गुजरात का वो गरबा गीत, जिसपर झूम उठती थीं दयाबेन; आज भी नवरात्र में लोग जमकर करते हैं इस गाने पर डांस
गुजरात का गीत ढोलीरा ढोल रे वगाड एक सुपरहिट गरबा सॉन्ग है, जिस पर लोग दिल खोलकर गरबा खेलते हैं।

गरबा का क्लासिक सॉन्ग है ढोलीरा ढोल रे वगाड (AI Generated Image)

समय कम है?
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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गुजरात की लोक संस्कृति में गरबा की खास जगह है। ये लोक नृत्य नवरात्र के नौ दिनों में मां अंबे की आराधना के लिए किया जाता है। ये लोक नृत्य खास गीतों पर किया जाता है, जिसे गरबा गीत कहते हैं। इन्हीं गीतों में ढोलीरा ढोल रे वगाड… भी शामिल है।
ये गुजरात के क्लासिक गरबा गीतों में से एक है। इस गुजराती गाने के बोल गरबा से जुड़े हैं और इसकी धुन इतनी मजेदार है कि इसे सुनते ही आपके पैर गरबा खेलने के लिए थिरकने लगते हैं। इसलिए इस गीत का इस्तेमाल टीवी पर भी गरबा के दौरान किया जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं क्यों ये गरबा सॉन्ग इतना क्लासिक माना जाता है? आइए जानें क्या कहता है ये गरबा गीत और क्यों है ये इतना खास।
ढोलिया से मनुहार
इस गरबा गीत की पहली ही लाइन है ढोलीरा ढोल रे वगाड म्हारे हींचवु छे…। इस लाइन में ढोल बजाने वाले से कहा जा रहा है कि तुम ढोल बजाओ मुझे डांस करना है। ढोलीरा गुजरात में ढोल बजाने वाले से कहा जाता है और हींच गरबा नृत्य की एक खास शैली है, जो एक खास लय में की जाती है। फिर कहते हैं हींच लेवु छे रे मारे गरबे घुंमवु छे…। यानी मुझे गरबा खेलना है, ढोलीरा तू ढोल बजा।
मां अंबे की आराधना
इस गीत में सिर्फ गरबा खेलने की मनुहार नहीं है। इसमें मां अंबे की आराधना भी शामिल है। गीत में आगे कहा गया है मारी अंबा मां ने द्वारे हींच लेवी छे, हींच लेवी छे ने मारे गरबे घुंमवु छे, ढोलीरा…। यानी नर्तक मां अंबे के द्वार जाकर गरबा खेलकर मां को प्रसन्न करना चाहता है, लेकिन गरबा करने के लिए ढोली को ढोल बजाना पड़ेगा और वो फिर से कहता है ढोलीरा ढोल रे वगाड, मारे हींच लेवु छे…।
क्यों क्लासिक है ये गरबा गीत?
इस गरबा गीत की सबसे बड़ी खासियत इसकी लय और ताल है। इस गीत की शुरुवात में लय थोड़ी धीमी होती है, जो धीरे-धीरे तेज होती जाती है। इस गीत पर नर्तक गोल घेरे में घूमते हुए गरबा खेलते हैं और तालियों की आवाज इसे और मजेदार बना देती है।
साथ ही, इस गीत में गुजरात की संस्कृति को भी बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है। गुजरात में गरबा खेलना वहां की लोक संस्कृति का हिस्सा है। इस गीत में भी नर्तक ढोलीरा से ढोल बजाने के लिए कहता है, ताकि वह गरबा खेल सके। मां अंबे गुजरातियों के लिए बहुत महत्व रखती हैं और हर सुख-दुख में वो मां को ही याद करते हैं। इस गीत में भी इसी भाव को दिखाया गया है कि नर्तक ढोल पर मां अंबे के दरबार में गरबा खेलना चाहता है।
ये गरबा गीत भले ही दशकों पुराना है, लेकिन आज भी नवरात्र के पंडालों में इसे जरूर बजाया जाता है और लोग इस पर जमकर गरबा करते हैं।
