नई दिल्‍ली, जेएनएन। त्रिपुरा में कोमिल्ला के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट स्टीवेंस ने अपने जिले से क्रांतिकारियों का सफाया करने का कुचक्र चला रहा था। वह क्रांतिकारियों को इतनी कड़ी सजाएं दे रहा था कि सुनकर ही लोग सहम जाएं। लेकिन क्रांतिकारी भारत माता को आजाद कराने के लिए संकल्पित थे, वे कहां डरने वाले थे। उन्होंने स्टीवेंस को उसकी क्रूरता के लिए दंड देने का विचार किया। स्टीवेंस भी खतरे से सावधान था। वह सुरक्षा का पूरा ध्यान रख रहा था। अदालत कम जा रहा था, अधिकांश काम वह अपने बंगले से ही निपटा देता था। उसके बंगले पर हमेशा पुलिस तैनात रहती थी। मिलने जाने वालों की तलाशी ली जाती थी।

14 दिसंबर, 1931 को शांति घोष और सुनीति चौधरी नाम की कक्षा आठ में पढऩे वाली दो छात्राएं, जिनकी उम्र मात्र तेरह-चौदह वर्ष थी। बग्घी में बैठकर मजिस्ट्रेट स्टीवेंस के बंगले पर पहुंचीं और उन्होंने पहरे के संतरी से कहा कि हम लोग मजिस्ट्रेट साहब से मिलना चाहते हैं। एक लड़की ने एक पर्चे पर दोनों के असली नाम न लिखकर छद्म नाम लिख दिए और वह पर्चा मजिस्ट्रेट को भिजवा दिया। स्टीवेंस ने दरवाजे पर आकर बालिकाओं के भेंट की। बालिकाओं ने उन्हें बताया कि हम लोग तैराकी की एक प्रतियोगिता आयोजित कर रही हैं, जिसके लिए वे शासकीय व्यवस्था का सहयोग चाहती हैं। उन्होंने एक आवेदनपत्र भी उसे दिया। उस पर मजिस्ट्रेट ने लिख दिया- प्रधानाध्यापिका अपना अभिमत दें।

यह वाक्य लिखकर उसने वह पर्चा एक बालिका के हाथ में दे दिया। जिस समय वह पर्चा लौटा रहा था, दूसरी बालिका ने अपना रिवाल्वर निकालकर निकट से उस पर दो गोलियां दाग दीं। गोलियां खाकर मजिस्ट्रेट अंदर भागा और कमरे में छाती के बल गिर पड़ा। उसके साथी एसडीओ तथा पहरेदारों ने दोनों बालिकाओं को पकड़ लिया। स्टीवेंस को एक गोली दिल पर लगी थी, इसलिए उसकी थोड़ी ही देर में मौत हो गई। दोनों बालिकाओं शांति घोष और सुनीति चौधरी पर 18 जनवरी, 1932 को मुकदमा चला और 27 जनवरी को निर्णय सुना दिया गया। दोनों ही बालिकाओं की उम्र 16 वर्ष से कम थी, इसलिए उन्हें फांसी न देकर आजीवन कारावास की सजा दी गई।

पुस्तक 'आजादी के अनोखे व रोमांचक प्रसंग' से साभार संपादित अंश

Edited By: Sanjay Pokhriyal