नाम बदला पर नहीं बदले हालात:'ट्रेनमैनेजर' बने रेलवे गार्ड आज भी अंग्रेजों के जमाने की बोगी में ड्यूटी करने को मजबूर
मालगाड़ियों के गार्ड, जिन्हें अब ट्रेन मैनेजर कहा जाता है, आज भी अंग्रेजों के जमाने की सुविधाओं में काम करने ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
ट्रेन मैनेजरों को बिना शौचालय वाली बोगी में करना पड़ता है सफर।
कड़ाके की ठंड, भीषण गर्मी में लोहे के केबिन में ड्यूटी।
निर्जन स्थानों पर सुरक्षा का अभाव, लूटपाट और हमले का खतरा।
जागरण संवाददाता, चक्रधरपुर। कहने को तो रेलवे में नौकरी चकाचक है और वेतन भी शानदार मिलता है, लेकिन भारतीय रेलवे की रीढ़ माने जाने वाली मालगाड़ियों (गुड्स ट्रेन) के गार्ड आज भी अंग्रेजों के जमाने से कायम विकट परिस्थितियों में ड्यूटी करने को मजबूर हैं।
हाल ही में रेलवे ने इनका नाम बदलकर ट्रेन मैनेजर तो कर दिया, लेकिन उनके कार्यक्षेत्र की जमीनी हकीकत आज भी रूह कंपा देने वाली है।
रेलवे के नीति निर्माताओं ने ट्रेन ड्राइवरों (पायलटों) से लेकर यात्रियों तक की सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े कदम उठाए, लेकिन मालगाड़ी के गार्ड्स की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
लोहे का कटघरा: न शौचालय, न मौसम से बचाव
मालगाड़ी का गार्ड जिस बोगी (ब्रेकवैन) में सफर करता है, वह महज लोहे का एक कटघरा बनकर रह गई है। इस बोगी की सबसे बड़ीविडंबनाएं निम्नलिखित हैं:
- शौचालय का न होना: पूरी ट्रेन के संचालन की जिम्मेदारी संभालने वाले ट्रेन मैनेजर के लिए बोगी में एक बेसिक शौचालय तक की व्यवस्था नहीं है।
- मौसम का कहर: कड़ाके की ठंड की रातें हों या जून की झुलसाने वाली गर्मी की दोपहरी, लोहे का यह केबिन मौसम की मार को कई गुना बढ़ा देता है। लू के थपेड़ों और धूल भरी हवाओं के बीच गार्ड्स को घंटों सफर करना पड़ता है।
जिम्मेदारियां अनेक, पर सुरक्षा के नाम पर शून्य
एक ट्रेन मैनेजर के जिम्मे सिर्फ सफर करना नहीं, बल्कि दर्जनों महत्वपूर्ण काम होते हैं। उन्हें हर स्टेशन पर सिग्नल देखना और दिखाना पड़ता है, पटरी या ट्रेन में किसी भी खराबी की तुरंत सूचना देनी होती है।
रूटीन रजिस्टर मेंटेन करना पड़ता है। आपातकालीन स्थिति में कपलिंग जोड़ने से लेकर तकनीकी खराबी को ठीक करने में भी वे मदद करते हैं।
इस कठिन ड्यूटी के बीच सबसे बड़ा संकट सुरक्षा का है।
मालगाड़ी का परिचालन अक्सर अनिश्चित होता है। कई बार ट्रेनें निर्जन और सुनसान जंगलों या आउटर सिग्नल पर घंटों खड़ी रहती हैं। ऐसे में अकेले बैठे गार्ड पर आपराधिक तत्वों द्वारा हमला, लूटपाट और मालगाड़ी से चोरी की घटनाएं आम बात हैं।
प्रबंधन के अपने तर्क, पर मानवता की गुहार जारी
इस गंभीर समस्या पर रेलवे प्रबंधन और गार्ड्स के अपने-अपने तर्क हैं। एक तरफ जहां एसोसिएशन लगातार बेहतर गार्ड बोगी, शौचालय, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रबंधन उनकी ड्यूटी की अति महत्वपूर्ण प्रकृति की दुहाई देकर पल्ला झाड़ लेता है।
आजाद भारत में जहां एक तरफ रेलवे बुलेट ट्रेन और वंदे भारत जैसी आधुनिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मालगाड़ी का ट्रेन मैनेजर मानवता और इंसानियत के नाते सिर्फ काम करने के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक माहौल की मांग कर रहा है।
