क्यों लाखों में बिकती है एक 'पश्मीना शॉल'? असली-नकली के धोखे से बचने के लिए रखें 5 बातों का ध्यान
सर्दियों में पश्मीना शॉल की मांग बढ़ जाती है, जो अपनी खासियत के लिए दुनियाभर में फेमस है। बता दें, यह शॉल कश्मीरी बकरियों के ऊन से बनती है और अपनी दुर्लभता के कारण महंगी होती है। असली पश्मीना की पहचान करने की बात की आती है, तो आज भी ज्यादातर लोगों को इसकी जानकारी नहीं है। आइए, इस आर्टिकल में आपको बताते हैं कि आखिर किन वजहों के चलते 'पश्मीना' की कीमतें लाखों तक पहुंच जाती हैं।

क्या है पश्मीना शॉल और क्यों लाखों में पहुंच जाती है इसकी कीमत? (Image Source: AI-Generated)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। सर्दियों की शुरुआत होते ही बाजारों में शॉल की भरमार दिखने लगती है, लेकिन इन सबके बीच जो नाम सबसे ज्यादा आकर्षित करता है, वह है पश्मीना। मुलायम बादल जैसी छुवन, बेहद हल्का वजन और बेमिसाल गर्माहट- जी हां, पश्मीना शॉल को दुनिया की सबसे खूबसूरत और प्रीमियम शॉल माना जाता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इस एक शॉल की कीमत लाखों तक क्यों चली जाती है और सबसे जरूरी सवाल- असली पश्मीना शॉल की पहचान कैसे की जाती है? आइए, आसान भाषा में जानते हैं इस लग्जरी फैब्रिक से जुड़ी कुछ खास बातें।

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क्या है पश्मीना?
पश्मीना कोई साधारण ऊन नहीं, बल्कि इसे दुनिया के सबसे बारीक और मुलायम फाइबर में गिना जाता है। यह ऊन कश्मीरी बकरियों की एक विशेष नस्ल चांगथांगी (Changthangi Goat) से मिलता है, जो लद्दाख और हिमालय के अत्यधिक ठंडे इलाकों में पाई जाती हैं। इन इलाकों का तापमान सर्दियों में -30°C तक चला जाता है, जिस वजह से इन बकरियों के शरीर पर एक बेहद महीन, गरम और मुलायम अंदरूनी ऊन विकसित होता है। यही ऊन आगे चलकर “पश्मीना” बनता है।
क्यों लाखों में होती है पश्मीना की कीमत?
पश्मीना शॉल महंगी होने के कई कारण हैं, लेकिन तीन वजहें इसे बेहद खास बनाती हैं:
ऊन का दुर्लभ और सीमित उत्पादन
हर बकरी से साल में केवल 80–150 ग्राम ही पश्मीना प्राप्त होता है। एक पूरी शॉल बनाने के लिए कई बकरियों से इकट्ठा ऊन चाहिए होता है, इसलिए इसका उत्पादन शुरू से ही बहुत कम मिलता है।
पूरी तरह हाथों से तैयार की जाती है
असली पश्मीना बनाने में मशीनों का इस्तेमाल लगभग नहीं के बराबर होता है। इसे कातना, बुनाई, रंगाई और कढ़ाई- सब कुछ कारीगर हाथ से करते हैं। यह प्रक्रिया महीनों तक चलती है। बता दें, एक फाइन क्वालिटी की शॉल को बुनने में 3–4 महीने तक लग सकते हैं।
महीनता जो किसी और फाइबर में नहीं
पश्मीना फाइबर की मोटाई सिर्फ 12–16 माइक्रॉन होती है, जो इंसानी बाल से भी कहीं-गुना पतला है। इतनी महीन ऊन को संभालना, बुनना और आकार देना बेहद कठिन कला है। यही इसकी कीमत बढ़ाती है।

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कैसे करें असली पश्मीना की पहचान?
बाजार में नकली पश्मीना की भरमार है, इसलिए पहचान जानना बेहद जरूरी है। ये आसान तरीके आपको मदद करेंगे:
जलाने का टेस्ट
असली पश्मीना को जलाने पर जलते बालों जैसी गंध आती है।
नकली फाइबर जलने पर प्लास्टिक जैसी महक देता है।
(शॉल को न जलाएं, सिर्फ छूटे हुए धागे का टेस्ट किया जाता है।)
रिंग टेस्ट
असली पश्मीना इतना हल्का और महीन होता है कि एक बड़ी शॉल भी आसानी से अंगूठी के बीच से निकल जाती है।
सिंथेटिक या नकली शॉल में यह संभव नहीं होता।
गर्माहट टेस्ट
पश्मीना की गर्माहट प्राकृतिक होती है। इसे हाथ पर रखने पर तुरंत हल्की गर्मी महसूस होती है, जबकि नकली शॉल में ऐसा नहीं होता।
बनावट पहचानें
असली पश्मीना की सतह एकदम स्मूद नहीं होती। इसमें हल्की-सी अनियमितता होती है, जो हाथ से बनाए जाने का संकेत देती है। मशीन से बने नकली शॉल एकदम परफेक्ट और चमकदार दिखते हैं।
कीमत पर करें गौर
अगर कोई दुकानदार कहे कि 2–3 हजार में असली पश्मीना मिल रहा है, तो समझ जाएं- वह नकली है। असली पश्मीना की शुरुआती कीमत भी 15–20 हजार से ऊपर होती है और कारीगरी के अनुसार लाखों तक जाती है।
क्यों है पश्मीना इतना खास?
- हल्का, फिर भी बेहद गरम
- सालों-साल टिकने वाला
- पूरी तरह प्राकृतिक
- बेहद मुलायम और स्किन-फ्रेंडली
- सांस्कृतिक और पारंपरिक महत्व
- कारीगरों की महीनों की मेहनत
यह सिर्फ एक शॉल नहीं, बल्कि एक विरासत है, जो कला, संस्कृति और प्रकृति का खूबसूरत संगम है।
असली पश्मीना शॉल की कीमत उसके नाम, ब्रांड या मार्केटिंग की वजह से नहीं, बल्कि उसकी दुर्लभता, मेहनत और सदियों पुरानी कारीगरी की वजह से होती है। अगर आप कभी पश्मीना खरीदने का सोच रहे हैं, तो पहचान के इन आसान तरीकों को याद रखें और केवल विश्वसनीय जगह से ही खरीदें।

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