नई दिल्ली, अनुराग मिश्र/ पीयूष अग्रवाल। कोरोना की वजह से दुनियाभर में वर्क फ्रॉम होम का कल्चर बढ़ा है। क्वारंटीन, लॉकडाउन और खुद को अलग रखने की वजह से दुनियाभर में करोड़ों लोग घर से काम कर रहे हैं। कोरोना जैसी आपदा के दौरान सीमित संसाधनों और सुरक्षा कारणों से इसके फायदे पूरी तरह स्पष्ट हैं। हालांकि, अनलॉक के बाद बड़ी संख्या में लोग आर्थिक गतिविधियों को फिर से सुचारू तौर पर चलाने के लिए घरों से निकलने लगे हैं।

कई सर्वे बताते हैं कि वर्क फ्रॉम होम का मॉडल आगे भी प्रभावकारी तरीके से चलता रहेगा। दुनियाभर में सबकी निगाहें वैक्सीन पर हैं, क्योंकि यह आपदा से निपटने का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। मैकेंजी ग्लोबल ने इस बाबत नौ देशों में 2000 से अधिक काम और 800 से अधिक नौकरियों का विश्लेषण किया। विश्लेषण के अनुसार, घर से काम करने वाले लोग काफी दक्ष, पढ़े-लिखे, कुछ उद्योगों और भौगोलिक परिस्थितियों से ही जुड़े हैं। कई एक्टिविटीज जैसे-कोचिंग, काउंसलिंग, फीडबैक आधारित सेवाओं और ग्राहक से सीधे संबद्ध कार्यों में अच्छे लोगों की आवश्यकता होती है। हालांकि, टीचिंग और ट्रेनिंग जैसे क्रिएटिव कार्यों को घर से प्रभावशाली तरीके से करना आसान नहीं है।

दुनियाभर में भारत ने अपनी पहचान टेक और फाइनेंशियल सर्विस इंडस्ट्री के तौर पर मजबूत की है। भारत में 46.4 करोड़ लोग रिटेल और कृषि कार्यों से जुड़े हैं। इन कामों को घर से नहीं किया जा सकता है। अगर दुनियाभर में देखें तो अमेरिका में 22 फीसदी कर्मचारी ऐसे हैं, जो घर से तीन या पांच दिन काम कर सकते हैं और इससे उत्पादकता पर किसी तरह का फर्क नहीं पड़ेगा। भारत में ऐसे कर्मचारी सिर्फ पांच प्रतिशत हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कर्मचारी ऑफिस के बाहर से अधिक काम कर सकते हैं, जबकि भारत, चीन और मैक्सिको जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में ये कर्मचारियों के लिए कम संभव है। भारत में सिर्फ 12 फीसदी ही कर्मचारी ऐसे हैं, जो घर से काम कर सकते हैं और इसका असर उनकी उत्पादकता पर नहीं पड़ता है। चीन और मैक्सिको में यह प्रतिशत क्रमश: 16 और 18 फीसदी है। ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका, जापान, फ्रांस और स्पेन में यह प्रतिशत क्रमश: 33, 30, 29, 29, 28 और 26 है।

इन सेक्टरों में वर्क फ्रॉम होम की संभावना अधिक

रिपोर्ट के अनुसार, कुछ सेक्टर ऐसे हैं, जिनमें वर्क फ्रॉम कारगर है। इससे उत्पादकता पर भी प्रभाव नहीं पड़ता है। फाइनेंस और इंश्योरेंस में 76 फीसदी, प्रबंधन में 68 प्रतिशत, प्रोफेशनल, साइंटिफिक और टेक्निकल सेवाओं में 62 फीसदी, आईटी और टेलीकम्युनिकेशन में 58 फीसदी प्रभावी है। जबकि शिक्षा में 33 फीसदी, थोक व्यापार, रियल इस्टेट में 32 प्रतिशत, सरकार और प्रशासनिक सपोर्ट में 31 प्रतिशत, यूटिलिटी में 31 प्रतिशत, कला, मनोरंजन में 19 प्रतिशत, हेल्थकेयर में 20 फीसदी, रिटेल में 18 फीसदी, खदान में 19 फीसदी, मैन्यूफैक्चरिंग में 19 प्रतिशत, ट्रांसपोर्टेशन में 18 प्रतिशत, निर्माण कार्य में 15 फीसदी, खाने से जुड़ी सेवाओं में 8 फीसदी, कृषि में 7 फीसदी ही प्रभावी है।

इन देशों के काम और नौकरियों के आधार पर किया गया विश्लेषण : भारत, चीन, जापान, मैक्सिको, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन। 

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