‘पिंक’ की सफलता के बाद जिंदगी में क्या बदलाव आया?
जिंदगी में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। बस लोगों का नजरिया मेरे लिए बदल गया है। वे मुझे गंभीरतापूर्वक लेने लगे हैं। अब मुझे बड़े हीरो वाली फिल्में ऑफर हो रही हैं। सो, अब दूसरे किस्म का संघर्ष शुरू हो गया है। ‘पिंक’ से पहले मैं एक हार्टहिटिंग फिल्म ढूंढती थी। अब संघर्ष ‘ए’ लिस्ट में शामिल होने का है।
‘रनिंग शादी डॉट कॉम’ के दौरान आपको ‘पिंक’ ऑफर हुई थी?
यह सच है कि ‘रनिंग शादी डॉट कॉम’ की वजह से मुझे ‘पिंक’ मिली थी। शुजीत दा उसके भी निर्माता हैं। उस दौरान उनसे एक-दो संक्षिप्त मुलाकातें ही हुई थीं। हम तफसील से नहीं मिले थे। उन्होंने ‘रनिंग शादी डॉट कॉम’ का फुटेज देखकर मुझे ‘पिंक’ ऑफर की थी। ‘रनिंग शादी डॉट कॉम’ मेरे कॅरियर की लाइफ चेंजर रही है। इसमें निर्देशक अमित राय ने मुझसे उम्दा काम लिया है। इस फिल्म के कारण ही मुझे अपने प्रोफेशन से वाकई प्यार हुआ। पहले मैं साउथ में काम करती थी। ‘चश्मेबद्दूर’ पहली हिंदी फिल्म थी। ‘रनिंग शादी डॉट कॉम’ के बाद अहसास हुआ कि मैं अपनी भाषा में कितने प्रयोग कर सकती हूं। बॉडी लैंग्वेज सहज होती गई। इस फिल्म से अहसास हुआ कि अपनी परफॉर्मेंस से कितना खूबसूरत संसार रच सकती हूं।
साउथ में कैसी दिक्कतें पेश आईं?
शुरुआत में मेरे लिए वहां की भाषा काला अक्षर भैंस बराबर थी। यही हाल उनका मेरे लिए था। समझ ही नहीं आता था कि कहां पॉज देना है कहां एक्सप्रेशन? सब कुछ किसी रोबोट की माफिक था। निर्देशक जैसा बताते, वैसा कर लेती थी। बाद में मैंने वहां की भाषा सीखी, तब आसानी हुई। अब तेलुगू फर्राटेदार बोल लेती हूं। तमिल समुचित रूप से बोल नहीं पाती पर समझ आती है।
साउथ में काम करने का कितना लाभ हिंदी फिल्मों में मिला?
बहुत ज्यादा। अभिनय की मूलभूत जानकारियों से अवगत हुई। कैमरे और लाइट की समझ विकसित हुई। उसका श्रेय निश्चित रूप से साउथ को जाता है। मुझे लगता है लोगों को मेरा प्रोफेशनल रहना पसंद है। यही वजह है कि अपने तीनों पुराने निर्माता-निर्देशकों के साथ दोबारा काम कर रही हूं। भले वो डेविड धवन हों, शुजीत सरकार या नीरज पांडे। वहां से मैंने फिल्मी दुनिया के तौर-तरीकों को सीखा। वहां की हिट और फ्लॉप से सीख ली कि फिल्म अच्छी बन रही होती है तो कैसी फीलिंग आती है। जो गलतियां वहां की थी यहां पर नहीं दोहराती हूं।

किस तरह की गलतियों की बात कर रही हैं?
मेरा कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं रहा है। मैं फिल्मी दुनिया के तौर-तरीकों से अनभिज्ञ रही हूं। अपने फैसलों के लिए दूसरों की मदद लेती थी। लगता था कि वे इंडस्ट्री में वर्षों से हैं तो उनके फैसले सही होंगे। मुझे लगता था कि सुपरस्टार हीरो वाली फिल्म करनी चाहिए। मार्केट में दिखने के लिए फिल्में करना जरूरी हैं भले ही वे आपको नापसंद हों। मैंने वह सब किया। उन फैसलों की वजह से कई फ्लॉप फिल्में मेरे खाते में आईं। ठोकर खाने पर अहसास हुआ कि दूसरों की नहीं, अपनी बुद्धि से काम करना चाहिए। हिंदी सिनेमा में यही फंडा अपनाती हूं।
युवाओं के शादी से भागने की क्या वजह मानती हैं?
