बच्‍चों को बचाएं इससे         

मेरे 8 वर्षीय बेटे को जब भी मौका मिलता है तो वह लैपटॉप पर गेम्स खेलने बैठ जाता है और वहां से जल्दी हटने को तैयार नहीं होता। मना करने के बावज़ूद मेरी बातों का उस पर कोई असर नहीं होता। उसकी यह आदत कैसे सुधरेगी? 

प्रतिभा शर्मा, दिल्ली 

यह आज के दौर की एक ऐसी आम समस्या है, जिससे ज्य़ादातर अभिभावक जूझ रहे हैं। जिस तरह अच्छी दवाओं के भी कुछ साइड इफेक्ट्स होते हैं, उसी तरह कंप्यूटर, मोबाइल और इंटरनेट जैसी उपयोगी सुविधाओं की वजह से भी हमें कई तरह की परेशानियां होती हैं। आज बिजली और पानी की तरह इंटरनेट भी हमारी जि़ंदगी का एक ऐसा ज़रूरी हिस्सा बन चुका है कि इसके बिना रोज़मर्रा की सारी गतिविधियां ठप पड़ जाएंगी। इसलिए बच्चों को इस सुविधा से पूरी तरह दूर रखना संभव नहीं है। आजकल केवल बच्चे ही नहीं,बल्कि  बड़े भी जाने-अनजाने इसकी ओर आकर्षित होते हैं। कई बार बच्चों की तरह उन्हें भी इसका एडिक्शन हो जाता है लेकिन यह बच्चों के लिए ज्य़ादा नुकसानदेह साबित होता है क्योंकि उनमें इतनी समझ नहीं होती कि वे इसका सही और संयमित इस्तेमाल करें। आम बोलचाल की भाषा में लोग बच्चों की ऐसी लत को इंटरनेट एडिक्शन का नाम देते हैं पर अमेरिकन साइकोपैथिक एसोसिएशन द्वारा तय किए गए डाइग्नॉस्टिक एंड स्टैटिकल मैनुअल ऑफ मेंटल डिसॉर्डर यानी डीएसएम-5 के अनुसार इंटरनेट अब लोगों के जीवन का ज़रूरी हिस्सा बन चुका है। ऐसे में इंटरनेट के साथ एडिक्शन जैसे नकारात्मक शब्द को जोडऩा गलत है। इसीलिए आज के दौर में वैज्ञानिकों द्वारा इसे गेमिंग एडिक्शन का नाम दिया गया। मनोवैज्ञानिक डी.एस.यंग ने बच्चों और बड़ों की ऐसी लत पर गहन अध्ययन किया है। उनका मानना है कि इसकी वजह से बच्चों ने खेलना-कूदना कम कर दिया है। उनके शारीरिक-मानसिक विकास पर इसका नकारात्मक असर नज़र आने लगा है। यूट्यूब, विडियो गेम्स और सोशल साइट्स के साथ •यादा वक्‍त बिताने वाले बच्चे आभासी दुनिया में जीने के आदी हो चुके हैं। इसी वजह से उनकी सोशल स्किल्स भी कमज़ोर होती जा रही हैं। पुराने समय की तुलना में आजकल के बच्चे दूसरों के हाव-भाव को आसानी से समझ नहीं पाते। संचार के ऐसे माध्यम बचपन से ही इंसान को उसकी मूल प्रवृत्ति से दूर कर रहे हैं क्योंकि मनुष्य जन्मजात रूप से सामाजिक प्राणी है। ऐसे साधन बच्चों को आसपास के सहज वातावरण से दूर कर देते हैं, जिससे उनका समाजीकरण सही ढंग से नहीं हो पाता। इसलिए आप अभी से ही अपने बेटे की इस आदत को नियंत्रित करने की कोशिश में जुट जाएं। अपने लैपटॉप में हमेशा पासवर्ड लगा कर रखें। अगर कभी वह स्कूल का प्रोजेक्ट वर्क पूरा करने के लिए लैपटॉप का इस्तेमाल करना चाहे तो इसके लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित कर दें। मसलन स्कूल का काम पूरा करने बाद उसे लैपटॉप पर गेम्स खेलने के लिए केवल आधे घंटे का समय दें। प्रतिदिन शाम को उसे खेलने के लिए पार्क में ज़रूर भेजें, रोज़ाना थोड़ा व$क्त निकाल कर उससे बातचीत करें और घरेलू कार्यों में भी सहयोग लें। स्पोट्र्स, पेंटिंग, म्यूजि़क और डांस जैसी क्रिएटिव ऐक्टिविटीज़ में उसे आगे बढऩे के लिए प्रेरित करें। जब वह व्यस्त रहेगा तो इंटरनेट की ओर उसका ध्यान नहीं जाएगा और उसकी यह आदत अपने आप छूट जाएगी।

By Sakhi User