अमित तिवारी। बीते कल ही देश में संविधान दिवस मनाया गया है। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की पैरवी करता है, परंतु आज सात दशक के बाद भी हम उन उद्देश्यों से दूर हैं, जिनके साथ संविधान निर्माताओं ने इसे तैयार किया था। सचिन कुमार जैन का कहानी संग्रह ‘जीवन में संविधान’ इसी ओर हमारा ध्यान खींचता है।

लेखक ने असल में कहानियां नहीं लिखी हैं, बल्कि हमारे जीवन में प्रतिदिन घटित होने वाली उन बहुत-सी घटनाओं को शब्द दिए हैं, जिनकी हम प्राय: अनदेखी कर देते हैं। उन्होंने कई छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से हमारे जीवन के उस स्याह पक्ष को सामने रख दिया है, जिसे कोई स्वीकारना नहीं चाहता है। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि भले ही संविधान समानता, समता और सबको सम्मानजनक जीवन देने की बात करता हो, लेकिन भेदभाव के अनगिनत स्वरूप कुछ इस तरह हमारे जीवन में रच-बस गए हैं कि कहीं उनका उल्लंघन होता देखकर भी हमें रंचमात्र उसका अनुभव नहीं होता है।

विन्यास की दृष्टि से देखें तो लेखक ने जीवन की घटनाओं को बहुत सधे हुए और सीमित शब्दों में लघुकथाओं का रूप दिया है। हर कहानी के अंत में संविधान के प्रविधान का उल्लेख करते हुए हमारा ध्यान उस ओर ले जाना, इस संग्रह की बड़ी विशेषता है। यही विशेषता पुस्तक के नाम ‘जीवन में संविधान’ को सार्थक करती है। इसके माध्यम से हमें यह समझने में आसानी होती है कि कब, कहां और कैसे हमारे ही सामने हमारे संविधान के महान उद्देश्य को तार-तार किया जाता है। कभी हम उस अपराध के भागी होते हैं और कभी मूकदर्शक बने रहकर देख रहे होते हैं। इन कहानियों को हमें इसलिए भी पढ़ना चाहिए, ताकि हम भी अपने जीवन में संविधान के महत्व को समझ सकें और जब, जहां, जैसे संभव हो, संविधान निर्माताओं के महान उद्देश्य की पूर्ति में अपना योगदान देने के लिए तत्पर हो सकें।

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पुस्तक : जीवन में संविधान

लेखक : सचिन कुमार जैन

प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन

मूल्य : 250 रुपये

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Edited By: Vivek Bhatnagar

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