नई दिल्ली, लाइफस्टाइल डेस्क। Coronavirus Effects On Mental Health: ऑस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी ऑफ वेल्स की एक ग्लोबल टीम ने नए कोरोना वायरस यानी कोविड-19 के मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक होने वाले प्रभावों पर शोध किया। इस शोध का उद्देश्य गर्भ से लेकर बुढ़ापे तक हज़ारों लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर कोरोना वायरस के दीर्घकालिक प्रभावों को ट्रैक करना है।

दो तरह के मनोवैज्ञानिक तनाव
इस महामारी का सभी के दिमाग़ पर दो चरम मनोवैज्ञानिक तनावों का प्रभाव पड़ रहा है: पहला अस्तित्वगत का ख़तरा और दूसरा सामाजिक अलगाव। इस टीम को ऑस्ट्रेलिया, यूके और अमेरिका से करीब 3000 लोगों को इस शोध में शामिल करने की उम्मीद है, जिसमें इन सभी की महामारी से पहले और बाद की मनोदशा को आंका जाएगा। साथ ही आने वाले महीनों में उनके संज्ञानात्मक कार्य और सोशल नेटवर्क को ट्रैक किया जाएगा।
 
इन पर रहेगा फोकस
इस शोध का खास फोकस गर्भवती महिलाओं और किशोर अवस्था के बच्चों पर होगा। ये दो ऐसे ग्रुप्स पर रहेगा जो ज़्यादा कमज़ोर माने जाते हैं और आइसोलेशन का उन पर बेहद खराब असर पड़ा है। इस शोध की चीफ इंवेस्टीगेटर डॉ. सुज़ैन श्विज़र ने कहा, " कोरोना वायरस महामारी ने सभी लोगों की ज़िंदगी ज़बर्दस्त तरीके से बदल दी है, इसलिए यह जानना मुश्किल है कि इसका प्रभाव कितने लंबे समय तक रहने वाला है।"
 
उन्होंने आगे कहा, "हम विशेष रूप से युवा लोगों में फोकस करना चाहते हैं क्योंकि इस उम्र में वे अपने परिवार से दूर हो जाते हैं और दोस्तों के करीब होते हैं, लेकिन अचानक हुई सोशल डिस्टेंसिंग ने उनके दोस्तों को भी दूर कर दिया है।" रिसर्च टीम इस बात से चिंतित है कि इस समूह में सामाजिक अलगाव का प्रभाव आने वाले लंबे समय तक रहेगा। स्कूल-कॉलेज के लंबे समय तक बंद रहने से उनके संज्ञानात्मक विकास पर भी बुरा असर पड़ेगा। खासकर, अमेरिका और ब्रिटेन में जहां स्कूल बंद हैं, या ऑस्ट्रेलिया, जहां युवाओं की ज़िंदगी काफी बदल गई है।
 
कैसे होगा शोध
शोधकर्ताओं के मुताबिक, शुरुआत में, सहभागियों को एक घंटा लंबा ऑनलाइन सरवे पूरा करने के लिए कहा जाएगा। जिससे इस महामारी से पहले और बाद की उनकी मनोदशा के बारे में पता चलेगा। 
 
उनसे उनके सोशल नेटवर्क में शामिल लोगों से उनके कनेक्शन का मूल्यांकन करने के लिए कहा जाएगा। साथ ही उनकी कार्यशील मेमोरी का आकलन करने के लिए उन्हें एक टास्क दिया जाएगा, जिससे उनकी कम समय में स्मृति में जानकारी संग्रहीत करने की क्षमता का पता चलेगा।
 
तीन महीनों और फिर 6 महीनों बाद एक बार फिर इन प्रतिभागियों से उनकी मनोदशा मूड, संज्ञानात्मक कार्य और सोशल नेटवर्क में प्रगति को ट्रैक करने के लिए एक छोटा सर्वेक्षण कराया जाएगा।
 
डॉ. सुज़ैन श्विज़र ने कहा, "हमें उम्मीद है कि इस शोध के अंत में, हमारे पास विश्वसनीय और सटीक डेटा होगा ताकि हम इस महामारी के दीर्घकालिक प्रभावों को समझ सकें। 
 

Posted By: Ruhee Parvez

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