बेटियों को अपने फैसले लेने दें, नवरात्र में इन 5 खिलाड़ियों की कहानी बताएगी शक्ति का असली मतलब
नवरात्र में शक्ति के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है, लेकिन बेटी के लिए शक्ति सिर्फ मुश्किलों का सामना करने ...और पढ़ें

नवरात्र में जानें शक्ति का असली अर्थ
HighLights
बेटियों को अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता
परिवार के भरोसे और समर्थन से मिली सफलता की राह
सामाजिक बाधाओं को पार कर अपने सपनों को साकार किया
एन नवराही, नई दिल्ली। नवरात्र में शक्ति के नौ रूपों की पूजा होती है। कहीं वह साहस का रूप है तो कहीं ज्ञान, धैर्य और सामर्थ्य का, लेकिन घर की बेटी के लिए शक्ति का अर्थ क्या है? क्या उसे मजबूत कह देना ही पर्याप्त है या फिर उसे अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता देना भी शक्ति का ही एक रूप है? हाल ही में एशियाई खेलों में देश के लिए पदक जीतने वाली बेटियों की कहानियां इसी सवाल का जवाब तलाशती हैं।
इन खिलाड़ियों ने सिर्फ मैदान पर मुकाबले नहीं जीते, बल्कि जिंदगी के कई अहम मोड़ों पर अपनी राह चुनने के फैसले भी लिए। किसी ने समाज की बातों की परवाह नहीं की, किसी ने असफलता के बाद फिर शुरुआत की तो किसी ने अपने शौक को करियर में बदला। इनके सफर में परिवार का भरोसा भी रहा और अपनी पसंद पर टिके रहने का साहस भी।
नीरू धांडा: लड़की है बाहर जाकर क्या करेगी

जींद के छोटे से गांव संगतपुरा की नीरू धांडा का सफर अभावों से निकलकर एशियाई खेलों में ट्रैप शूटिंग के दो स्वर्ण और एक रजत पदक तक पहुंचा। सामान्य परिवार में जन्मीं नीरू बचपन में मां के साथ खेत के काम में हाथ बंटाती थीं। स्कूल में बुआ को देखकर कबड्डी खेलना शुरू किया, लेकिन 10वीं के बाद परिस्थितियों के कारण वह भी छूट गई। वर्ष 2018 में 18 वर्ष की उम्र में मामा के बेटे लक्ष्य श्योराण से प्रेरित होकर शूटिंग शुरू की। यहीं उन्होंने तय किया कि खेल को ही करियर बनाएंगी। आर्थिक हालात कमजोर थे, लेकिन सपना था कि खेल के जरिये अपनी पहचान बनाएं और परिवार को सहारा दें।
परिवार उनके फैसले के साथ था, लेकिन आसपास के लोगों को यह मंजूर नहीं था कि लड़की खेल के लिए घर से बाहर जाए। नीरू बताती हैं, 'लोग कहते थे, लड़की है बाहर जाकर क्या करेगी।' कई तरह की बातें हुईं, लेकिन वह आगे बढ़ती रहीं। मां सुदेश और पिता सुरेश ने हर फैसले में उनका साथ दिया। नीरू मानती हैं कि अगर वह लड़का होतीं तो शायद कई चीजें आसान होतीं, लेकिन 2020 में खेलो इंडिया और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में खेलने लगीं तो लोगों का नजरिया बदलने लगा। नीरू के लिए शक्ति का अर्थ है बिना किसी दबाव के अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं लेना, अपनी खुशी के लिए खेलना और अपने सपनों के लिए काम करना।
परवीन हुड्डा: फैसले से ज्यादा जरूरी उस पर कायम रहना

परवीन के लिए बाक्सिंग पदक जीतने से कहीं ज्यादा, अपनी जिंदगी का फैसला स्वयं लेने की कहानी है। गांव के स्टेडियम में खिलाड़ियों को बाक्सिंग करते देखकर उनके मन में रिंग में उतरने की इच्छा हुई। स्कूल में होने वाले लड़ाई-झगड़ों से खुद को मजबूत बनाने के लिए उन्होंने स्वयं इस खेल को चुना। शुरुआत में गांव के सरपंच और कोच सुधीर हुड्डा ने प्रशिक्षण दिया। करीब छह महीने बाद राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पदक मिला तो लगा कि इसी खेल में पहचान बनाई जा सकती है। इसके बाद सफलता ने आत्मविश्वास बढ़ाया और बाक्सिंग करियर बन गई। परिवार ने कभी रोका नहीं।
आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन परिवार ने साथ दिया। हां, चोट और भविष्य को लेकर चिंता जरूर थी। परवीन ने रिंग में अपने प्रदर्शन से जवाब दिया। उनके सफर में ठहराव भी आया। चयन से चूकने और लंबे समय तक बाक्सिंग से दूर रहने के बाद वह निराश हुईं, लेकिन फिर शून्य से शुरुआत की। वर्ष 2021 में खेल के आधार पर आइटीबीपी में नौकरी मिली। आज देश के लिए खेलते हुए पदक जीतना उनके उसी फैसले पर टिके रहने की कहानी है। परवीन मानती हैं कि अपनी जिंदगी और करियर का फैसला स्वयं लेना और मुश्किल हालात में भी उस फैसले पर कायम रहना ही असली ताकत है।
अंकिता भकत: पिता ने कहा अपनी राह चुनो

