मिट्टी से बने गढ़ में छिपा गौरवशाली इतिहास, पोड़ाहाट वंश के जीत की है निशानी; 1857 की क्रांति से बदला स्वरूप
पश्चिमी सिंहभूम का जैंतगढ़ गांव कभी पोड़ाहाट राजवंश का महत्वपूर्ण सामरिक गढ़ था, जिसे काला अर्जुन सिंह ने केओंझर पर ...और पढ़ें
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जैतगढ़। फोटो
HighLights
पोड़ाहाट राजवंश का सामरिक महत्व वाला प्राचीन गढ़।
काला अर्जुन सिंह ने केओंझर विजय पर बनवाया था किला।
जैंतगढ़ का इतिहास 1857 के बाद काफी बदल गया।
संवाद सूत्र, जैंतगढ़। पश्चिमी सिंहभूम जिले के जगन्नाथपुर प्रखंड का जैंतगढ़ आज भले ही एक सामान्य गांव के रूप में नजर आता है, लेकिन कभी यहां पोड़ाहाट राजवंश की सीमा की निगरानी होती थी।
स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार जैंतगढ़ का इतिहास पोड़ाहाट के सिंह राजवंश से जुड़ा रहा है। केओंझर के चमकपुर क्षेत्र में विजय की स्मृति में काला अर्जुन सिंह द्वारा यहां मिट्टी का गढ़ बनाए जाने की परंपरा मिलती है। इसी गढ़ से इस स्थान का नाम जैंतगढ़ पड़ा, ऐसी मान्यता है।
काला अर्जुन सिंह ने बनवाया था मिट्टी का गढ़
बंगाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर (सिंहभूम, सरायकेला एवं खरसावां, 1910) समेत उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों में जैंतगढ़ की स्थापना की परंपरा काला अर्जुन सिंह से जोड़ी गई है।
उन्हें छत्रपति सिंह का पुत्र बताया गया है। युवावस्था में काला अर्जुन सिंह ने पोड़ाहाट के पश्चिम और दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाया।
ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार उन्होंने वर्तमान ओडिशा के केओंझर क्षेत्र स्थित चमकपुर पर विजय हासिल की थी। इस विजय की स्मृति में उन्होंने जैंतगढ़ में मिट्टी का एक गढ़ बनवाया। इसी विजय और गढ़ से जुड़े नामकरण की परंपरा के कारण आगे चलकर यह स्थान जैंतगढ़ कहलाया।
पोड़ाहाट की दक्षिणी सीमा पर था सामरिक महत्व
पोड़ाहाट के सिंह शासकों का सिंहभूम के बड़े हिस्से पर प्रभाव रहा था। ऐसे में दक्षिणी सीमा पर स्थित जैंतगढ़ का महत्व केवल एक बस्ती के तौर पर नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी रहा होगा।
गढ़ के माध्यम से आसपास के क्षेत्र पर नजर रखने और सीमा की सुरक्षा में मदद मिलती थी। बाद के दौर में सिंह शासकों का प्रभाव क्षेत्र के अन्य हिस्सों में भी बढ़ा।
जगन्नाथ सिंह से जुड़ी परंपराओं में जगन्नाथपुर के बसने का उल्लेख मिलता है। इस तरह जैंतगढ़ और जगन्नाथपुर क्षेत्र पोड़ाहाट राजवंश के विस्तार और गतिविधियों से जुड़ी ऐतिहासिक कड़ियां सामने रखते हैं।
सिंह राजवंश की वंश परंपराओं में भी उल्लेख
जैंतगढ़ को लेकर सिंह राजवंश की पारंपरिक वंशावलियों में भी कई कथाएं मिलती हैं। कुछ परंपराओं में सुजान सिंह के जैंतगढ़ आकर बसने का उल्लेख है। मान्यता है कि पुरी स्थित भगवान जगन्नाथ मंदिर की यात्रा के दौरान वे सिंहभूम क्षेत्र में आए और यहीं बस गए।
