धर्मेंद्र सिंह गौतम। प्राचीन काल में भारत की समृद्धि की चर्चा पूरे विश्व में थी, जिससे आकर्षित होकर लुटेरों-हमलावरों के आक्रमण होते रहते थे। तमाम आक्रांताओं ने भारत को जी भरकर लूटा था और अंग्रेजों ने भी वही किया। अंग्रेजों ने भारतीय वस्त्र उद्योग समेत तमाम उद्योगों को नष्ट कर दिया। भारत की स्वास्थ्य एवं चिकित्सा प्रणाली पूरे विश्व के लिए उदाहरण थी। विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय तक्षशिला भारत में था। ईसा के एक हजार वर्ष पहले यह स्थापित हुआ था। जब तक्षशिला बंद हुआ, उसी दौर में विश्व प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। तुर्कों से लेकर मुस्लिम आक्रांताओं और उसके बाद अंग्रेजों ने भी भारत की शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने का भरपूर प्रयास किया, परंतु हमारी ऋषि परंपरा के कारण वे लोग भारतीय ज्ञान को छिन्न-भिन्न नहीं कर पाए।

इस पुस्तक के लेखक प्रशांत पोल ने यह दर्शाने का प्रयास किया है कि विदेशी ताकतों के विरुद्ध हमारे महापुरुषों और वीरांगनाओं द्वारा किए गए संघर्षों के अध्ययन से पता चलता है कि स्थानीय जीवन पद्धति और मूल्यों को बचाए रखने के लिए राष्ट्रीय आंदोलन की उत्प्रेरक शक्ति 'स्व' का कितना महत्व रहा। उस समय भी विदेशी ताकतों द्वारा 'स्व' को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा था। वैसे तो अंग्रेजों का भारत में प्रवेश 17वीं शताब्दी में हो गया था। वर्ष 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना से लेकर लूटपाट और बर्बरता का सिलसिला शुरू हुआ, जो 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक चलता रहा। कुल 190 वर्षों तक अंग्रेजों का शासनकाल विनाश काल था। उस समय वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 33 प्रतिशत थी, जबकि अंग्रेजों की मात्र तीन प्रतिशत, परंतु ब्रिटिश लूट ने भारत को विपन्न बना दिया। पुस्तक में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है कि कैसे अंग्रेजों ने भारतीय सुव्यवस्था को छिन्न-भिन्न किया। इस लिहाज से यह पुस्तक ज्ञानवर्धक है, जिसे प्रत्येक नागरिक को पढ़ना चाहिए।

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पुस्तक : विनाशपर्व : अंग्रेजों का भारत पर राज

लेखक : प्रशांत पोल

प्रकाशक : प्रभात पेपरबैक्स

मूल्य : 250 रुपये

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Edited By: Vivek Bhatnagar

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