डा. सत्येंद्र पाल सिंह। बालक की सहजता एवं सरलता को अध्यात्म ने श्रेष्ठ माना है। उसे अधिक ज्ञान नहीं होता। चातुर्य, वाक्पटुता और तर्कशक्ति भी नहीं होती। एक बालक स्थितियों को ठीक वैसे ही लेता है, जैसी स्थिति उसके समक्ष उत्पन्न होती हैं। वह जैसा प्रसन्न अथवा क्रोधित होता है वैसा ही खुलकर प्रकट करता है। अपनी भूख, प्यास बताने में उसे कोई संकोच नहीं होता। उसे जो चाहिए उसे प्राप्त करके ही सहज होता है। बालक का अंतस जैसा है वैसा ही उसका प्रकट रूप भी है। परमात्मा भी वैसा ही है। परमात्मा दयालु, कृपालु है तो उसकी दया एवं कृपा प्रकट भी होती है। परमात्मा की निर्दयता का एक भी उदाहरण नहीं दिया जा सकता। जब से सृष्टि बनी है तब से वह दया और कृपा ही किए जा रहा है। मनुष्य की बर्बरता तथा कठोरता के बाद भी यह सृष्टि चल रही है। नदियों में पानी प्रवाहित हो रहा है। वनस्पतियां फल-फूल रही हैं। पक्षी चहक कर वातावरण में मधुर तरंग छेड़ रहे हैं। यही सरलता एवं सहजता जब बालक में प्रकट होती है तो परमात्मा तथा उसके मध्य का अंतर लगभग समाप्त हो जाता है। भारतीय संस्कृति में बच्चे को ईश्वर रूप मानने का यह मुख्य कारण है।

बच्चे के गुण उसे परमात्मा के समकक्ष खड़ा करते हैं, उसकी आयु नहीं। गुणों का आयु से कोई संबंध नहीं है। मनुष्य ज्ञान प्राप्त करे, किंतु ज्ञान का अहंकार न करे। अपनी बुद्धि, कौशल को परमात्मा का दान मानकर परमात्मा के गुणों के अनुरूप आचार-व्यवहार में प्रकट करे। परमात्मा के न्याय को संशयहीन होकर प्रसन्नता से स्वीकार करे और विश्वास करे। अपनी कामनाओं को सीमित करना सीख जाए। एक बालक भी यही करता है। वह अपने माता-पिता की बुद्धि के अनुसार चलता है, क्योंकि उसे विश्वास होता है कि इससे वह सुरक्षित है। वस्तुत: मनुष्य जब अपने विचार एवं आचार का अंतर मिटाकर परमात्मा की अंगुली पकड़ना सीख जाता है तो जीवन पथ पर चलना सरल हो जाता है।

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Edited By: Priyanka Singh