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सावन की शान और जयपुर के राजघराने की पसंद! 1727 से बन रही इस शाही मिठाई 'घेवर' की कहानी कर देगी हैरान

Published: Sun, 23 Aug 2026 11:04 AM (GMT+05:30)

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जयपुर से जुड़ा घेवर का इतिहास (AI Generated Image)

जयपुर से जुड़ा घेवर का इतिहास (AI Generated Image)

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लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। इतिहास में देखें तो 300 से 400 साल पहले से घेवर का उल्लेख आया हुआ है। श्रीकृष्ण के भजन से लेकर अधिकांश राजस्थानी लोकगीतों में जब-जब सावन की चर्चा होती है, वहां घेवर जरूर आता है। कभी शाही भोजन का हिस्सा रहा घेवर धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंचने लगा। 

खाने में जितनी मीठी, मगर बनाने में उतनी ही पेचीदा इस मिठाई के बारे में आइए जानें लक्ष्मी मिष्ठान भंडार, जयपुर के अजय अग्रवाल से। खास बात यह है कि घेवर बनाने के तरीके में आज भी कोई खास परिवर्तन नहीं आया है। हां, आप इसकी सजावट में या आकार में बदलाव ला सकते हैं, लेकिन कच्चे माल के संयोजन में ज्यादा परिवर्तन का मतलब होगा कि यह अपने स्वाद से भटक गया।

पीढ़ियों पुरानी परंपरा

किसी भी चीज में जब तक उसकी मौलिकता और प्रामाणिकता बनी रहती है, तब तक उसका आकर्षण सदाबहार रहता है। प्रयोगधर्मी नवाचार भले ही तात्कालिक तौर पर लोकप्रिय हो जाएं, लेकिन वे उतनी ही तेजी से अपनी विशिष्टता खो बैठते हैं। 

आज फ्यूजन फूड का दौर है- पाइनएप्पल, रोज, बिस्काफ और चाकलेट फ्लेवर वाले घेवर बाजार में उपलब्ध हैं। हालांकि, परंपरागत स्वाद और सेहत दोनों को सुरक्षित रखने के लिए घेवर को उसके मूल स्वरूप में पेश करना ही एकमात्र रास्ता है। 

लक्ष्मी मिष्ठान भंडार की 13वीं पीढ़ी इस धरोहर को सहेजने का काम कर रही है। हमारा मिष्ठान निर्माण से जुड़ाव साल 1727 से है, जब जयपुर के संस्थापक महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने हमारे पूर्वजों को यहां आमंत्रित कर अपनी सेवा में लिया था। महाराजा का स्पष्ट निर्देश था-'घेवर की शुद्धता और विधि से कभी कोई समझौता न हो, यही इसकी खासियत बनेगी।' 

आज भले ही दिल्ली, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में घेवर उपलब्ध है, फिर भी लोग असली घेवर का स्वाद चखने जयपुर खिंचे चले आते हैं। सदियों पुरानी प्रामाणिक विधि और गुणवत्ता बनाए रखना ही इसकी असली वजह है। बढ़ती महंगाई के दौर में भी स्वाद से कभी समझौता नहीं किया गया; बल्कि इसी गुणवत्ता को एक पायदान ऊपर ले जाकर स्पेशल पनीर घेवर तैयार किया। 

बाजार में घेवर को कुरकुरा बनाने और उसका क्राउन (किनारा) बनाए रखने के लिए लोग उसमें बेसन की मिलावट कर देते हे हैं। वहीं पारंपरिक तरीके और शुद्धता पर टिका भरोसा ही जयपुर के घेवर को आज भी बेमिसाल बनाए हुए है।

अनुभव देता स्वाद

घेवर बनाने में सबसे बड़ा निवेश समय का होता है। घेवर बनाने का काम नक्काशी की तरह है, जिसमें एकाग्र होकर लगातार काम करना पड़ता है। दो लोग 10-12 घंटे में 130-140 पीस ही बना पाते हैं। धैर्य की मांग रखने वाले इस काम के दौरान लगातार गर्म कड़ाही के आगे बैठना पड़ता है। कच्चे माल की गुणवत्ता और जिस तय तापमान पर इसे बनाया जाता है, उसी से घेवर का स्वाद आता है। 

उचित तापमान पर लगातार घोल को समय-समय पर डालकर ही घेवर की सही जाली बनती है। इसमें डिजिटल फूड थर्मामीटर व कड़ाही में लगे हुए थर्मोस्टेट मदद करते हैं। इसमें अनुभव का भी बड़ा योगदान होता है, क्योंकि जब रुक-रुककर घेवर का घोल डाला जाता है, तो किस तरह घोल घी में छलक रहा है, यह देखकर भी अनुभवी घेवर निर्माता समझ जाते हैं कि तापमान कम है अथवा ज्यादा। हमारे पास 25 से 40 साल का अनुभव रखने वाले लोग हैं, जो अब नई पीढ़ी को भी सिखा रहे हैं।

सफर मिठास का

गर्मागर्म कड़ाही से निकलने के तुरंत बाद घेवर का सफर चाशनी में खत्म नहीं होता। इसके स्वाद और बनावट को एकदम सटीक बनाने के लिए एक बारीक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। कड़ाही से बाहर आते ही घेवर को कुछ देर के लिए अलग रखा जाता है ताकि इसकी महीन जाली में मौजूद अतिरिक्त घी बूंद-बूंद करके निकल जाए। 

यह प्रक्रिया बहुत जरूरी है, वरना यह चिकनाई इसके स्वाद को बिगाड़ सकती है। करीब 400 ग्राम घेवर से लगभग 100 मिलीलीटर घी निकल जाता है। इसकी चाशनी भी बस यूं ही नहीं बन जाती। साल के 12 में से 10 महीनों में चाशनी का तापमान बदलता रहता है। 

गर्मी में चाशनी को थोड़ा ठंडा रखा जाता है, जबकि सर्दी में इसे थोड़ा गर्म ही इस्तेमाल करते हैं। जब केसर और इलायची से युक्त गुनगुनी चाशनी इस पर ढाली जाती है, तो वह हल्की गर्माहट के साथ घेवर गर्म होकर चाशनी से सराबोर होता जाता है और फिर घी की ही तरह अतिरिक्त चाशनी रिस-रिसकर बाहर निकलती है। इसमें भी कम से कम आधे घंटे का समय चाहिए होता है। 

बिना चाशनी का 300 ग्राम का घेवर जब 500 मिलीलीटर चाशनी से गुजरता है, तो उसमें से करीब 150 मिलीलीटर चाशनी बाहर निकल जाती है-और घेवर में रह जाती है सही और लाजवाब मिठास।

  • घेवर बनाने की कड़ाही की सफाई के लिए बेसन का इस्तेमाल किया जाता है जो घी के साथ कड़ाही में चिपके घेवर के छोटे-महीन अंश को भी अपने में लपेट लेता है। 
  • एकदम महीन गुणवत्ता वाला मैदा, फुल फैट दूध और श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला देसी घी गढ़ते हैं स्वाद की जाली।
  • 220 डिग्री तापमान पर घेवर तैयार किया जाता है। कड़ाही में डूबे डिजिटल फूड थर्मामीटर की मदद से यह तापमान बरकरार रखा जाता है।
  • सात से आठ दिन होती है बिना चाशनी वाले पनीर घेवर की शेल्फ लाइफ। कच्चा माल और घी जितनी उम्दा होगा, घेवर उतने ही लंबे समय तक ठीक बना रहेगा।