जमाने के हिसाब से आपको अपनी डिलीवरी स्पीड बढ़ानी होगी, रिस्क लेना होगा, तभी आगे बढ़ेंगे...लाइफ में आगे बढऩे के ऐसे ही मंत्र दे रहे हैं, जुबिलैंट फाउंडेशन के फाउंडर ऐंड एमडी हरि एस. भरतिया...

पिज्जा डिलीवर करने वाली कंपनी डॉमिनोज केे बारे में तो आप सब जानते ही होंगे। वह आधे घंटे में पिज्जा डिलीवर करने की गारंटी देती है। आपका पिज्जा आधे घंटे में पहुंच भी जाता है। इतना ही नहीं, आप उसे मिनट-दर-मिनट ट्रैक भी कर सकते हैं कि अभी कहां तक पहुंचा। इसका मतलब यह है कि आज कंज्यूमर के पास इतना टेक्निकल सपोर्ट अवेलेबल है कि वह अपना प्रोडक्ट ट्रैक कर सकता है, भले ही वह सिर्फ डेढ़ सौ रुपये का ही क्यों न हो। टेक्नोलॉजी का जमाना है। पहले अवन में पिज्जा पकने में 7 मिनट लगता था। अब ऐसा अवन बना लिया गया है, जिसमें पिज्जा केवल ढाई मिनट में ही पक कर निकल आता है। इसके जरिए मैं यही कहना चाहता हूं कि इनोवेशन एक कॉन्टिन्यूअस प्रॉसेस है। कंज्यूमर और इंडस्ट्री लगातार आपसे बेटर प्रोडक्ट की डिमांड कर रहे हैं और करते रहेंगे। आपको उसी के हिसाब से खुद को और अपने प्रोडक्ट को डेवलप करते रहना होगा। तभी आप मार्केट में सर्वाइव कर पाएंगे।

डेवलप योरसेल्फञ्चइंडस्ट्री नीड

हमें इंडस्ट्री की नीड को समझना होगा। भारतीय कंज्यूमर बहुत डिमांडिग है। वह कम से कम पैसे में बेस्ट प्रोडक्ट चाहता है। यह हमने देखा भी है। दुनिया के तमाम हिस्सों में ऐसे सक्सेसफुल लोग हैं, जिन्होंने ऐसा किया भी है। कम दाम में काफी उम्दा चीजें तैयार हुई हैं। हमें इसी दिशा में काम करना होगा। खासतौर पर आने वाली पीढ़ी को यह बात समझनी होगी कि किताबी बातें बहुत हुईं। आप दुनिया को जितना ज्यादा से ज्यादा समझेंगे, उतना ही ज्यादा आगे बढ़ेंगे। किताबें भी जरूरी हैं, लेकिन वे भी इसलिए कि आप कम समय में ही ज्यादा नॉलेज गेन कर सकें।

तगड़े कॉम्पिटिशन में आगे बढ़ें

मार्केट में जबरदस्त कॉम्पिटिशन है। अहम सवाल यह है कि हम नॉलेज को प्रोडक्ट और सर्विसेज में कैसे बदलें? हम इसमें ब्रिज का काम कर सकते हैं। हमें बैरियर और बाउंड्रीज ब्रेक करनी चाहिए। इनोवेशन और एंटरप्रेन्योरशिप किसी आइसोलेटेड माहौल में डेवलप नहीं हो पाती हैं। इसके लिए एकेडमिया, वेंचर कैपिटल, वेंडर्स और ह्यूमन रिसोर्सेज की भी जरूरत होती है। इसके लिए गवर्नमेंट के ग्रांट और सब्सिडी की भी जरूरत पड़ती है।

शुरुआती रिस्क और लाइफ सेक्योर

स्टूडेंट्स को रिस्क लेना सिखाना चाहिए, लेकिन इसमें जल्दबाजी ठीक नहीं, क्योंकि कम उम्र में फेल होना ठीक है, लेकिन ज्यादा उम्र में फेल होने के बाद कोई रास्ता नहीं बचा रह जाता। इसलिए कम उम्र में ही जितना रिस्क ले सकते हैं, ले लें। जितना संघर्ष कर सकते हैं, कर लें। बार-बार नाकाम होने से भी तो आपको रास्ता तय करना और आगे बढऩा आ जाएगा। आगे की ज्यादा बड़ी मुश्किलें झेलने के लिए आप बेहतर तरीके से तैयार हो सकेेंगे।

दूसरों को नहीं, खुद को देखें

रिस्क भी ले लिया, मंजिल की ओर चलना भी शुरू कर दिया, लेकिन पता चला कि आप रास्ते में कई बार गिरे, कई बार उठे। तब तक आपके साथ चलने वाले आपसे कहीं ज्यादा आगे निकल गए। तब बहुत निराशा होती है। खुद पर से भरोसा कम होने लगता है। आगे बढऩा मुश्किल हो जाता है। उस वक्त आपको सबसे ज्यादा धैर्य की जरूरत है। यह बात हमेशा देखनी होगी कि आपकी कैपेसिटी क्या है, आपकी परिस्थितियां कैसी हैं और आपने ऐसी क्या गलतियां कीं कि आप रास्ते में ही रह गए? इसके बाद फिर एक नए भरोसे के साथ आगे बढ़ें।

धैर्य के साथ बढ़ें आगे

आपको इस दौरान बीते वक्त के साथ खुद को अपडेट भी करना होगा। हो सकता है आपकी स्पीड कम हो जाए या फिर आप खुद को जमाने के हिसाब से ढाल न पाएं हों और इसीलिए बार-बार नाकाम हो रहे हों। इसलिए अपनी डिलीवरी की स्पीड बढ़ाएं, तभी आप वह सब कुछ कर पाएंगे जिसे करने का आपने सपना देखा है।

प्रोफाइल

-बीटेक, आइआइटी दिल्ली

-फॉर्मास्युटिकल में 20 साल से ज्यादा का एक्सपीरियंस

-केमिकल्स, बॉयोटेक्नोलॉजी में स्पेशिएलिटी -पूर्व चेयरमैन, आइआइटी, कानपुर

-पूर्व चेयरमैन, सीआइआइ (कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री)

-नॉन-एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर, टीवी 18 इंडिया लिमिटेड

-चेयरमैन ऐंड मैनेजिंग डायरेक्टर, जुबिलैंट बॉयोसिस लिमिटेड

-नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, श्रीराम पिस्टन्स ऐंड रिंग्स लिमिटेड

-पूर्व डायरेक्टर, वैम होल्डिंग्स लिमिटेड फाउंडर, को-चेयरमैन ऐंड मेंबर ऑफ रेम्यूनरेशन कमेटी, जुबिलैंट फूडवक्र्स लिमिटेड -नॉन-एग्जीक्यूटिव इंडिपेंडेंट डायरेक्टर, मेंबर ऑफ ऑडिट कमेटी और मेंबर ऑफ रिम्यूनरेशन कमेटी

इंटरैक्शन: मिथिलेश श्रीवास्तव

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