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मायके जाने के लिए भी नहीं मिलते पैसे... दिलचस्प है इस राजस्थानी गीत में छिपी नई नवेली दुल्हन की शिकायत की कहानी

Published: Sat, 12 Sep 2026 02:03 PM (IST)

नई दुल्हन के मायके वालों से मिलन की पीड़ा की कहानी कहता है यह राजस्थानी लोकगीत।

नवविवाहिता के रेलगाड़ी के सफर की कहानी कहता है रेलगाड़ी लोकगीत (Image Source: AI Generated)

नवविवाहिता के रेलगाड़ी के सफर की कहानी कहता है रेलगाड़ी लोकगीत (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। जिंदगी का सफर हो या रेलगाड़ी का, जब तक उसमें खट्टी-मीठी नोंक-झोंक या किसी की याद न हो तो उतना मजा कहां ही आता है। राजस्थानी संस्कृति का एक लोकगीत इसी रेल के सफर का बखान करता है, जिसमें एक महिला की अपने ससुराल के लिए शिकायत भी है और मायके जाने की टीस भी। 

नवविवाहिता के रेलगाड़ी के सफर की कहानी 

‘धोरां रे धोरां मा मारी रेलगाड़ी चाले……’ आपने अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल इस गाने को जरूर सुना होगा, पर कभी इसका मतलब जानने की कोशिश की है? यह गीत भले ही जश्न या सफर जैसे स्टाइल में गाया गया हो पर इसमें एक लड़की अपनी मां से यह शिकायत कर रही है कि उसके ससुराल वाले मायके जाने नहीं देते। बताते चलें कि यहां का धोरा का मतलब रेत का टीला है। 

नई नवेली दुल्हन करती है ससुराल की शिकायत 

धोरा रे धोरामा म्हारी रेलगाड़ी चाले…’ का मतलब है कि एक रेलगाड़ी रेत के टीलों से होते हुए चली जा रही है। गीत के ये बोल राजस्थान में रेलगाड़ी के सफर के बारे में बात करते हैं, जिसका बखान एक नवविवाहिता बड़ी ही खूबसूरती से कर रही है। उसे अपने मायके और खासकर मां की बहुत याद आ रही है, तब वो अपनी मां से कहती है कि मैं रोज अपने यहां रेत के बीच से रेलगाड़ी गुजरते हुए देखती हूं। 

रेलगाड़ी का नहीं है भाड़ा 

इसके बाद ओ म्हारे बाबू रो टिकट यहा मांगे रे यमहा... बाबू रो रे टिकट यहा मांगे रे यमहा’, देवे नी रे गाड़ की ओ फाड़ी हो, मन्नो देवे नि रे गाड़ की ओ फाड़ी हो..." में नई दुल्हन कहती है कि वो उस रेलगाड़ी में बैठ नहीं सकती क्योंकि उस ट्रेन का टीटी टिकट मांगता है। 

यह उस दौर की बात है जब पत्नी अपने पति पर आर्थिक रूप से निर्भर हुआ करती थी, ऐसे में वो अपनी मां से कह रही है कि उसके पति उसे ट्रेन में बैठने के लिए भाड़ा ही नहीं देते, ऐसे में बिना भाड़े के वो कैसे आए? इसमें नई नवेली दुल्हन बड़ी ही सादगी से अपने ससुराल पक्ष पर तंज कसती नजर आती है। 

कंजूस ससुराल की कहानी कहता है यह लोकगीत 

इसके बाद इस गीत के बोल कुछ ऐसे हैं: "बाबूजी भैशारे धम्मनोरा लोबी, मन्ने अलगि जाऊ हरनाई वेह यमहा..." जिसमें नई दुल्हन अपने ससुराल के और सदस्यों की बात करती है। वह कहती है कि मेरे घर में जो बाबोसा और बाईसा हैं, ये सब धन-दौलत के लिए बहुत लोभी हैं। फिर महिला शिकायत करती है कि ‘ओ मन्नो अलगि क्यों परनाई रे माँ’ यानी तूने मुझे क्यों मायके से इतनी दूर अलग ब्याहा। 

दूर ब्याही बेटी का दु:ख बताता है यह गीत 

राजस्थान का यह पुराना लोकगीत दूर ब्याही गई बेटी के दु:ख को बड़ी ही सादगी से गीत के माध्यम से व्यक्त करता है। यह एक ऐसी महिला की कहानी कहता है जिसमें मायके जाने की चाह तो है, पर आर्थिक रूप से ससुराल पर निर्भर रहने की वजह से किराया न होने की बेबसी भी उसे खाए जा रही है।