विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 10, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सादा जीवन जीने वाले विनोबा भावे कोठरी को भी मानते थे आस्था का स्थल, उनकी जन्म जयंती पर जानिए एक अनुभव

By Aarti TiwariEdited By:
Published: Sat, 10 Sep 2022 03:03 PM (IST)

स्वतंत्रता सेनानी विनोबा भावे को जेल की छोटी सी कोठरी भी साधना का आश्रम लगती थी। उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक गीता ...और पढ़ें

जेल में सादा जीवन बिताते विनोबा भावे। इलस्ट्रेशन ओम सिंह
जेल में सादा जीवन बिताते विनोबा भावे। इलस्ट्रेशन ओम सिंह

 सच्चे आश्रमी जीवन का अनुभव तो जेल में ही हुआ। गिनती के कपड़े, पानी का टमलर और एक कटोरा, बस इतना ही सामान। इससे अधिक असिग्रह-व्रत का पालन और कहां हो सकता था? नियमानुसार नहाना, खाना, काम करना और घंटी की आवाज पर सोना और जागना। बीमार पड़ने की भी अनुमति नहीं। भोजन में अस्वाद-व्रत का पालन तो प्रतिदिन होता ही था। इससे अधिक संयम का पालन हम आश्रम में कहां कर पाते हैं? और फिर चिंतन-मनन के लिए भरपूर समय। जेल भी आश्रम-जीवन की साधना का अंग बन सकता है।

जेल में सबके साथ रहने का जो मौका मिलता गया, उससे मुझे बहुत लाभ हुआ। व्यक्तिगत सत्याग्रह के पहले दो बार जेल जाना हुआ था। पहली बार 1923 में नागपुर झंडा सत्याग्रह के सिलसिले में पकड़ा गया था। उस समय पहले मुझे नागपुर जेल में रखा, फिर वहां से अकोला जेल भेज दिया। उस समय अपराधी लोगों के लिए जो धारा लगाई जाती है, वही मुझ पर लगाई गई थी, इस कारण जेल में मुझे पत्थर तोड़ने की सख्त मजदूरी का काम दिया गया था।

वहां मुझे एक दफा ‘सालिटरी सेल’ (एकांत कोठरी) में रखा गया। छोटा सा आठा फीट चौड़ा और नौ फीट लंबा कमरा था। काम कुछ नहीं दिया था। पढ़ने के लिए किताबें, पेंसिल, कागज कुछ भी साथ नहीं रखने देते थे। बाहर जाने की भी छूट नहीं। बिल्कुल पागल बनाने का ही कार्यक्रम था। परंतु मैंने तो अपना दिनभर का कार्यक्रम बना लिया था। कुल दस घंटे सोता था। दो-तीन घंटे ध्यान। तीन-एक घंटे खाना-पीना, नहाना धोना इत्यादि और आठ घंटे अंदर ही टहलना। दिनभर में कम से कम दस मील घूमता था। मैं मानता था कि मेरी गति डेढ़ मील प्रति घंटे की थी। जो पद्य मुझे कठस्थ थे, उस दौरान वे गाता रहता था।

एक बार रात को एक बजे रोज की भांति मैं चक्कर काट रहा था और मेरा चिंतन चल रहा था। उतने में वार्डन आया। उसने मुझे चक्कर काटते हुए देखकर दरवाजा खटखटाया। मैं तो चिंतन में डूबा हुआ था, जबाव कौन देता। वह बेचारा घबरा गया, नजदीक आकर हिलाकर मुझे पूछने लगा, क्या हुआ है? फिर मैंने चिंतन का अर्थ, चिंतन के परिणाम आदि उसको समझाए, तो वह प्रसन्न हो गया। दूसरे ही दिन प्रसादरूप में उसने मुझे थोड़ी देर खुली जगह घूम सकूं, ऐसी इजाजत दे दी।

