बातचीत जरूर करें 

बच्चे को अनुशासित  करने के लिए परिवार के सभी सदस्यों का एकमत होना ज़रूरी है। अगर कोई व्यक्ति उसे किसी गलती के लिए डांट रहा हो तो उस समय दूसरे को उसका बचाव नहीं करना चाहिए।  उसके अच्छे कार्यों की प्रशंसा ज़रूर करें पर हर काम के बदले उसे रिश्वत के रूप में चीज़ें देने का वादा कभी न करें। अगर घर में दो बच्चे हों तो उनके लिए अलग-अलग चीज़ें लाने के बजाय उन्हें एक ही खिलौना दें। इससे उनमें सहज ढंग से शेयरिंग की भावना विकसित होगी और उनका व्यवहार भी अनुशासित रहेगा। उनके साथ रोज़ाना प्यार भरी बातचीत का समय ज़रूर निकालें।       

 

मेरे बेटे की उम्र 6 साल है। वह दिनोंदिन अनुशासनहीन और शरारती होता जा रहा है। जब भी उसे कोई निर्देश दिया जाता है तो बड़ों की बात मानने के बजाय वह बहस करने लगता है। उसकी यह आदत कैसे सुधरेगी?    

आकांक्षा शर्मा, दिल्ली

 

बच्चों के लिए नुकसानदेह

आजकल ज्य़ादातर बच्चों के साथ ऐसी समस्या होती है क्योंकि महानगरों के एकल परिवार में रहने वाले कामकाजी माता-पिता के पास उनके लिए पर्याप्त समय नहीं होता। ऐसे में उन्हें खुश करने के लिए वे उनकी हर मांग तुरंत पूरी कर देते हैं। इससे बच्चे में 'ना सुनने की आदत विकसित नहीं हो पाती। वह पहले से ही यह मानकर चलता है कि पेरेंट्स उसकी हर बात मान लेंगे। ऐसे में जब कभी वे अपने बच्चे की कोई मांग पूरी नहीं करते तो रोते-चिल्लाते हुए वह अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करता है। इसके अलावा पेरेंट्स का ओवर कंपन्सेट्री बिहेवियर भी बच्चों के लिए बहुत नुकसानदेह होता है। आजकल ज्य़ादातर पेरेंट्स यही सोचते हैं कि बचपन में मैं जिन चीज़ों के लिए तरसता था, अपने बच्चों को उनकी कमी महसूस नहीं होने दूंगा। इसीलिए जैसे ही बच्चा किसी चीज़ की फरमाइश करता है तो माता-पिता पल भर में ही उसे पूरी कर देते हैं। 

 

दूसरों के सामने मनमानी

शुरुआत से ही पेरेंट्स का यह व्यवहार बच्चों को जि़द्दी और अनुशासनहीन बना देता है। इसलिए जहां तक संभव हो बच्चों की हर मांग पूरी नहीं करनी चाहिए। मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए कई अध्ययनों से यह तथ्य सामने आया है कि बदलते समय के साथ बच्चों के आईक्यू में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। आज के बच्चे पहले की तुलना में ज्य़ादा बुद्धिमान हैं। इसीलिए वे बड़ों से अपनी बात मनवाने के तरीके भी बहुत जल्दी सीख जाते हैं। उन्हें यह मालूम होता है कि अगर मैं दूसरों के सामने रोना-चिल्लाना शुरू कर दूंगा तो इससे मेरे पेरेंट्स को शर्मिंदगी महसूस होगी और इससे बचने के लिए वे तुरंत मेरी बात मान लेंगे। इसलिए आपने भी नोटिस किया होगा कि कुछ बच्चे अकसर दूसरों के सामने मनमानी करते हैं। अगर छोटी उम्र से ही उन्हें अनुशासित किया जाए तो ऐसी परेशानी नहीं होती। जहां तक आपके बच्चे का सवाल है तो ज्य़ादा देर नहीं हुई है। 

गैजेट्स के इस्तेमाल से दूर 

आप अब भी सचेत हो जाएं। सबसे पहले उसके लिए परिवार में अनुशासन की निश्चित सीमा तय करें। उसे स्पष्ट रूप से समझा दें कि उसकी हर बात नहीं मानी जाएगी। अगर आप उसे किसी बात के लिए मना करती हैं तो उसकी वजह ज़रूर बताएं। किसी बात के लिए मना करने के बाद अगर वह रोने-चिल्लाने या जि़द करने लगे तो परेशान होकर अपनी 'ना को 'हां में कभी न बदलें। इससे उसके मन में यह बात बैठ जाएगी कि मम्मी मुझे रोता हुआ नहीं देख पातीं। इससे हर बार अपनी जि़द पूरी करवाने के लिए वह यही तरीका अपनाएगा। जहां तक संभव हो, उसे गैजेट्स के इस्तेमाल से दूर रखें। आईफोन और लैपटॉप का ज्य़ादा इस्तेमाल करने वाले बच्चों के मन में यह भावना घर कर जाती है कि गैजेट्स की तरह लोग भी पल भर में मेरी हर बात मान लेंगे। 

 

व्यवहार में सकारात्मक बदलाव

इससे वे रिश्तों के प्रति उदासीन हो जाते हैं। परिवार में बच्चे की पढ़ाई, खेलने और टीवी देखने के समय और खानपान की आदतों को लेकर कुछ स्पष्ट नियम बनाएं। अपने बेटे को समझाएं कि उसे हर हाल में उनका पालन करना ही होगा। अगर वह ऐसा नहीं करता तो  उसके लिए खेलने, टीवी देखने के समय या पॉकेटमनी में कटौती जैसी सज़ा भी निर्धारित करें। इन प्रयासों से कुछ ही महीनों के बाद आपको उसके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव ज़रूर नज़र आएगा।

Posted By: Shweta Mishra