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'तुम मेरी दूसरी पत्नी हो, पहली एयरफोर्स है...', रुला देगी स्क्वॉड्रन लीडर अजय आहूजा की पत्नी की कहानी

Published: Mon, 17 Aug 2026 06:19 PM (IST)

कारगिल युद्ध पर बनी वेब सीरीज आपरेशन सफेद सागर इन दिनों चर्चा में है। इसमें स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के ...और पढ़ें

शहीद अजय आहूजा की पत्नी की कहानी (Picture Courtesy: YouTube)

शहीद अजय आहूजा की पत्नी की कहानी (Picture Courtesy: YouTube)

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समय कम है?

जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में

संक्षेप में पढ़ें

लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बठिंडा में वह दिन भी एक आम दिन की तरह था। फोन की घंटी बजी। उठाया तो आवाज आई कि अजय का सामान पैक कर दें, तुरंत श्रीनगर जाना है। मैंने चार-पांच कपड़ों का सेट रखकर एक सेट अलग रख दिया। यह कुछ ही दिन बाद अजय के जन्मदिन के लिए था।

अंकुर अपने डैडा (पिता के लिए संबोधन) के जन्मदिन की योजना बना रहा था। दिन बीतते जा रहे थे। अजय चाहते थे कि हम उनके पास आ जाएं। टिकट बुक कराने की बात हुई, पर पता चला कि सारी सिविल फ्लाइट्स कैंसिल हो गई हैं और फिर एक दिन वह खबर मिली, जिसने जिंदगी को पूरी तरह पलट दिया।

आई दुख की घड़ी

दोपहर के ढाई से तीन बज रहे होंगे जब अजय के नहीं होने की खबर मिली। मैं अंकुर के साथ टीवी देख रही थी। सहसा सिर में भारीपन महसूस हुआ तो मैंने अंकुर से कहा कि तुम टीवी देख लो मैं सोने जा रही हूं। अभी अपने कमरे की ओर मुड़ी ही थी कि बाहर दरवाजे पर हलचल महसूस हुई।

खिड़की से देखा कि स्टेशन कमांडर खड़े थे। उन्हें देखते ही मेरे होश उड़ गए, क्योंकि वे यूनिफार्म में घर आए थे। अजय ने मुझे पहले बता रखा था कि यदि यूनिफार्म में कोई सूचना देने घर आए तो समझ लेना कुछ बुरा हुआ है। कमांडर ने कहा- अजय मिसिंग हैं और उनकी तलाश जारी है। इसके बाद लोगों का आना शुरू हो गया और देर शाम अजय के बलिदान की खबर आई। 

मेरे भीतर जो संघर्ष चल रहा था, वह और तेज हो गया। मैं बुत बन गई थी। अजय नहीं हैं अब यह यकीन करना मुश्किल था। वे तो पहले भी इजेक्ट कर चुके थे। थोड़ी चोटें आई थीं, पर ठीक हो गए थे। एक जांबाज सिपाही ऐसे कैसे हार मान लेगा? बेटे को कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैं जहां जाती थी, वह मेरे पीछे- पीछे चलता रहता। जब हम कोटा गए तब वहां मौजूद भीड़, उनके हाव-भाव, अजय की फोटो पर माला देखकर उसने पूछा मम्मा अब डैडा नहीं आएंगे? उसका यह सवाल मुझे आज भी टीस देता है।

उस दिन के बाद से उसने कभी नहीं पूछा डैडा के बारे में, ताकि मैं दुखी न हो जाऊं। डैडा का दुख उसके मन में जैसे धंस गया। वह स्कूल से एक कागज पर अजय, अलका और अंकुर ये तीन नाम हमेशा लिखकर लाता था। मैं उसके बैग से जब वह कागज निकालती तो उसे देखना मेरे लिए असहनीय होता । ईश्वर ने मेरे जीवन की स्क्रिप्ट शायद ऐसी ही रची थी कि अजय का साथ इतने ही दिनों का था। जिंदगी ने तो अजय के जाने के बाद आंसू बहाने का समय भी नहीं दिया।

 

अजय मई में गए और मुझे जुलाई में सरकार द्वारा चंडीगढ़ में पीसीएस स्तर की जॉब ज्वॉइन करने का ऑफर मिला। मैं टीचिंग में थी और उसके लिए अलग ट्रेनिंग की जरूरत थी। बच्चे को छोड़कर मैंने ट्रेनिंग करना शुरू किया। चंडीगढ़ में अकेले बच्चे को लेकर रहना कठिन था।

