विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

लुक्स के चक्कर में कहीं खो तो नहीं रहा आपके बच्चे का कॉन्फिडेंस? ऐसे समझाएं उसे ब्यूटी का असली मीनिंग

Published: Sun, 13 Sep 2026 11:34 AM (IST)

किशोरावस्था आयु का वह काल है, जब बच्चों को अपने रूप-रंग को लेकर होने लगती है कुंठा। बाजार में उपलब्ध ...और पढ़ें

समझाएं सुंदरता का सही अर्थ (Image Source: AI-Generated)

समझाएं सुंदरता का सही अर्थ (Image Source: AI-Generated)

timer icon

समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

डॉ. मोना गुजराल, नई दिल्ली। बीते दिनों फराह खान जब अभिनेत्री व ब्यूटी पैजेंट में भाग ले चुकी आकांक्षा चौधरी के घर यूट्यूब व्लाग बनाने गईं तो वहां आकांक्षा ने बताया कि वो टीनएज में स्वयं को बेहद बदसूरत महसूस करती थीं। तब फराह ने बताया कि उनकी बेटी भी ऐसा ही सोचती है।

देखा जाए तो किशोरावस्था हर बच्चे के जीवन का वह मोड़ है जहां उसका शरीर और मन एक साथ बड़े बदलावों से गुजरते हैं। जहां वे स्वयं को अक्सर 'अग्ली डकलिंग' या बदसूरत समझने लगते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वो सचमुच आकर्षक नहीं है, बल्कि यह वह समय है जब वह खुद को अजीब, बेडौल और अपने ही शरीर को लेकर असहज महसूस करने लगता है। पहले जो बच्चा बेझिझक तस्वीरें खिंचवाता था, वह अचानक आईने के सामने घंटों बिताने लगता है, फोटो खिंचवाने से कतराता है या बार-बार पूछता है-'क्या मैं ठीक दिख रहा हूं?' सौंदर्य उत्पाद से भरा बाजार इन बच्चों, खास तौर पर किशोरियों को इस ओर आकर्षित करता है। जिसमें उलझकर वे अक्सर स्वयं को ही नुकसान पहुंचा लेते हैं।

इंटरनेट मीडिया पर तुलना का दौर

आज के दौर में किशोरावस्था की यह उलझन पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। इंटरनेट मीडिया, ब्यूटी फिल्टर्स और विज्ञापन बच्चों के सामने सुंदरता का ऐसा झूठा पैमाना पेश करते हैं, जो वास्तविकता से बहुत दूर है। टीनेजर्स अक्सर अपने रोजमर्रा के अनफिल्टर्ड लुक की तुलना दूसरों की चुनिंदा और एडिट की गई तस्वीरों से करने लगते हैं। इस उम्र में दोस्तों की स्वीकृति सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है, इसलिए वे खुद को दूसरों की नजरों से देखने लगते हैं।

समझें उनका दबाव

बच्चों को सीधे यह कहना कि 'दूसरों की बातों पर ध्यान मत दो'- काम नहीं करता। यदि वे नए फैशन या हेयरस्टाइल के साथ प्रयोग करना चाहते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। बस उनसे एक सवाल पूछें: 'क्या तुम यह इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम्हें पसंद है, या इसलिए कि तुम्हें लगता है इसके बिना दोस्त तुम्हें स्वीकार नहीं करेंगे?' किशोरावस्था बाहरी दिखावे से हटकर अपनी आंतरिक पहचान बनाने का सफर है। अंतिम लक्ष्य बच्चों को यह महसूस कराना नहीं है कि वे हर दिन खूबसूरत दिखते हैं, बल्कि उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि जिस दिन वे सुंदर महसूस न भी कर रहे हों, उस दिन भी वे उतने ही अनमोल, काबिल और प्यार के हकदार हैं।

समझें बारीक अंतर

अधिकतर बच्चे समय के साथ अपने बदलते शरीर और लुक्स को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अगर यह चिंता उनके दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो इसे नजरअंदाज न करें। बच्चा अपने शरीर के किसी एक हिस्से को लेकर अत्यधिक तनाव में रहे, आईने को बार-बार देखे या खुद को पूरी तरह छुपाने लगे और बाहर जाना बंद कर दे तो यह उसे बाडी डिस्मार्फिक डिसआर्डर की ओर ले जा रहा है। अगर बच्चा अचानक खाने-पीने से पूरी तरह परहेज करने लगे, वजन बढ़ने का बहुत ज्यादा डर सताने लगे या जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करने लगे तो यह उसे ईटिंग डिसआर्डर की ओर धकेल रहा होता है। यदि यह चिंता आपके बच्चे की पूरी जिंदगी को नियंत्रित करने लगे, तो किसी मनोवैज्ञानिक से संपर्क करना बहुत आवश्यक है।

माता-पिता के लिए जरूरी मार्गदर्शन

  • बचें ऐसा कहने से: जब बच्चा कहे कि 'मैं बदसूरत हूं', तो अक्सर माता-पिता प्यार में कह देते हैं, 'अरे नहीं, तुम तो बहुत प्यारे हो!' यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक है, लेकिन इससे बच्चे की समस्या हल नहीं होती। बच्चा यह नहीं पूछ रहा कि वह कैसा दिख रहा है, बल्कि वह यह महसूस कर रहा है कि वह 'पर्याप्त नहीं है'। इसके बजाय कहें कि 'मुझे लग रहा है कि तुम आजकल अपने लुक्स को लेकर थोड़ा असहज महसूस कर रहे हो। मुझे बताओ कि तुम्हें क्या परेशानी लग रही है?'
  • सिखाएं सवाल उठाना: इंटरनेट मीडिया को पूरी तरह रोकने के बजाय बच्चों को इसके प्रति सजगता सिखाएं। उनसे पूछें कि 'जो तस्वीर उन्हें सबसे ज्यादा पसंद आ रही है वो किसने बनाई? इसमें कौन सा फिल्टर या लाइटिंग इस्तेमाल हुई है? क्या कोई इंसान हर वक्त ऐसा दिख सकता है?' उन्हें समझाएं कि सुंदरता किसी एक तय सांचे का नाम नहीं है।
  • बाहरी रंगत तक सीमित न रखें पहचान: अगर आप हमेशा बच्चे के लुक्स की तारीफ करेंगे, तो वह अपनी कीमत सिर्फ शक्ल-सूरत से आंकने लगेगा। उन खूबियों को सराहें, जिनका लुक्स से कोई लेना-देना नहीं है। जैसे कि 'मुझे बहुत अच्छा लगा कि तुमने उस परिस्थिति को कितने धैर्य से संभाला।' या 'तुम बहुत संवेदनशील और वफादार दोस्त हो।'

यह भी पढ़ें- बच्चा खुद के रंग-रूप और बॉडी इमेज को लेकर रहता है हीनभावना में? पेरेंट्स इन तरीकों से बनाएं उन्हें कॉन्फिडेंट

यह भी पढ़ें- पेरेंट्स की 'सही सलाह' भी बच्चों को क्यों लगती है बुरी? वजह जानकर आप भी बदल देंगे अपना तरीका