छऊ ही नहीं, झारखंड का 'करमा डांस' भी है बेहद खास, हजार सालों से भी पुराना है इस आदिवासी लोक नृत्य का इतिहास
झारखंड का लोक नृत्य करमा, वहां के जनजातीय समुदाय से जुड़ा है। इस नृत्य का इतिहास हजार सालों से भी पुराना माना जाता है।

झारखंड की शान है करमा डांस (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। झारखंड में सिर्फ छऊ नृत्य नहीं होता। करमा भी यहां की लोक संस्कृति का अहम हिस्सा है। करमा एक लोक नृत्य है, जो झारखंड के आदिवासी समुदाय से नाता रखता है। झारखंड के साथ-साथ ये छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों में भी काफी मशहूर है।
ये नृत्य सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं किया जाता। करमा नृत्य प्रकृति और आदिवासी जीवन से काफी गहराई से जुड़ा है। लेकिन क्या आप जानते हैं करमा नृत्य की शुरुआत कैसे हुई थी? आइए जानें झारखंड के इस लोक नृत्य का इतिहास और ये क्यों किया जाता है।
क्या है करमा डांस का इतिहास?
माना जाता है कि करमा नृत्य का इतिहास हजार सालों से भी ज्यादा पुराना है। इसकी जड़े आदिवासी पौराणिक कथाओं से जुड़ी हुई हैं। छोटा नागपुर पठार के आदिवासी समुदायों में ये परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी बहुत धूमधाम के साथ इस परंपरा को निभाया जाता है।
लोक कथाओं के मुताबिक, करम या करमा के पेड़ को जीवन, शक्ति और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस पवित्र पेड़ की पूजा करने और इसके चारों ओर नृत्य करने से पूरे गांव में खुशहाली आती है, अच्छी फसल होती है और परिवार में समृद्धि आती है। इसलिए करमा त्योहार भाद्रपद के महीने में मनाया जाता है, जिसमें ये खास नृत्य होता है।
करमा पर्व की शुरुआत अनुष्ठानों से होती है, जिसमें गांव की कुवांरी लड़कियां इस अवसर पर उपवास रखती हैं। इसके बाद जंगल से करम वृक्ष की डाली को गांव के बीच में जमीन में रोपा जाता है। इस पर्व के दौरान लोग पारंपरिक गीत गाते हुए इस डाली की ओर घूमते हुए नृत्य करते हैं।
कैसे किया जाता है करमा नृत्य?
करमा डांस में नर्तक और नर्तकियां एक-दूसरे की कमर में हाथ डालकर घेरा बनाके डांस करते हैं और वाद्य यंत्रों की धुन पर आगे-पीछे बढ़ते हुए नृत्य करते हैं। महिलाएं आमतौर पर लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ियां, चांदी के आदिवासी स्टाइल गहने और पैरों में घुंघरू पहनती हैं। वहीं, पुरुष धोती, रंग-बिहरंगा साफा और मालाएं पहनते हैं।
इस नृत्य को मुख्य रूप से मांदर, ढोल, नगाड़ा, टिमकी और झाल की धुन पर बनाया जाता है। मांदर की गूंज और आदिवासियों के सुरीले गीत काफी मनमोहक होते हैं।