इसलिए मां और पिताजी साथ चलने को तैयार थे, पर इस बीच पापा ने कहा कि बच्चे को समय देना चाहिए। पेट्रोल पंप का बिजनेस सही रहेगा। मुझे याद है कि शुक्रवार देर रात चंडीगढ़ से आती तो बेटा सोया मिलता और जब सोमवार सुबह जाती थी, तब भी वह सोया रहता। 

दी थी अनमोल सीख

बता नहीं सकती कि बच्चे ने कितना दर्द सहा होगा, पर मुझे आगे बढ़ना था, क्योंकि अजय ने कहा था कि तुम आत्मनिर्भर स्त्री हो और अपने जीवन की परिस्थितियों को संभाल सकती हो। इसलिए पापा ने पेट्रोल पंप के लिए जहां- जहां दस्तखत करने को कहा, करती गई। ज्यादा दिन नहीं बीते और दिसंबर में पापा का साथ भी छूट गया। इसके बाद मैं चंडीगढ़ से दिल्ली आ गई। यहां कुछ समय उसी स्कूल में पढ़ाया, जहां अंकुर पढ़ता था। फिर एक दिन पता चला कि पेट्रोल पंप अलॉट हो गया है।

इस बीच मैं खुद में एक अलग अलका को महसूस करने लगी। यह उसी अथाह पीड़ा से जन्मी अलका थी, जो अजय से दूर होने के कारण थी, पर जिसके साथ भी केवल अजय ही हैं। मुझे याद है, एक बार अजय ने कहा था कि अलका मुझे कुछ हो जाए तो तुम दूसरी शादी कर लेना। इस पर मैंने उन्हें खूब सुनाया था। अंकुर को अजय के अलावा कोई नहीं चाहिए और मुझे केवल अजय चाहिए। वह मेरे आसपास और मेरी कलाई में बंधी घड़ी में भी हैं। याद आ रहे बीते पल

बीते कुछ समय से उनके साथ बिताए सभी क्षण जैसे फिर से जिंदा हो गए हैं और मुझे छू रहे हैं। अक्सर लगता है। अजय मुस्कुराते हुए कभी आकर कहेंगे कि चलो, हम तीनों मस्ती करते हैं। वह शम्मी कपूर की तरह झूमते और गाते। चुनिंदा फिल्में भी देखते थे। जब हमारी सगाई हुई थी, तब हम दोनों ने आराधना फिल्म टीवी पर देखी थी। सब ऐसे घटित हो रहा था, जैसे किसी फिल्म की स्क्रिप्ट हो। यह संयोग ही था कि उन्हें बीएड लड़की चाहिए थी और मैंने एमएससी में दाखिला लेने के बाद उसे छोड़कर पहले बीएड किया था।

मेरे जीवन का वह

पहला लड़का था जिससे शादी की बात हुई और झट शादी भी हो गई। मुझे याद है, अजय की मां मेरे घर आई और मुझे देखते ही पसंद कर लिया, जबकि मेरी शादी की योजना नहीं थी। कुछ समय पहले बड़ी बहन की शादी हुई थी। दूसरी की सगाई हो चुकी थी और कुछ दिनों में शादी थी। मुझे जब अजय की एनडीए वाली तस्वीर दिखाई गई तो हां, कहने से पूर्व मैंने शर्त रखी कि पहले लड़का देखूंगी। जब अजय घर आए और उन्हें खिड़की से देखा तो वह काफी हैंडसम लगे। वह मिले और मुझसे एक मिनट में कॉफी बनाने को कहा।

मैंने जब ऐसा किया तो वह हैरान रह गए। इसके बाद हमने मिलना-जुलना और पत्र लिखना शुरू किया। एक दिन उन्होंने कहा कि अलका याद रखना, तुम मेरी सेकंड वाइफ हो। क्या कह रहे हैं आप? फर्स्ट कौन है? मैंने पूछा तो उनका जवाब था- एयरफोर्स। यह जवाब बहुत था उन पर गर्व करने के लिए।

