशन और फिर हॉबी क्लास... कहीं ओवर-शेड्यूलिंग तो नहीं बना रही बच्चे को चिड़चिड़ा?

Published: Sat, 14 Mar 2026 06:00 AM (IST)Updated: Sat, 14 Mar 2026 07:24 AM (IST)

आजकल माता-पिता बच्चों को पढ़ाई और हॉबी क्लासेस से इतना बिजी रखते हैं, जिससे वे मानसिक रूप से थक जाते हैं और चिड़चिड़े हो जाते हैं।

लक्षण जो चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आपका बच्चा 'ओवरलोडेड' है (Image Source: AI-Generated)

लक्षण जो चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आपका बच्चा 'ओवरलोडेड' है (Image Source: AI-Generated) 

HighLights

  1. जरूरत से ज्यादा बिजी शेड्यूल बच्चों में मानसिक थकान की वजह बनता है

  2. बच्चों की क्रिएटिविटी में सुधार करने के लिए फ्री-टाइम देना भी जरूरी है

  3. पढ़ाई और खेल के बीच संतुलन बनाकर ही आप बच्चों के बचपन को निखार सकते हैं

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सुबह 7 बजे स्कूल, दोपहर 2 बजे वापसी। जल्दी से खाना खाया और 3 बजे ट्यूशन। शाम 5 बजे डांस या क्रिकेट क्लास और फिर रात को स्कूल का होमवर्क। क्या आपके बच्चे का रूटीन भी कुछ ऐसा ही है? अगर हां, तो जरा रुककर सोचिए कि कहीं आप अपने बच्चे को इंसान की जगह एक 'रोबोट' तो नहीं बना रहे?

overscheduling kids

(Image Source: AI-Generated) 

मेंटल फटीग और ओवर-शेड्यूलिंग

आज के दौर में हर माता-पिता की यही चाहत होती है कि उनका बच्चा हर चीज में सबसे आगे रहे- पढ़ाई में भी और खेल-कूद में भी। इसी चाहत में हम जाने-अनजाने में बच्चों का पूरा दिन क्लास और एक्टिविटीज से इस कदर पैक कर देते हैं कि उन्हें खुद के लिए भी फुर्सत नहीं मिलती। इसे ही 'ओवर-शेड्यूलिंग' कहते हैं। लगातार एक काम से दूसरे काम की तरफ भागने से बच्चों का दिमाग थक जाता है।

बिना बात रोना और हर वक्त सुस्ती

क्या आपने ध्यान दिया है कि आजकल आपका बच्चा छोटी-छोटी बातों पर झल्लाने लगा है? क्या वह अक्सर थका हुआ और सुस्त रहता है या बिना बात के रोने लगता है? ये सभी इस बात के संकेत हैं कि आपका बच्चा जरूरत से ज्यादा व्यस्त है। जब बच्चों को अपनी मर्जी से खेलने, आराम करने या बिना कुछ किए शांति से बैठने का समय नहीं मिलता, तो उनका दिमाग तनाव में आ जाता है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन घर कर लेता है।

signs of an overwhelmed child

(Image Source: AI-Generated) 

स्मार्ट पेरेंट्स की नई ट्रिक

बच्चों के दिमागी विकास के लिए 'खाली समय' बहुत जरूरी है। जी हां, कभी-कभी उन्हें बोर होने दीजिए। जब बच्चे बोर होते हैं, तभी वे कुछ नया सोचते हैं और उनकी क्रिएटिविटी बाहर आती है। उन्हें बिना किसी नियम के पार्क में दौड़ने, मिट्टी में खेलने, या बस अपनी मर्जी से खिलौनों के साथ वक्त बिताने का मौका मिलना चाहिए।

फर्स्ट आना नहीं है सफलता की गारंटी

जाहिर है कि स्कूल और पढ़ाई बहुत जरूरी हैं, और बच्चों को नई चीजें सिखाना भी अच्छी बात है। लेकिन इन सबके बीच एक सही संतुलन होना चाहिए। याद रखिए, बचपन कोई रेस नहीं है जिसमें बच्चे को हर हाल में फर्स्ट आना है, यह जिंदगी का वो खूबसूरत समय है जिसे खुशी से जीना जरूरी है। बच्चों का टाइम-टेबल थोड़ा हल्का कीजिए, उन्हें खुलकर सांस लेने दीजिए और फिर देखिए कि उनकी वह प्यारी-सी मुस्कान कैसे लौट आती है।

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