दशकों पुराना ये पंजाबी लोकगीत आज भी शादी की महफिल में लगाता है चार चांद, गांव से शहर तक है जबरदस्त क्रेज
सालों से जिस चुलबुली धुन पर आप तालियां बजाते और झूमते आ रहे हैं, क्या आपने कभी उसके शब्दों पर गौर किया है?

काला डोरिया... क्या है इस मशहूर पंजाबी लोकगीत की कहानी? (Image Source: AI-Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। अगर आपने कभी किसी पंजाबी शादी या लेडीज संगीत में हिस्सा लिया है, तो ऐसा हो ही नहीं सकता कि आपने 'काला डोरिया' गाना न सुना हो। ढोलक की थाप और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जब महिलाएं यह लोकगीत गाती हैं, तो माहौल में एक अलग ही खुशी छा जाती है।
हालांकि, क्या आप जानते हैं कि जिस गाने पर सब इतनी मस्ती से झूमते हैं, उसके बोलों का असल मतलब क्या है? आइए, आज इस चुलबुले लोकगीत की कहानी को बड़े ही दिलचस्प तरीके से समझते हैं।
क्या होता है 'काला डोरिया'?
'काला डोरिया' का मतलब कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं है। दरअसल, यह बालों में बांधने वाला काले रंग का एक रिबन या सूती धागा होता है, जिसे पंजाबी लोग परांदा भी कहते हैं। बता दें, इसका इस्तेमाल महिलाएं अपनी चोटी गूंथने के लिए करती हैं। गाने की पहली लाइन, "काला डोरिया कुंडे नाल अड़या ई ओए", का मतलब है कि बालों में बंधा हुआ यह काला धागा दरवाजे के कुंडे या हुक में जाकर अटक गया है।
देवर-भाभी की खट्टी-मीठी नोंकझोंक
इस गाने की असली मस्ती इसकी अगली लाइन में छिपी है- "के छोटा देवरा भाभी नाल लड़या ई ओए", यानी छोटा देवर अपनी भाभी से किसी बात पर लड़ पड़ा है या रूठ गया है। यह पूरा गीत देवर और भाभी के उस प्यारे से रिश्ते और मीठी-नोंकझोंक को दर्शाता है, जो हमारे परिवारों का एक बहुत ही खूबसूरत हिस्सा रहा है। इसमें भाभी बड़े ही मजाकिया अंदाज में अपने देवर की शिकायत कर रही है।
सास की 'बुड़-बुड़' पर मजेदार चुटकी
इस गीत में सिर्फ देवर ही नहीं, सास के साथ होने वाली तकरार को भी बड़े ही हास्यपूर्ण तरीके से पिरोया गया है। "ओ कुकड़ी ओ लेनी जेड़ी कुद-कुद करदी ऐ, के सोहरे नहीं जाना सास बुद-बुद करदी ऐ।" यानी मुझे ऐसी मुर्गी चाहिए जो 'कुड़-कुड़' की आवाज करती हो, लेकिन मुझे अपने ससुराल नहीं जाना, क्योंकि वहां मेरी सास हमेशा 'बुड़-बुड़' करती रहती है।
आगे पंक्ति आती है- "कुक्कड़ी ओ लेनी जेड़ी आंडे देंदी ऐ, के सोहरे नहीं जाना सास ताने देंदी ऐ!" इसका मतलब है कि मुझे ऐसी मुर्गी चाहिए जो अंडे देती हो, लेकिन मुझे अपने ससुराल नहीं जाना, क्योंकि वहां मेरी सास मुझे ताने मारती है। जी हां, ये लाइनें इतनी मजेदार हैं कि गाते-गाते हर किसी के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान आ जाती है।
गांव के आंगन से डीजे के फ्लोर तक मचाई धूम
सालों पहले यह गीत सिर्फ पंजाब के गांवों में, शादी वाले घरों के आंगन में गाया जाता था। पंजाब की महान गायिकाओं, जैसे सुरिंदर कौर और प्रकाश कौर ने इसे गाकर हर घर तक पहुंचाया। समय के साथ यह गीत गांवों से निकलकर शहरों तक आ गया।
आजकल तो बॉलीवुड फिल्मों और बड़े-बड़े नाइट क्लब्स में भी इसके मॉडर्न और रीमिक्स वर्जन बजते हैं। आज की युवा पीढ़ी भी इसके नए रूप पर जमकर डांस करती है। भले ही आज शादियों में बड़े-बड़े डीजे और बैंड आ गए हों, लेकिन जब तक कोई चाची, ताई या बुआ ढोलक पकड़कर 'काला डोरिया' नहीं गाती, तब तक शादी का वो असली मजा नहीं आता है।
