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‘मधाणियां’ है पंजाब का दर्दभरा लोकगीत, सुनाता है मायका छोड़ती बेटी की बाबुल और भाइयों से शिकायत की कहानी

Published: Tue, 22 Sep 2026 06:00 PM (IST)

पंजाब का एक ऐसा भी लोकगीत है जो बेटी के विदाई के दर्द को गहराई से बयां करता है।

पंजाब का मशहूर विदाई गीत मधाणियां (Image Source: AI Generated)

पंजाब का मशहूर विदाई गीत मधाणियां (Image Source: AI Generated)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। म्यूजिक लोगों की जिंदगी में सुख-दु:ख से लेकर गुस्से और गर्व जैसी बहुत सी भावनाओं को जाहिर करने का एक जरिया है। पहले के समय में लोग लोकगीतों के माध्यम से ही अपने मन का हाल कह पाते थे, आज हम एक ऐसे ही पंजाबी गीत की बात करेंगे। 

पंजाब में गाया जाने वाला यह गीत आपको भांगड़ा करने पर तो मजबूर नहीं करेगा, पर दिल को गहराई तक छू जाएगा। इसे आपने मॉडर्न अंदाज में कई बार सुना होगा, पर यह पंजाब में शादी-ब्याह के मौके पर गाया जाता है।  

पंजाब का मशहूर विदाई गीत

पंजाबी संस्कृति में भांगड़ा और गिद्धा वाले गीत बहुत हैं, लेकिन इमोशन्स जाहिर करने वाले गीत गिने चुने ही हैं। इन्हीं में से एक है ‘मधाणियां’। यह महज एक लोकगीत न होकर बेटी के मायके छोड़कर जाने की दर्दभरी आवाज भी है। इसके बोल शुरू होते ही घर का माहौल ही उदासी में छा जाता है। 

क्या है ‘मधाणियां’ का मतलब? 

हिन्दी में जिसे हम मथनी कहते हैं, उसे पंजाब में ‘मधाणी’ कहा गया है। यह दही और मक्खन मथने के लिए इस्तेमाल होने वाला एक पारंपरिक उपकरण है। ‘मधाणियां’ लोकगीत में इसे लड़की के बचपन से यौवन तक के चक्र को दिखाने के लिए एक रूपक की तरह उपयोग किया गया है। 

जिस तरह एक मथनी से दूध को मथकर उससे दही या मक्खन में उसका स्वरूप बदल दिया जाता है, ठीक उसी तरह जब किसी लड़की की शादी होती है तो उसकी जिंदगी भी अपना स्वरूप पूरी तरह से बदल लेती है। उसका पालन पोषण मायके में होता है और फिर एक दिन दूसरा परिवार उसे अपने साथ ले जाता है। 

बाबुल और बेटी की बातचीत पर आधारित है लोकगीत 

‘मधाणियां’ लोकगीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें बाबुल और बेटी की बातचीत को गाते हुए दर्शाया गया है। 

‘मधानियाँ, 

हाय ओये मेरेया डाडेया रब्बा, 

किन्ना जम्मियाँ किन्ना ने ले जाणीयाँ।’ 

इस पंक्ति में नई नवेली दुल्हन विदाई के समय अपनी तुलना मथनी से करती है। वह कहती है कि इसी मथनी की तरह उसका जीवन भी पूरी तरह से उथल-पुथल हो गया है, फिर वह ईश्वर से सवाल करती है कि बेटियों का जन्म कहीं और शादी कहीं और क्यों होती है? 

‘हाय छोले, 

बाबुल तेरे मैहलां विच्चों 

सत रंगिया कबूतर बोले।’ 

गीत में दुल्हन फिर अपने बाबुल से कहती है कि आपके महल में 'सात रंगों का कबूतर' यानी जो खुशियां और रौनक हुआ करती थी, वह अब यहां से जा रही है।

‘हाय फीता, 

ऐना सकेयाँ वीरां ने डोला 

टोर के अगां नू कीता।’  

यह इस गीत की चौथी कड़ी में युवती अपने भाइयों के प्रति गुस्सा दिखा रही है। वह कह रही है जिन भाइयों पर मैंने सबसे ज्यादा भरोसा किया उन्होंने ही मुझे डोली में बिठाकर विदा कर दिया। 

छलक उठती हैं मायके की हर आंख 

यह गीत आज भी उतना ही जीवंत बना हुआ है, जितना पहले के समय में था। मुसर्रत नजीर, नेहा भसीन और असीस कौर जैसे कई बड़े गायकों ने इसे अलग-अलग अंदाज में गाकर इसकी लोकप्रियता को बनाए रखा है। आज भी जब मायके में यह गीत गाया जाता है, तो सभी की आंखें छलक उठती हैं।  

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