सिंह राजवंश की पारंपरिक वंशावलियां अपने वंश को राठौर-कदंबवंशी राजपूत मूल से जोड़ती हैं। हालांकि इन वंश परंपराओं के कई विवरण लोककथाओं और पारंपरिक स्रोतों पर आधारित हैं। इसलिए इनके ऐतिहासिक पक्ष को उपलब्ध अभिलेखीय साक्ष्यों के साथ देखना जरूरी है।
पाउड़ी देवी की परंपरा से भी जुड़ा है जैंतगढ़
जैंतगढ़ की पहचान सिर्फ पुराने गढ़ तक सीमित नहीं है। यहां पाउड़ी देवी की पूजा की पुरानी परंपरा भी रही है। 20वीं सदी के प्रारंभिक ऐतिहासिक विवरणों में जगन्नाथपुर और जैंतगढ़ में पाउड़ी देवी से जुड़े धार्मिक स्थलों का उल्लेख मिलता है।
पाउड़ी देवी की परंपरा का संबंध भुइयां समुदाय से माना जाता है। क्षेत्र के इतिहास में सिंह शासकों और भुइयां समुदाय के बीच सामाजिक एवं ऐतिहासिक संबंधों का भी उल्लेख मिलता है। इससे जैंतगढ़ की विरासत में राजसत्ता के साथ स्थानीय जनजातीय-सांस्कृतिक परंपराओं की भी झलक मिलती है।
ब्रिटिश शासन में बदला क्षेत्र का स्वरूप
सन् 1857 के विद्रोह के दौरान पोड़ाहाट रियासत के ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में शामिल होने के बाद अंग्रेजी सरकार ने रियासत को जब्त कर लिया। बाद में उसके कुछ हिस्से वापस किए गए, जबकि कई इलाकों की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव हुआ।
समय के साथ जैंतगढ़ का सामरिक महत्व कम होता गया और यह स्थानीय व्यापारिक एवं प्रशासनिक बस्ती के रूप में विकसित हुआ। आज जैंतगढ़ जगन्नाथपुर से करीब 18 किलोमीटर और चाईबासा से लगभग 60 किलोमीटर दूर है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी करीब 3,432 थी।
स्वतंत्र रियासत नहीं, पोड़ाहाट का महत्वपूर्ण गढ़
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों और स्थानीय परंपराओं को देखें तो जैंतगढ़ को स्वतंत्र बड़ी रियासत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसकी पहचान पोड़ाहाट सिंह राजवंश की दक्षिणी सीमा पर स्थित महत्वपूर्ण गढ़ और बस्ती के रूप में अधिक सामने आती है।
यहां का इतिहास पोड़ाहाट राजवंश के साथ भुइयां और हो समुदायों की परंपराओं, क्षेत्रीय विस्तार तथा स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा रहा है। यही विविधता जैंतगढ़ को पश्चिमी सिंहभूम के इतिहास में एक अलग पहचान देती है।
गढ़ के अवशेषों का हो पुरातात्विक सर्वेक्षण
जैंतगढ़ के इतिहास को प्रमाणिक रूप से सामने लाने के लिए पुराने गढ़ के अवशेषों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण जरूरी है। स्थानीय स्तर पर मौजूद ऐतिहासिक स्मृतियों, लोककथाओं और धार्मिक परंपराओं का भी दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।
यदि पुरातात्विक सर्वेक्षण के माध्यम से गढ़ की उम्र, संरचना और उससे जुड़े अवशेषों की पुष्टि होती है, तो जैंतगढ़ के इतिहास को नई मजबूती मिल सकती है। इससे यह स्थान पश्चिमी सिंहभूम की ऐतिहासिक विरासत और पर्यटन के मानचित्र पर भी महत्वपूर्ण स्थान हासिल कर सकता है।