अंकिता की कहानी में परिवार का भरोसा सिर्फ समर्थन नहीं, बल्कि बेटी को अपनी राह चुनने की स्वतंत्रता का उदाहरण है। कोलकाता के बागबाजार की संकरी गलियों में घर-घर दूध पहुंचाकर परिवार चलाने वाले पिता शांतनु भकत और मां शीला की इकलौती संतान अंकिता के लिए घर में कभी बेटा-बेटी का भेद नहीं रहा। 10 वर्ष की उम्र में मैदान के किनारे तीरंदाजों को अभ्यास करते देखा तो इस खेल ने उन्हें आकर्षित किया। माता-पिता ने उनकी रुचि को समझा और तीरंदाजी क्लब में दाखिला दिलाया।
अंकिता कहती हैं, 'मैं ही मां-बाप का बेटा हूं और मैं ही बेटी।' 2014 में टाटा तीरंदाजी अकादेमी, जमशेदपुर में प्रवेश उनके करियर का निर्णायक मोड़ बना। व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में नाकआउट से बाहर होने की निराशा के बाद उन्होंने महिला टीम स्पर्धा में वापसी की और साथी खिलाड़ियों के साथ स्वर्ण जीता। व्यक्तिगत हार को टीम की जीत में बदलना उनके लिए खेल के साथ जीवन का भी सबक रहा। अंकिता के लिए शक्ति का अर्थ अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता और स्वावलंबन है।
परिनाज धालीवाल: शौक बन गया करियर

पटियाला की परिनाज ने शूटिंग की शुरुआत किसी बड़े लक्ष्य के साथ नहीं की थी। सातवीं कक्षा में पहली बार बंदूक थामी तो यह उनके लिए रोमांचक अनुभव था। न्यू मोतीबाग पैलेस गन क्लब में ट्रैप से शुरुआत हुई। दो दिन खेलने के बाद वह बोर्डिंग स्कूल लौट गईं। उनके खेल और रुचि को देखकर पिता रतनदीप सिंह धालीवाल ने उनके लिए ट्रैप की बंदूक खरीदी। बाद में परिनाज ने स्कीट आजमाने की इच्छा जताई तो पिता ने उसके लिए भी गन दिला दी। करीब 10 वर्ष से मार्गदर्शन कर रहे मेंटर अमर जंग सिंह ने उन्हें स्कीट का एक स्टेशन आजमाने की सलाह दी।
खेल पसंद आया तो उन्होंने इसे अपना मुख्य खेल बना लिया। व्यक्तिगत स्पर्धाओं में स्वर्ण मिलने लगे तो शौक महत्वाकांक्षा और फिर करियर में बदल गया। हालिया एशियाई खेलों में दो कांस्य पदक जीत चुकीं परिनाज के लिए ताकत का मतलब अपनी जिंदगी के फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता है। खराब प्रदर्शन के बाद मां रंजना धालीवाल का कहना कि 'हार मत मानो, अगली बार बेहतर होगा' ने भरोसे को मजबूत किया। पढ़ाई और खेल दोनों के बीच संतुलन बनाते हुए परिनाज ने अपनी पसंद को अपनी पहचान में बदला। परिनाज मानती हैं कि अपने जीवन के फैसले स्वयं लेने की स्वतंत्रता और परिवार का उस फैसले पर भरोसा ही वह ताकत है, जिसने उन्हें शौक को करियर में बदलने का हौसला दिया।
आशी चौकसे: स्वयं रास्ता बनाया

आशी की कहानी यह बताती है कि हर बेटी का सपना बचपन से तय हो, यह जरूरी नहीं। कभी-कभी एक अवसर उसकी जिंदगी की दिशा बदल देता है। 10वीं कक्षा में पढ़ाई पर ध्यान दे रहीं आशी ने एक राज्यस्तरीय आयोजन में स्वर्ण जीता। वहां मौजूद एक कर्नल ने उनकी निशानेबाजी की तकनीक देखकर उन्हें इस खेल में आगे बढ़ने की सलाह दी। आशी ने यह बात माता-पिता को बताई। उन्होंने बेटी की बात को गंभीरता से लिया और उसके प्रशिक्षण की व्यवस्था तलाशनी शुरू की। 2017 में मध्यप्रदेश राज्य अकादेमी के चयन ट्रायल में 250 खिलाड़ियों में से सिर्फ दो का चयन हुआ, जिनमें आशी भी थीं।
अकादेमी में आने के बाद शूटिंग को उन्होंने गंभीरता से करियर बनाया। जब पहली बार भोपाल से बाहर केरल में 20 दिन के लिए अकेले जाना पड़ा तो परिवार और आसपास के लोग चिंतित थे, लेकिन परिवार ने उन्हें रोकने के बजाय भरोसा किया। आज देश-विदेश में अकेले जाने वाली आशी कहती हैं कि मुझे हमेशा परिवार अपने साथ महसूस होता है। आशी मानती हैं, 'जब तक परिवार में बेटियों को अपने करियर चुनने की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, वह अपना सौ प्रतिशत योगदान नहीं दे सकतीं।'
