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एक युग का अंत या माओवादियों को सबसे बड़ा झटका? चार दशकों तक आतंक का पर्याय रहे असीम मंडल की खामोश गिरफ्तारी की कहानी

By Sudhir PandeyEdited By: Sanjeev Kumar
Published: Thu, 17 Sep 2026 12:28 PM (GMT+05:30)Updated: Fri, 16 Oct 2026 12:22 AM (GMT+05:30)

कोलकाता एसटीएफ ने झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा पर सक्रिय एक करोड़ के इनामी माओवादी नेता असीम मंडल को पूर्व मेदिनीपुर से गिरफ्तार किया है।

चार दशकों से माओवादी गतिविधियों में शामिल मंडल की गिरफ्तारी को नक्सल विरोधी अभियानों में एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।

चार दशकों से माओवादी गतिविधियों में शामिल मंडल की गिरफ्तारी को नक्सल विरोधी अभियानों में एक बड़ी सफलता माना जा रहा है।

HighLights

  1. एक करोड़ के इनामी माओवादी असीम मंडल को एसटीएफ ने दबोचा।

  2. चार दशकों से झारखंड-बंगाल सीमा पर सक्रिय था शीर्ष माओवादी नेता।

  3. नक्सल विरोधी अभियानों में सुरक्षा बलों को मिली बड़ी सफलता।

जासं, चाईबासा। झारखंड और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में करीब चार दशकों से माओवादी गतिविधियों का संचालन कर रहे भाकपा (माओवादी) के शीर्ष नेता असीम मंडल उर्फ आकाश उर्फ तिमिर उर्फ मनोज को कोलकाता पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) ने गिरफ्तार कर लिया है। 
 
असीम मंडल पर राज्य सरकार और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, उसकी गिरफ्तारी पूर्व मेदिनीपुर जिले के पोटाशपुर इलाके से हुई है। 
 
कार्रवाई के दौरान उसके पास से दो बैग बरामद किए गए हैं, जिनमें माओवादी साहित्य, प्रचार पुस्तिकाएं और कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरण मौजूद थे।
 
पश्चिम मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोना थाना अंतर्गत फुलचक गांव का निवासी 64 वर्षीय असीम मंडल अपने छात्र जीवन के दौरान ही कट्टर वामपंथी विचारधारा के संपर्क में आया था। 
 
इसके बाद वह पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) में शामिल हो गया। उसने पश्चिम बंगाल के सारेंगा व गोआलतोड़ तथा पड़ोसी राज्य झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के गुराबंदा क्षेत्र में संगठन की जड़ों को मजबूत करने के लिए लंबे समय तक काम किया। 
 
21 सितंबर 2004 को भाकपा (माओवादी) के औपचारिक गठन के बाद असीम मंडल पुनः जंगलमहल क्षेत्र में लौट आया और स्थानीय आंदोलनों को हिंसक मोड़ देने में सक्रिय भूमिका निभाई। 
 
मशहूर लालगढ़ आंदोलन में भी उसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्ष 2010 में संगठन ने उसे पश्चिम बंगाल स्टेट कमेटी के सचिव पद का दायित्व सौंपा।
 
इसके अतिरिक्त वह बंगाल-झारखंड-ओडिशा (BJO) क्षेत्रीय कमेटी में भी अहम पदों पर बना रहा।
 
वर्ष 2011 में शीर्ष माओवादी नेता किशनजी के मारे जाने के बाद असीम मंडल जंगलमहल से हटकर झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम स्थित सारंडा के घने जंगलों में चला गया और वहीं से अपनी गतिविधियां संचालित करने लगा। 
 
हालांकि, हाल के दिनों में संगठन के कई बड़े कैडरों के आत्मसमर्पण के बाद वह सुरक्षा बलों की निरंतर रडार पर था। इसी वर्ष अगस्त माह में आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों ने पूछताछ में खुलासा किया था कि असीम मंडल मुख्यधारा में लौटने को तैयार नहीं है और स्थितियां अनुकूल होने पर दोबारा जंगलमहल में पैर जमाने की फिराक में है।
 
बढ़ती उम्र और गिरते स्वास्थ्य के कारण असीम मंडल ने 13-14 अगस्त के आसपास जंगल में अपना एके-47 राइफल और कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज छोड़ दिए थे और कार के जरिए सुरक्षित ठिकाने की ओर निकल गया था। 
 
माना जा रहा है कि उसका अंगरक्षक मंगल और पत्नी मालती अब भी जंगलों में ही छिपे हुए हैं। पुलिस की जांच में सामने आया है कि गिरफ्तारी से पहले उसके पास करीब डेढ़ लाख रुपये नकद थे। 
 
वह अपने परिचितों और रिश्तेदारों के ठिकानों पर भेष बदलकर शरण ले रहा था। अंततः जब वह अपनी आगे की यात्रा के खर्च के लिए एक परिचित से पैसे लेने पोटाशपुर पहुंचा, तब पहले से मुस्तैद कोलकाता एसटीएफ ने उसे धर दबोचा।
 
गौरतलब है कि असीम मंडल की पत्नी भी पूर्व मेदिनीपुर के पोटाशपुर की ही रहने वाली है और माओवादी कैडर के रूप में सक्रिय रही है। उसे वर्ष 2010 में ही एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है। 
 
वह वर्तमान में जेल में बंद है। असीम मंडल की गिरफ्तारी को नक्सल विरोधी अभियानों के इतिहास में सुरक्षा बलों की एक बड़ी और निर्णायक सफलता माना जा रहा है।

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