हमारी फिल्म के नायक-नायिका शादी से भाग नहीं रहे हैं। उन्हें शादी से फोबिया नहीं है बल्कि वे तो शादी के समर्थन में हैं। तभी लोगों को भागकर शादी करने में मदद कर रहे हैं। हमारे देश में लव मैरिज को नापसंद किया जाता है। हमारे यहां लड़का-लड़की एक-दूसरे को पसंद है या नहीं, यह अहम नहीं है बाकी चीजें अहमियत रखती हैं। जैसे परिवार को पसंद हो, उनकी कुंडली मिल रही हो, उनका अपना स्टेटस हो। माता पिता जब बच्चों की पसंद को नजरअंदाज करते हैं तो वे भागने का रास्ता अख्तियार करते हैं। इस फिल्म में हम पैसे लेकर भगाकर शादी कराते हैं। मामला ठंडा होने तक उन्हें सुरक्षित रखने की भी हमारी जिम्मेदारी है। बहरहाल, असल जिंदगी में मैंने कुछ लोगों से सुना है कि शादी झंझट है। मुझे लगता है कि उनके अनुभव कड़वे रहे होंगे। मैं शादी के कतई खिलाफ नहीं हूं। मैंने सफल और विफल दोनों किस्म की शादी देखी हैं। शादी करना हर किसी का निजी फैसला होता है।
इस फिल्म में अपने किरदार के बारे में बताएं?
मैं निम्मी की भूमिका में हूं। निम्मी कारनामा करने के बाद सोचती है। वह बहुत मासूम है। कितनी भी खुराफात करे लेकिन आप उससे नफरत नहीं कर सकते। निम्मी का अपने माता-पिता के साथ जैसा संबंध है, ठीक वैसा मेरा अपने माता-पिता के साथ है। मैंने अपनी कुछ निजी चीजें किरदार में डाली हैं। मेरा पापा के सामने मुंह नहीं खुलता। घर से बाहर कदम रखते ही मुझसे बड़ी शेरनी कोई नहीं। वही स्थिति निम्मी की है। डायलॉग भी कुछ ऐसे हैं जिनका मैंने असल जिंदगी में प्रयोग किया है। जैसे ट्रेलर में डायलॉग है ‘तुम अपना मुंह बंद रखो’। यह स्क्रिप्ट में नहीं था। बचपन में हम बहनों में झगड़ा होने पर मैं यही बोलती थी। खैर, मेरी बहन ने फिल्म देखी है। उसका कहना है कि ऐसा लग रहा है कि यह वाकई तुम हो।
‘नाम शबाना’ की शबाना कैसी है? आने वाली बाकी फिल्मों के बारे में भी बताएं?
‘बेबी’ में आपने मेरा किरदार देखा होगा, उसी किरदार की बैकस्टोरी है। ‘बेबी’ की रिलीज के समय मेरे किरदार को काफी अटेंशन मिली थी, जिसकी वजह से नीरज पांडे ने तय किया कि उसकी कहानी लिखी जाए। उसकी शूटिंग लगभग पूरी हो गई है। उसमें दिखाया जाएगा कि कैसे वह किरदार रॉ एजेंट बना। दर्शक उसमें मुझे एक्शन करते देखेंगे। यह किरदार मेरे कंफर्ट जोन से बाहर का है। इसमें यह नहीं दिखाया गया है कि एक्शन के लिए मुझे लेदर बूट या लेदर पैंट और जैकेट पहनना जरूरी है। एक्शन सलवार-सूट में भी किया जा सकता है। लोगों को आश्चर्य हुआ था कि कैसे मैंने सलवार-कमीज में ‘बेबी’ में एक्शन किया था। वहीं ‘द गाजी अटैक’ सब-मरीन में शूट हुई है। वह मेरे लिए नया अनुभव था। उसके लिए भव्य सेट बनाया गया। वह भी शानदार फिल्म है। उसमें मेरा कैमियो है। ‘जुड़वां-2’ को लेकर मैं बहुत एक्साइटेड हूं। डेविड धवन की लगभग सारी फिल्में मैंने देखी हैं। उनके गाने मेरे पसंदीदा रहे हैं। जब ‘चश्मेबद्दूर’ की, तब भी बहुत खुश थी। ‘जुड़वां’ को मैंने थिएटर में देखा था। उसके गानों पर मैं अभी भी नाच सकती हूं। मेरी एक अन्य फिल्म ‘मखना’ भी रोमांटिक कॉमेडी है। उसके दो गाने शूट होने बाकी है।
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Posted By: Srishti Verma

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