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योग सिर्फ व्यायाम नहीं, जिंदगी बदलने की कला है: जानें कैसे पाएं मानसिक शांति और तनावमुक्त जीवन

Published: Sun, 21 Jun 2026 08:39 AM (IST)

योगी, आध्यात्मिक गुरु, चिकित्सक तथा वेदांत के प्रकांड विद्वान स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने योग को सामान्य जनजीवन तक पहुंचाया। उनके ...और पढ़ें

मानसिक शांति का अचूक तरीका है योग (AI Generated Image)

मानसिक शांति का अचूक तरीका है योग (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। योग का नियमित अभ्यास व्यक्ति के जीवन में व्यापक परिवर्तन लाता है। आसन, प्राणायाम, विश्रांति और ध्यान जैसे अभ्यास शरीर को स्वस्थ रखने के साथ-साथ मानसिक तनाव को भी कम करते हैं। नियमित योगाभ्यास से मन अधिक शांत, स्थिर और सकारात्मक बनता है। 

योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक संपूर्ण पद्धति है। यौगिक जीवनशैली व्यक्ति को अनुशासित दिनचर्या, संयमित आहार और सकारात्मक सोच की ओर प्रेरित करती है। इसका प्रभाव व्यक्ति के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानसिक और भावनात्मक संतुलन पर भी पड़ता है। 

योग के साथ करुणा को भी दें जगह

योग केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और सार्थक जीवन का मार्ग है। यदि योग के साथ दयालुता, करुणा और संतोष जैसे मूल्यों को भी जीवन में स्थान दिया जाए तो व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर सकारात्मक बदलाव संभव है। 

योग का वास्तविक उद्देश्य केवल शरीर को स्वस्थ बनाना नहीं है। योग व्यक्ति को आत्मचिंतन, आत्मस्वीकृति और आंतरिक शांति की दिशा में भी अग्रसर करता है। योग के माध्यम से व्यक्ति संतोष, संतुलन और मानसिक स्थिरता प्राप्त कर सकता है। जब व्यक्ति के भीतर संतोष और करुणा का विकास होता है, तब वह स्वयं के साथ-साथ समाज के लिए भी उपयोगी बनता है। 

यही योग की व्यापक और सार्थक भूमिका है। हमें अपने व्यवहार, संबंधों और कार्यशैली में करुणा तथा सद्भावना को प्राथमिकता देनी चाहिए। दयालुता केवल बड़े कार्यों में ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे व्यवहारों और सकारात्मक सोच में भी दिखाई देती है। किसी जरूरतमंद की सहायता, दूसरों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता का व्यवहार समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। 

दया और करुणा से प्रेरित छोटे-छोटे कार्य मिलकर समाज में सद्भावना का विशाल सागर तैयार करते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर मौजूद करुणा और संवेदनशीलता को जागृत कर दूसरों के हित में कार्य करे तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन की नई धारा प्रवाहित हो सकती है। 

हर परिस्थिति में मानवीय मूल्यों को महत्व देकर ही स्वस्थ और संवेदनशील समाज का निर्माण संभव है। संतोष का अर्थ प्रगति को रोकना नहीं है, बल्कि जीवन में संतुलन बनाए रखना है। जब व्यक्ति के भीतर यह विश्वास विकसित होता है कि उसकी भौतिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक आवश्यकताएं समयानुसार पूरी होंगी, तब उसके भीतर आत्मविश्वास और स्थिरता का विकास होता है। यही भाव जीवन में संतुलन और आंतरिक शक्ति का आधार बनता है।  

स्वस्थ दीर्घायु की दिनचर्या 

बढ़ती उम्र के साथ शरीर और मन दोनों में कई प्रकार के बदलाव आते हैं। ऐसे में स्वस्थ, सक्रिय और प्रसन्न जीवन के लिए योग और संतुलित दिनचर्या महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। बुजुर्ग यदि प्रतिदिन कुछ समय योग, प्राणायाम और ध्यान को दें तो वे कई शारीरिक और मानसिक समस्याओं से खुद को दूर रख सकते हैं। 

सुबह जल्दी उठकर हल्की सैर, सूर्य की किरणों का सेवन और गहरी सांस लेने के अभ्यास से दिन की शुरुआत करना लाभदायक होता है। इसके बाद अपनी क्षमता के अनुसार सरल योगासन और प्राणायाम करने से शरीर में लचीलापन बना रहता है तथा रक्त संचार बेहतर होता है। नियमित ध्यान से मानसिक तनाव कम होता है और मन शांत रहता है। बुजुर्गों को भोजन में संतुलन बनाए रखना चाहिए। 

ताजा फल, हरी सब्जियां, पर्याप्त पानी और सुपाच्य भोजन को प्राथमिकता देनी चाहिए। समय पर भोजन और पर्याप्त नींद भी अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी है। बुजुर्गों को स्वयं को व्यस्त रखने, परिवार और समाज से जुड़े रहने तथा अपनी रुचियों को समय देने का प्रयास करना चाहिए। सकारात्मक दृष्टिकोण और नियमित दिनचर्या जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती है।