न तलवार, न युद्ध मैदान: मिलिए उस रानी से जिसने कलम और शिक्षा से बदला भारत का इतिहास
इतिहास के पन्नों में ब्यूटी विद ब्रेन वाली रानियों का जिक्र बहुत कम मिलता है।

मालवा की रानी अहिल्याबाई होल्कर (Image Source: AI Generated)

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इतिहास के पन्नों में ‘खूब लड़ी मर्दानी, वो तो झांसी वाली रानी’ जैसी बातें तो लिखी गईं हैं, लेकिन ब्यूटी विद ब्रेन वाली रानियों का जिक्र बहुत कम मिलता है। ऐसा इसलिए क्योंकि राजाओं और रानियों को हमेशा से ही युद्ध कौशल से जोड़कर देखा जाता रहा है। पर क्या आप जानते हैं कि भारत के इतिहास में एक ऐसी रानी भी रही जो अपने तेज दिमाग के लिए ज्यादा जानी गईं? चलिए आपको उस रानी के बारे में बताते हैं, जिन्हें युद्ध से नहीं बल्कि अपनी शिक्षा से पहचान बनाई।
मालवा की रानी अहिल्याबाई होल्कर
मालवा की रानी अहिल्याबाई होल्कर आज देश की सबसे दूरदर्शी महिलाओं में गिनी जाती हैं। उनके कौशल, बुद्धिमता और साहस की आज भी दाद दी जाती है। उनका जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर में स्थित जामखेड के चोंडी गांव में बहुत ही साधारण से परिवार में हुआ था। इस जमाने में लड़कियों के पढ़ने-लिखने की कोई बात नहीं करता था, पर इसके बावजूद उन्होंने न सिर्फ शिक्षा ली, बल्कि इसके साथ तलवारबाजी, घुड़सवारी और तीरंदाजी में भी महारत हासिल की।
सादगी और मजबूत व्यक्तित्व ने बनाया मालवा की रानी
मल्हार राव होल्कर को अहिल्याबाई होल्कर की सादगी और कौशल इतना भाया कि उन्होंने अपने बेटे खांडेराव होल्कर से अहिल्याबाई की शादी करवाना तय कर लिया। इस तरह साल 1733 में अहिल्याबाई मालवा की होल्कर रानी बन गईं। इस शादी के 12 साल बाद उनके पति खांडेराव की मृत्यु हो गई। इस परिस्थिति में अहिल्याबाई ने सती होने का मन बना लिया लेकिन उनके ससुर ने रानी को यह कदम उठाने नहीं दिया।
ससुर के सरंक्षण में अहिल्याबाई ने ली बड़ी सीख
मल्हार राव होल्कर ने अहिल्याबाई को सेना के साथ-साथ प्रशासनिक कौशल भी सिखाया। यह कौशल ही इतिहास में उनकी बड़ी पहचान बना क्योंकि ससुर और अपने बेटे को खोने के बाद रानी ने खुद को कमजोर नहीं किया। उन्होंने अपना सारा समय राज्य और लोगों के कल्याण में लगा दिया।
इंदौर की शासक बनीं
अहिल्याबाई ने मालवा का शासन संभालने के लिए पेशवा से अनुमति मांगी और 11 दिसंबर 1767 को वो इंदौर की शासक बनीं। इसके बाद तो जैसे राज्य की तरक्की के दिन शुरू हो गए। साथ ही, कई मौकों पर युद्ध लड़कर अपने साहस का परिचय भी दिया।
राजधानी महेश्वर खूब फली फूली
जब तक रानी अहिल्याबाई ने शासन संभाला उनकी राजधानी महेश्वर में विकास होता चला गया। अब यह साहित्यिक, संगीत, कलात्मक और औद्योगिक गतिविधियों के केंद्र में में बदल गई। इतना ही नहीं, यह वो समय था जब कवियों, विद्वानों, कलाकारों और मूर्तिकारों का राज्य में भव्य स्वागत किया जाता था। यही वजह रही कि अहिल्याबाई होल्कर को दार्शनिक रानी का भी दर्जा दिया गया है।
यह भी बताते चलें कि अहिल्याबाई के समय में महेश्वर कपड़ों के उद्योग के लिए भी जाना गया, आज बाजारों में बिक रही महेश्वरी साड़ियां इसका सबसे बड़ा प्रमाण हैं। वहीं, तीर्थस्थलों के निर्माण और मरम्मत करवाने में भी रानी का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