मुझे तो उस छोटी सी कोठरी में भी आराम मालूम होता था। रात को तीन घंटे ध्यान करता था। एक सिपाही रोज मुझे देखता और वहां आकर बैठ जाता। एक दिन लालटेन लेकर आया। मेरी आंखें खुल गईं। वह कहने लगा, मैं कल जाने वाला हूं, मुझे कुछ उपदेश दीजिए। उसने सोचा रोज आंखें बद करके बैठता है, कोई साधु-योगी होगा। फिर मैंने उसके समाधान के लिए कुछ बातें बताईं। वह प्रसन्न होकर चला गया।

15 दिन मुझे वहां रखा था। उस वक्त गीता का श्लोक मुझे खुल गया-

कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य:।

स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत।।(4.18)

आखिर जेलर ने देखा कि इसको यहां कोई तकलीफ नहीं, अपनी मस्ती में रहता है, तो वापस जनरल वार्ड में भेज दिया। मेरे लिए तो वहां भी आनंद ही था।

1932 में धुलिया जेल में छह माह रहा। हमारे साथ बहुत से साथी ऐसे होते थे, जिनको जेल का जीवन नीरस लगता था, क्योंकि उनको सातत्य की कला नहीं सधती थी। उनको मानसिक कष्ट भी हुआ करते थे। इसलिए जो भी कोई जेल में थे, उनको आनंद देना मेरा काम होता था। हमारे साथ के भाइयों की हिम्मत न टूटे-माफी वगैरह मांगने का तो सवाल ही नहीं था, पर उन्हें वहां के जीवन में रुचि पैदा हो, इसकी कोशिश करना, यह मेरा काम था। धुलिया जेल में ऐसा एक भी राजनैतिक कैदी नहीं था, जिससे मेरा व्यक्तिगत परिचय न हुआ हो।

उस वक्त राजनैतिक कैदियों को काम दिया जाता था, लेकिन वह ‘सी’ क्लासवालों को दिया जाता था। मुझे ‘बी’ क्लास मिला था, लेकिन मैंने जेल में जाते ही जेलर से काम मांगा। मुझे देखकर जेलर कहने लगा, ‘आप तो पहले ही कमजोर हैं, आपको हम कैसे काम दे सकते हैं?’ मैंने कहा, ‘मैं यहां खाना खाता हूं, बिना श्रम किए खाना, यह मेरा धर्म नहीं है। इसलिए यदि काम न मिला तो कल से मुझे खाना छोड़ना पडे़गा।’ तब जाकर जेलर ने मेरी बात मान ली और कहा कि मैं अपनी इच्छानुसार कोई काम चुन सकता हूं।

धुलिया जेल में तो मुझे सतसमागम ही मिला। सानेगुरुजी, जमनालाल बजाज, आपटेगुरुजी जैसे लोग वहां थे। इन सबने सलाह दी कि विनोबा गीता पर रोज कुछ कहे, मैंने कबूल किया और हर इतवार मैं गीता पर प्रवचन करने लगा। सानेगुरुजी ने वे सारे प्रवचन शब्दश: लिख लिए। ऐसे व्यक्ति ने गीता प्रवचन लिखकर दुनिया पर बड़ा उपकार किया। उस समय किसी को खयाल तक नहीं था कि जेल में हुए ये प्रवचन देशभर में सभी भाषाओं में फैलेंगे। गीता तो रणक्षेत्र पर ही कही गई थी, वहां जेल में भी यही भावना थी आखिर हम स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक हैं। वे पवित्र अनुभव मैं कभी भूल नहीं सकता। गीता प्रवचन करते हुए मेरी क्या वृत्ति थी, मैं शब्दों में कह नहीं सकता। परंतु अगर कुछ शब्द परमेश्वर मनुष्य की ओर से बुलवा लेता है, ऐसा हो तो माना जाएगा कि वे सभी शब्द परमेश्वर ने ही बुलवा लिए हैं।

(विनोबा भावे की ‘अहिंसा की तलाश’ किताब से साभार)