हम एक-दूसरे को इतना समझ चुके थे कि टकराव की आशंका होते ही बात को दूसरी तरफ मोड़ देते। अजय ने मुझे पहले ही कह दिया था कि मुझसे कभी लड़ना मत, डर लगता है। लड़ना तो दूर मैं उन्हें किसी भी तरह का दर्द नहीं सकती थी, वह थे ही इतने अच्छे। किसी काम को लेकर मैं यदि कह दूं कि कैसे करूंगी या डर लग रहा है तो अजय तुरंत टोक देते। कहते ऐसा तुम कैसे कह सकती हो। मन को तैयार करो कि तुम हर काम खुद कर सकती हो।

चाहे बच्चे को 30 किलोमीटर दूर स्कूल तक छोड़ना हो या घर का कोई काम, हर चीज मैं खुद करने लगी थी। अजय हमेशा साथ नहीं रहते, पर जब रहते मैं और अंकुर पूरी दुनिया भूल जाते। हम जब चेन्नई में थे, वहीं पास में चिड़ियाघर था। अजय, अंकुर और मैं देर तक वहां समय बिताते।

आज भी वह मेरे साथ हैं

अजय का पार्थिव शरीर घर आने पर उसे देखने के लिए लोगों ने मना कर दिया था। कहा देखोगी तो वही चेहरा आंखों में बार-बार आएगा। यह मेरे लिए अच्छा हुआ, जो मैंने उनके छलनी शरीर को नहीं देखा। इससे अजय उसी रूप में मेरे साथ महसूस होते हैं, जैसा वे हमेशा रहे। ऐसा लगता है कि वे अभी आ जाएंगे मुस्कुराते हुए।

याद आता है कि अजय ने कैसे एक आम लड़की को इतना खास बना दिया। कैसे नई परिस्थितियों में ढलना है, उन्होंने बड़ी सहजता से सिखाया। एयरफोर्स स्टेशन में जब हम जाते तो वहां बाउंसिंग का कल्चर देखकर मैं थोड़ा असहज हो जाती। जब आपकी नई शादी हो और कई बैचलर्स घर पर आएं और आपको उनका ब्रेकफास्ट, लंच या डिनर की चिंता करनी हो, तो असहजता होती है, पर जब इसमें सभी सहयोग करने लगे तो मुझे इन सबमें मजा आने लगा।

अलग होती है सैनिक की पत्नी

सैनिक की पत्नी के लिए पति की वर्दी व उसका सम्मान उसका अपना होता है। पति जो देश के लिए भूमिका निभा रहे हैं, उस पर वह हर हाल में खरा उतर सके, इसमें सहायक बनना ही उसका परम उद्देश्य बन जाता है। भावनाओं पर नियंत्रण इसी का अंग है। अजय कभी फ्लाइंग के लिए निकलते थे तो वह मुझे भीतर से दहला लेता था, पर मैं उस भाव को चेहरे पर नहीं आने देती थी। खामोशी से सभी के लिए मां शेरावाली से प्रार्थना करती कि वे सकुशल लौट आएं।

उस समय खुशी होती, जब उनकी फ्लाइंग नहीं होती थी, पर कहती नहीं थी, क्योंकि वह इससे दुखी होते थे। अजय के साथ बिताए उन 10 स्वर्णिम वर्षों को मैंने अपने मन में इस तरह से सहेजा हुआ है। कि वे मेरी सबसे बड़ी ताकत बन चुके हैं। मैं अब जीवन के साथ कदमताल कर रही हूं और कभी हार नहीं मान सकती।

जैसा सीमा झा को बताया

अलका जी की भूमिका के लिए मैंने उनके साथ कई घंटे बिताए। वह केवल अजय सर की बात कर रही थीं और मैं उन्हें व  उनके हावभाव  बस देखती रही थी। 25-26 साल के पहले के शोक ने उन्हें एकदम अलग अलका बना दिया है। मैं उनके भावों की नकल नहीं करना चाहती थी। बस उन्हें अपने भीतर सहजता से उतारने का प्रयास किया। उनके स्वभाव और हद दर्जे की सकारात्मकता को अपने भीतर लाने की कोशिश की। जीवन को लेकर ऐसी सकारात्मकता केवल एक सैनिक की पत्नी में ही हो सकती है। एक सैनिक की पत्नी में जो जिंदादिली होती है, यही उन्हें सिविलियन की पत्नी से अलग करती है। इतनी पीड़ा के बाद मुस्कुराना आसान नहीं। यह बड़ी बहादुरी और साहस का काम होता है।

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अमृता बागची, अभिनेत्री, ऑपरेशन सफेद सागर की अभिनेत्री