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‘तू नीं दिसदा ओ..’ इस हिमाचली लोकगीत में गूंजती है बेकसूर भाई की दर्दभरी पुकार, बड़े भाई की खातिर ली थी फांसी

Published: Sun, 25 Oct 2026 05:00 PM (IST)

मोहणा लोकगीत भाई के बलिदान, बेबसी और पीड़ा को बयां करता है, जो आज भी लोगों के दिलों में गूंजता है।

हिमाचल प्रदेश का मोहणा लोकगीत (Image Source: AI Generated)

हिमाचल प्रदेश का मोहणा लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। हमारी जिंदगी में एक रिश्ता ऐसा है जिसे हम अक्सर सभी रिश्तों की कतार में सबसे आखिर में रखते हैं, और वो है भाई-बहन का रिश्ता। जबकि यही हमारे जीवन के मुश्किल दौर में सबसे ज्यादा काम आता है। 

हिमाचल का एक लोकगीत इसी रिश्ते को केंद्र में लाकर बखूबी बयां करता है। आइए आपको 100 साल से भी ज्यादा पुराने मोहणा लोकगीत की कहानी बताते हैं। 

क्या है हिमाचल प्रदेश का मोहणा लोकगीत? 

अभी तक हमने जिन ज्यादातर लोकगीतों की बात की, उनकी कहानी प्रतीकों पर आधारित थी। कभी किसी पक्षी को तो कभी खाने-पीने की चीजों जैसे-पापड़, जीरा और वड़ियां की मदद से अपने मन की बात कही जाती थी। पर हिमाचल प्रदेश का मोहणा लोकगीत इन सभी से अलग सच्ची घटना पर आधारित है। 

बता दें कि हिमाचल के बिलासपुर की केहलूर रियासत में राजा बिजय चंद के समय में मोहणा नाम का सीधा-साधा लड़का रहता था। उस लड़के का भाई तुलसी राजा के महल में नौकर हुआ करता था। उसने किसी कारणवश एक का खून कर दिया, फिर वह मोहणा के पास गया और उसे कहा कि घर की सारी जिम्मेदारी मेरे ऊपर है, इसलिए तुम इल्जाम अपने ऊपर ले लो। 

बिना जुर्म के मोहणा ने दिया भाई के लिए बलिदान 

तुलसी ने आश्वासन दिया कि वह राजा से बात कर उसे बचा लेगा। लेकिन वह ऐसा न कर सका और मोहणा को बिना जुर्म के ही साल 1922 में फांसी पर लटका दिया। कहते हैं मरने से एक रात पहले वह इस रहस्य को किसी सिपाही को बताकर गया था। इसके बाद मोहणा हिमाचल के लोगों के बीच अपने बलिदान के लिए जाना गया। 

लोकगीत में सुनाई देती है बेबसी और पीड़ा 

इस घटना का लोगों के मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और कवियों ने उसके बलिदान को शब्दों में पिरोकर लोकप्रिय कर दिया। इस गीत के बोल कुछ प्रकार हैं: ‘तू नीं दिसदा ओ-मोहणा-तू नीं दिसदा! मोया पला पला मेरा रोज खून सुकदा-खम्बे गडिते ओ मोहणा, खम्बे गडिते। बारा बजी गे ओ मोहणा-बारा बजी गे........। 

इस गीत में गायक मोहणा के जाने से जुड़ी अपनी पीड़ा को व्यक्त कर रहा है। यह उस क्षण की जीवंत प्रस्तुति है, जिसमें मोहणा को फांसी की सजा सुना दी गई है और उसके लौटने की कोई उम्मीद बाकी नहीं रह गई है। 

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