1925 में चाईबासा पहुंचे थे बापू, 'हो' भाषा में गूंजा था खादी का संदेश, सभा में 400 लोगों ने एक साथ चलाया था चरखा
महात्मा गांधी का 1925 में चाईबासा आगमन कोल्हान में राष्ट्रीय चेतना, स्वदेशी और खादी को नई ऊर्जा देने वाली ऐतिहासिक ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर। (AI Generated Image)
HighLights
गांधीजी का 1925 में चाईबासा आगमन ऐतिहासिक घटना थी।
राष्ट्रीय चेतना और खादी का संदेश 'हो' भाषा में फैलाया गया।
मो. तकी, चाईबासा। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का वर्ष 1925 में चाईबासा आगमन कोल्हान के इतिहास की स्वर्णिम घटनाओं में दर्ज है। यह यात्रा केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं थी।
बल्कि इसने आदिवासी बहुल कोल्हान क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना, स्वदेशी, खादी और ग्राम स्वावलंबन के विचारों को नई ऊर्जा दी। सितंबर 1925 में जब बापू चाईबासा पहुंचे, तो स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश इस क्षेत्र के कोने-कोने तक पहुंच गया।
स्थानीय युवाओं ने बनाई थी आंदोलन की पृष्ठभूमि
महिला कॉलेज चाईबासा के इतिहास विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. ललिता सुंडी के अनुसार, गांधीजी के आगमन से पहले ही चाईबासा में राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी।
चाईबासा जिला स्कूल के आसपास आयोजित सभाओं में युवाओं ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी।
जमुना कनौजिया और राम लगन राम जैसे स्थानीय कार्यकर्ताओं के प्रयासों से कांग्रेस और असहयोग आंदोलन के विचार शहर की सीमाओं को लांघकर सुदूर ग्रामीण इलाकों तक पहुंचने लगे थे।
'हो' भाषा में दिया गया गांधीजी के विचारों का संदेश
गांधीजी के आगमन की खबर मिलते ही शहर और आसपास के गांवों से हजारों की संख्या में ग्रामीण और विद्यार्थी उनके दर्शन के लिए उमड़ पड़े।
बापू के विचारों और स्वराज के संदेश को स्थानीय 'हो' भाषा में अनुवाद करके लोगों को समझाया गया, ताकि आदिवासी समाज आंदोलन की भावना को सहजता से समझ सके।
सभा में 400 चरखों की गूंज और सामूहिक भजन
स्थानीय भाषा और संस्कृति से जुड़ने के कारण राष्ट्रीय आंदोलन का संदेश हर नागरिक के दिल में उतर गया। गांधीजी के चाईबासा प्रवास की सबसे खास और अद्भुत स्मृति सामूहिक चरखा कताई से जुड़ी है।
ऐतिहासिक संस्मरणों के अनुसार, उनकी मुख्य सभा में करीब 400 लोग एक साथ चरखा चला रहे थे और वातावरण में सामूहिक भजनों की गूंज थी।
गांधीजी ने जनसभा को संबोधित करते हुए खादी, स्वदेशी और ग्राम स्वावलंबन पर जोर दिया। उनके लिए स्वदेशी का अर्थ केवल विदेशी सामान का बहिष्कार नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कुटीर उद्योगों को आत्मनिर्भर बनाना था।
गौशाला में बांस की चटाई पर बिताया समय
बापू की सादगी का एक अनोखा प्रसंग चाईबासा स्थित स्थानीय गौशाला से भी जुड़ा है। आयोजन समिति ने उनके ठहरने और विश्राम के लिए आरामदायक व्यवस्था करने का प्रयास किया था।
लेकिन बापू ने किसी भी आडंबर को खारिज करते हुए बेहद सादगीपूर्ण व्यवस्था को चुना। वे बांस की चटाई पर जमीन पर बैठे और आम जनमानस के बीच समय बिताया।
लगभग एक सदी बीत जाने के बाद भी महात्मा गांधी का चाईबासा आगमन कोल्हान की जनस्मृति और इतिहास में अत्यंत गर्व के साथ याद किया जाता है।
