निंदिया के मातल दूल्हा...मिथिलांचल का वो लोकगीत, जिसमें होती है दूल्हे की तारीफ; दिल छू लेगी यहां की परिछन रस्म
"निंदिया के मातल दूल्हा..." गीत मिथिला में दूल्हे के स्वागत और उसकी सुंदरता की तारीफ के लिए गाया जाता है।

मिथिला में शादियों की रौनक हैं परिछन गीत (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। मॉडर्न इंडिया में लोग डेस्टिनेशन वेडिंग और थीम वेडिंग पर ज्यादा जोर दे रहे हैं, जिसमें लोकगीतों के बजाय डीजे पर लेटेस्ट गानों को बजाने का चलन है। पर आज भी सदियों से शादी-ब्याह में गाए जाने वाले विवाह गीतों के आगे ये सभी गाने फीके नजर आते हैं। इन्हीं में से एक परिछन गीत है “निंदिया के मातल दूल्हा…” जिसे मिथिला में शादियों के समय गाया जाता है।
क्या होता है परिछन गीत?
परिछन जिसे आम बोलचाल में कभी-कभी परछन भी कह दिया जाता है, स्वागत और टोटके से जुड़ा शब्द है। उत्तर भारत में खासकर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार के मिथिला क्षेत्र में परिछन शादी के समय निभाई जाने वाली एक रस्म है। जब बारात मुख्य द्वार पर आती है, तब दूल्हे की नजर उतारने और उसे बुरी नजर से बचाने के लिए इस रस्म को किया जाता है। इसी दौरान महिलाएं परिछन गीत गाकर माहौल को खुशनुमा करती हैं।
मिथिला में शादियों की रौनक हैं परिछन गीत
मिथिला में वैसे तो परिछन के बहुत से गीत हैं, लेकिन इनमें “निंदिया के मातल दूल्हा…” शादियों की रौनक माना जाता है। अब क्योंकि मिथिला माता सीता की जन्मस्थली है, ऐसे में इस क्षेत्र में हर दूल्हे को राम और हर दुल्हन को सीता का रूप माना गया है। यही वजह है कि जब बारात का स्वागत करते समय यह गीत गाते हैं, तो उसमें माता सीता की मां सुनैना का भी नाम जिक्र आता है।
सखियां करती हैं दूल्हे की थकान का जिक्र
‘नवल बरबा हो…’ से इस गीत की शुरुआत होती है, दुल्हन की सखियां पुकार लगाती हैं कि नया दूल्हा आ गया है। इसके बाद ‘निंदिया क मातल दुलहा झुकि-झुकि जाय हे….’ इस गीत की सबसे सुंदर और मनमोहक पंक्ति है, जिसमें संखियां लंबे सफर से थके हुए आए दूल्हे को नींद की वजह से झुकने पर चिढ़ा रही हैं और फिर माता सीता की मां सुनैना का जिक्र आता है। संखियां कहती हैं कि कहां गईं मां सुनैना, जल्दी आइए और दूल्हे का परिछन कीजिए।
दूल्हे की सुंदरता की तारीफ
जहां ज्यादातर गीतों में दुल्हन की खूबसूरती के बारे में सुनने को मिलता है, तो वहीं इस गीत में ससुराल पक्ष अपने दूल्हे की सुंदरता की तारीफ करता दिखता है। तभी तो वो कहती हैं कि :
‘अँखियाँ काजरबा, भाल चननमा
सुन्दर सुरतिया नवल पहुना
मन मोहि लेता सखि मनमोहना
निरखि परिछि लिय परिछनमा’
इस पंक्ति में दूल्हे के आंखों का काजल, माथे पर चंदन के तिलक और मनमोहक छवि देखकर वधू पक्ष मंत्रमुग्ध हो उठता है। इस गीत में सारा ध्यान केवल दूल्हे पर ही है, जिसे निहारकर वधू पक्ष की महिलाएं और सखियां इतनी प्रभावित होती हैं कि तारीफ में गीत गाए बिना रह नहीं पातीं।
