नई दिल्ली, रूही परवेज़। Hypertension During Pregnancy: हाइपरटेंशन यानी हाई ब्लड प्रेशर एक तेज़ी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्या है, जिससे भारत में कई लोग जूझ रहे हैं। यह स्थिति ख़राब लाइफस्टाइल का कारण होती है, जिसमें ख़राब डाइट और व्यायाम की कमी अहम भूमिका निभा सकते हैं। एक समय था जब हाइपरटेंशन की समस्या सिर्फ उम्रदराज़ लोगों में ही दिखती थी, लेकिन अब यह नौजवानों और यहां तक कि बच्चों में भी देखी जा रही है। इसके अलावा हाई ब्लड प्रेशर प्रेग्नेंसी के दौरान भी देखा जाता है।

प्रेग्नेंसी के दौरान मां और शिशु की मृत्यु की घटनाएं हम में से कई लोगों ने सुनी होंगी। कुछ प्रतिशत मातृ मृत्यु दर का कारण गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन भी होता है और इसके बारे में काफी कम लोगों को जानकारी होती है। तो आइए मुंबई के पीडी हिंदुजा अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉ. किरण कोएलो से इसके बारे में ज़्यादा जानकारी हासिल करते हैं।

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन की समस्या क्यों होती है?

हम सब जानते हैं कि हाइपरटेंशन ब्लड प्रेशर या रक्तचाप बढ़ जाने से संबंधित है, तो उसी तरह से गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन होना गर्भावस्था के दौरान ब्लड प्रेशर बढ़ जाने का संकेत देता है। आमतौर पर, गर्भावस्था के लगभग पांच महीने बाद हाइपरटेंशन की दिक्कत शुरू होती है। गर्भवती महिला के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्चे को भी प्रभावित करने वाली बीमारियों में से है। भारत में, कुल गर्भवती महिलाओं में से लगभग 6-8% को हाइपरटेंशन होता है।

जिस महिला का रक्तचाप 20 सप्ताह से पहले सामान्य था और उसे प्रोटीनूरिया (मूत्र में अतिरिक्त प्रोटीन पाया जाना) नहीं था, उस गर्भवती महिला के ब्लड प्रेशर की रीडिंग जब 140/90 मिमी एचजी से ज़्यादा होती है, तब गर्भावस्था दौरान होने वाले हाइपरटेंशन का निदान किया जाता है।

क्या यह ख़तरनाक होता है?

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन से उस महिला को कई खतरनाक प्रभावों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे कि प्रीक्लेम्पसिया, एक्लम्पसिया (ऐंठन) और गंभीर मामलों में पीआरईएस सिंड्रोम, प्रसवपूर्व रक्तस्राव, प्रसवोत्तर रक्तस्राव, इंट्राक्रैनील रक्तस्राव, इंट्राहेपेटिक रक्तस्राव, एडिमा, जलोदर, हेलप सिंड्रोम, एन्ड ऑर्गन डैमेज की वजह से लिवर, किडनी फेलियर, कोग्युलेशन डिसऑर्डर, क्रोनिक हाइपरटेंशन आदि।

प्रीक्लेम्पसिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें गर्भवती महिला के मूत्र में प्रोटीन की मात्रा अत्यधिक हो जाती है। प्रिक्लेम्पसिया एक्लेम्पसिया का शुरूआती चरण है - इसमें गर्भवती महिला को दौरे पड़ते हैं। कई मामलों में, एक्लेम्पसिया गर्भावस्था के आखरी दिन करीब आने पर होता है, इसमें गर्भवती महिला और पेट में पल रहे बच्चे के लिए गंभीर जटिलताएं पैदा हो जाती हैं।

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन होना, गर्भ में शिशु के विकास में ख़लल का कारण बन सकता है, यानी मां के पेट में शिशु का विकास जिस गति से होना चाहिए उस गति से न होकर, बहुत ही धीरे-धीरे होता है। गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन की वजह से स्टिल बर्थ, गर्भपात, ऑपरेटिव इंटरफेरेंस बढ़ना, समय से पहले जन्म हो जाना जैसे समस्याएं भी हो सकती हैं।

गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन क्यों होता है?

कुछ स्थितियां हैं जो गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन की जोखिम को बढ़ा सकती हैं।

- गर्भावस्था से पहले से मौजूद हाई ब्लड प्रेशर

- शरीर में ग्लूकोज़ का स्तर बढ़ जाना

- किडनी, मूत्रपिंड का स्वास्थ्य ठीक न होना

इनके अलावा, प्लेसेंटा यानी नाल का वस्क्युलराइज़ेशन ठीक न होना (जब नाल ठीक से विकसित नहीं होती है) भी गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन होने का कारण बन सकता है। गर्भावस्था के दौरान हाइपरटेंशन के इलाज के लिए इसका जल्द से जल्द पता लगाना ज़रूरी है, साथ ही गर्भावस्था जिस चरण में है उसके अनुसार एंटीहाइपरटेन्सिव दवाइयां दी जाती हैं।

गर्भावस्था का दौर उस महिला के लिए और पूरे परिवार के लिए काफी यादगार होता है। इसलिए जल्द से जल्द और सही समय पर समस्या का पता चलना, नियमित रूप से स्वास्थ्य जांच महिला और शिशु दोनों के लिए जीवन वरदान साबित हो सकते हैं।

Edited By: Ruhee Parvez