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अस्तित्व की लड़ाई या विदेशी प्रोपेगैंडा? दिल्ली में होने वाले 'जनजाति समागम' को लेकर चाईबासा में छिड़ा राजनीतिक संग्राम

Published: Sat, 23 May 2026 11:28 PM (IST)

दिल्ली में होने वाले 'जनजाति सांस्कृतिक समागम' को लेकर चाईबासा में विरोध और समर्थन की राजनीति चरम पर है। आदिवासी ...और पढ़ें

चाईबासा शहर में विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में एक व्यापक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया।

चाईबासा शहर में विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में एक व्यापक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया।

HighLights

  1. आदिवासी संगठन पहचान कमजोर करने का आरोप लगा रहे हैं।

  2. आयोजकों ने विरोध को विदेशी फंडिंग से प्रेरित बताया।

जागरण संवाददाता, चाईबासा। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के ऐतिहासिक अवसर पर 24 मई को दिल्ली के लाल किले में आयोजित होने वाले जनजाति सांस्कृतिक समागम को लेकर कोल्हान प्रमंडल में विरोध और समर्थन की राजनीति चरम पर पहुंच गई है।
 
एक तरफ जहां विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों ने चाईबासा में इस कार्यक्रम के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए सामाजिक बहिष्कार सह विरोध प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी तरफ कार्यक्रम के आयोजक 'जनजाति सुरक्षा मंच' ने इस विरोध को विदेशी फंडिंग और ईसाई मिशनरियों से प्रेरित बताया है।
 

आदिवासी संगठनों का आरोप: मूल पहचान को कमजोर करने की साजिश 

शनिवार को चाईबासा शहर में विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में एक व्यापक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट आरोप है कि जनजाति सांस्कृतिक समागम के जरिए आदिवासी समाज की मूल पहचान, विशिष्ट संस्कृति और विचारधारा को कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है। 

  •     संघ परिवार पर निशाना: प्रदर्शन के संयोजक रमेश जेराई ने कहा कि इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) परिवार से जुड़े संगठन जनजाति सुरक्षा मंच के बैनर तले हो रहा है। संघ परिवार आदिवासियों को उनकी मूल पहचान से दूर करने के लिए वनवासी या जनजाति कहकर संबोधित करता है और सरना व सनातन को एक बताने की कोशिश में जुटा है।
  •     वोट बैंक की राजनीति: सामाजिक कार्यकर्ता साधु हो ने आरोप लगाया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जल, जंगल और जमीन जैसे आदिवासियों के मूल मुद्दों पर चुप रहती है, लेकिन धर्म और जाति की राजनीति कर वोट बैंक चमकाने में लगी है। उन्होंने कहा कि देश के भोले-भाले आदिवासियों को दिल्ली ले जाकर भविष्य के चुनावों को प्रभावित करने का ताना-बाना बुना जा रहा है। 
प्रदर्शनकारियों ने समाज के भीतर पैदा हो रहे इस विवाद को आदिवासी अस्तित्व से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कोल्हान समेत देशभर के आदिवासी समुदायों से दिल्ली के कार्यक्रम का पूर्ण बहिष्कार करने की अपील की।
 

जनजाति सुरक्षा मंच का पलटवार

इधर, विरोध प्रदर्शन पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जनजाति सुरक्षा मंच के कोल्हान प्रभारी सुरा बिरुली ने इसे राष्ट्रविरोधी और समाजविरोधी करार दिया है। सुरा बिरुली ने दावा किया क‍ि यह विरोध पूरी तरह से ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रायोजित संगठनों और विदेशी फंडिंग के दबाव में किया जा रहा है। 
 
उन्‍होंने कहा क‍ि विरोध करने वाले संगठन निजी स्वार्थ के लिए समाज को बांट रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रदर्शन में 122 संगठनों के शामिल होने का दावा किया गया, जबकि जमीन पर केवल 22 लोग ही मौजूद थे। 
 

क्या है दिल्ली का जनजाति सांस्कृतिक समागम?

मंच के पदाधिकारियों के अनुसार, 24 मई को लाल किले पर होने वाला यह आयोजन राष्ट्रीय स्तर का एक भव्य सांस्कृतिक महोत्सव है। इसमें देशभर की 500 से अधिक जनजातियों के लगभग डेढ़ लाख लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा, लोक नृत्य और अनूठी संस्कृति के साथ शामिल हो रहे हैं। 
 
यह आयोजन जनजातीय अस्मिता, गौरव और देश की सांस्कृतिक एकता का अनूठा प्रतीक है। सुरा बिरुली ने सभी से 24 मई को दिल्ली पहुंचकर इस कार्यक्रम को ऐतिहासिक रूप से सफल बनाने का आह्वान किया।
 

प्रदर्शन में ये रहे मुख्य रूप से उपस्थित 

चाईबासा में आयोजित विरोध प्रदर्शन में मुख्य रूप से रमेश जेराई, साधु हो, प्रकाश पुरती, गणेश पाट पिंगुवा, हिरामनी देवगम, सागर सिंकु, बिष्णु मिंज, दमयंती सिंकु, यदुनाथ तियु, चंद्रमोहन बिरूवा, बामिया बारी, सनी संदीप देवगम, रेयांश सामाड, उदय सिंह बारी और नीतु देवगम सहित कई आदिवासी सामाजिक संगठनों के प्रमुख पदाधिकारी व सदस्य उपस्थित थे।