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सिर्फ 'लॉलीपॉप' या 'सॉरी-सॉरी' नहीं है भोजपुरी गाने! बिहार के 'निर्गुण' गीत सुनकर, छलक आएंगे आंखों से आंसू

Published: Sat, 05 Sep 2026 02:17 PM (IST)

बिहार के लोक संगीत में निर्गुण गायन की खास जगह है। इन गीतों को सुनकर शांति और वैराग्य का अनुभव होता है।

बिहार के लोक संगीत का हिस्सा है निर्गुण (AI Generated Image)

बिहार के लोक संगीत का हिस्सा है निर्गुण (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या बिहार के गानों को आप सिर्फ भोजपुरी फिल्मी गानों से ही जोड़कर देखते हैं? अगर हां, तो शायद आपने निर्गुण नहीं सुना होगा। निर्गुण बिहार के लोक संगीत का हिस्सा है, जो वहां की संस्कृति से जुड़ा है। ये गीत सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनाए गए हैं, बल्कि ये आध्यात्म से जुड़ने का एक जरिया भी हैं। 

भोजपुरी निर्गुण गीतों में भरत शर्मा व्यास का अहम योगदान रहा है। इन्होंने अपने गीतों के जरिए इसे घर-घर तक पुहंचाया। इसलिए इन्हें निर्गुण सम्राट भी कहा जाता है। आइए जानें कि बिहार के निर्गुण गीत होते क्या हैं और इसकी खासियत क्या है।

क्या होते हैं निर्गुण गीत?

निर्गुण का मतलब होता है, गुणों से परे। यानी वो ईश्वर, जो निराकार है और हर जगह मौजूद है। कबीरदास और रविदास जैसे संतों की सीख से निकले ये गीत मृत्यु, आत्मा और परमात्मा के संबंध और संसार की मोह-माया की मिथ्या के बारे में बताते हैं।

क्या है निर्गुण गीतों की खासियत

इन गीतों में इंसानी शरीर के नष्ट होने का मर्म छिपा है। इन गीतों में अक्सर शरीर को मिट्टी का पुतला या किराए का मकान कहा जाता है, जिसे आत्मा एक दिन छोड़कर आगे बढ़ जाती है। इन गीतों में गांव के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी बातों का इस्तेमाल करके आत्मा से परमात्मा के मिलन या बिछड़ने के बारे में बताया गया है। ये संगीत मन में वैराग्य और शांति की भावना जगाते हैं। 

ये बिहार के लोकगीतों का हिस्सा हैं, जिन्हें हारमोनियम, ढोलक, मंजीरा आदि की धुन पर गाया जाता है। इन गीतों की शुरुआत अक्सर धीमी बोती है, जो धीरे-धीरे बढ़ती है। गायक ऊंचे सुर में इन गीतों को गाते हैं, जिससे गीतों का दर्द सुनने वाले के सीधे दिल में उतरता है। 

निर्गुण सम्राट भरत शर्मा व्यास

बिहार के बक्सर जिले में जन्में भरत शर्मा व्यास को भोजपुरी लोक संगीत में निर्गुण सम्राट के रूप में जाना जाता है। इन्होंने निर्गुण गायन को गांवो से निकालकर बड़े-बड़े मंचों तक पहुंचाया। 1980 के दशक में जब संगीत जगत में कैसेट की क्रांति आई, तो इनके निर्गुण के कैसेट घर-घर पहुंचे और लोगों ने इन गीतों को खूब पसंद किया। 

फूहड़ता से दूर, उन्होंने भोजपूरी संगीत को नई पहचान दिलाई। कजरी, पूरबी और पचरा जैसे गीतों को गाकर भी लोगों के दिलों में उतरे।