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मालवा की लोक संस्कृति को बयां करते हैं संज्या लोकगीत, पितृ पक्ष में अच्छे वर के लिए लड़कियां गाती हैं ये गीत

Published: Fri, 25 Sep 2026 05:48 PM (IST)

पितृपक्ष में मालवा क्षेत्र में संज्या लोकगीतों की परंपरा निभाई जाती है, जिसमें कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की कामना करती हैं।

मालवा क्षेत्र में संज्या की परंपरा और लोकगीत (Image Source: AI Generated)

मालवा क्षेत्र में संज्या की परंपरा और लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। भाद्रपद की पूर्णिमा से पितृपक्ष की शुरुआत होती है, जिसमें पितरों को तर्पण किए जाने से जुड़ी अलग-अलग परंपराओं को निभाया जाता है। वहीं, कई जगह पर ये सोलह दिन किसी उत्सव की तरह मनाते हैं। हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश की एक अनोखी संस्कृति संज्या के बारे में और इन्हीं से जुड़े हैं संज्या के लोकगीत। 

क्या है मालवा क्षेत्र में संज्या की परंपरा 

इस परंपरा को संज्या, संझा या सांझी नाम से जाना जाता है, जो मालवा-निमाड़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में पितृ पक्ष के दौरान मनाया जाने वाला एक उत्सव है। आपको जानकार हैरानी होगी कि जहां उत्तर भारत में पितृपक्ष के समय कोई भी शुभ काम करने की मनाही है, तो वहीं संज्या में कुंवारी लड़कियां इन दिनों को त्योहार की तरह मनाती हैं। इसमें वो संज्या लोकगीत गाती हैं, दीवारों पर भित्ति चित्र बनाती हैं और फिर फूल-पत्तियों से सजाती भी हैं। 

पितृ पक्ष में बेटियां क्यों गाती हैं लोकगीत? 

ऐसी मान्यता है कि भाद्रपद पूर्णिमा से 16 दिनों के लिए संझा माता अपने मायके लौटती हैं और यहां अपनी सहेलियों के साथ खूब हंसी ठिठोली भी करती हैं। बताते चलें कि माता संझा माता पार्वती का ही रूप हैं और उन्हें ही रिझाने के लिए कुंवारी लड़कियां गीत गाती हैं। इस परंपरा में ये गीत अच्छे वर की कामना के लिए गाए जाते हैं। 

‘छोटी-सी गाड़ी लुढ़कती जाय, 

जिसमें बैठी संजा बाई सासरे जाय। 

घाघरो चमकाती जाय, 

लूगड़ो लटकाती जाय, 

बिछिया बजाती जाय।

यह बेहद लोकप्रिय 'संज्या लोकगीत' है जिसमें लड़कियां गाते हुए कहती हैं कि एक छोटी सी बैलगाड़ी लुढ़कती हुई जा रही है, जिसमें संझा माता सवार होकर ससुराल जा रही हैं। वो अपना घाघरा चमकाते हुए, लूगड़ो यानी ओढनी को लटकाते हुए और अपने बिछिया को बजाते हुए जा रही हैं। यह गीत संज्या को विदा करते समय कुंवारी लड़कियों द्वारा गाया जाता है। 

संजा बाई का लाड़ाजी, 

लूगड़ो लाया जाड़ाजी 

असो कई लाया दारिका, 

लाता गोट किनारी का। 

यहां संजा बाई के पति को लाड़ाजी कहा गया है, गीत में उनके पति एक बहुत मोटि ओढ़नी लेकर आए हैं। जिसपर संजा बाई अपने पति से शिकायत करते हुए कहती हैं कि यह मोटा कपड़ा लाने से अच्छा कोई गोटे वाली ओढ़नी ही ले आते। 

संज्या में प्रकृति और महिलाओं का है खास नाता 

संज्या उत्सव की सबसे खास बात यह है कि ये महिलाओं को प्रकृति से जोड़े रखने में मदद करता है। जब संज्या माता को एक रूप देने के लिए महिलाएं गाय के गोबर और फूल-पत्तियों का इस्तेमाल करती हैं, तो कहीं न कहीं वो प्रकृति से भी अपना रिश्ता जोड़ रही होती हैं। 

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