सुधीर पांडेय, चाईबासा : कोल्हान का पश्चिमी सिंहभूम जिला झारखंड के स्थापना काल से लेकर आज तक औद्योगिक पार्क के लिए तरस रहा है। वर्ष 2000 में जब झारखंड अलग राज्य बना तो तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने अपने विजन दस्तावेज में सभी जिलों में 100 से 500 एकड़ में एक-एक औद्योगिक पार्क बनाने की बात कही थी। आज 19 साल हो चुके हैं मगर चाईबासा इलाके में औद्योगिक पार्क की स्थापना नहीं हो पायी है। चाईबासा का व्यवसायी वर्ग हर स्तर पर विधानसभा के इस सबसे बड़े मुद्दे को उठा चुका है मगर नतीजा शून्य रहा है। जमीन नहीं मिलने की वजह से व्यवसायी मजबूरी में दूसरे जिलों में निवेश कर रहे हैं। चाईबासा के कई बड़े उद्योगपतियों को पड़ोसी जिले सरायकेला और पूर्वी सिंहभूम में प्लांट बैठाना पड़ा है। चाईबासा के एक व्यवसायी ने तो झारखंड की बजाये बिहार में इंडस्ट्री बैठा दी है। चाईबासा चेंबर आफ कामर्स के वर्तमान अध्यक्ष नितिन प्रकाश कहते हैं कि वो चाईबासा में बेसन प्लांट लगाना चाहते थे। काफी कोशिशों के बाद भी जब इस इलाके में जमीन नहीं मिली तो 70 किलोमीटर दूर आदित्यपुर में कारखाना बैठाना पड़ा। प्लांट यहां लगता तो न सिर्फ स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता बल्कि यह विधानसभा आर्थिक रूप से भी मजबूत होती। औद्योगिक पार्क नहीं बनने के कारण चाईबासा का मध्यम एवं लघु उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जमीन की समस्या के कारण ही लौह अयस्क के बड़े कारोबारियों ने भी चाईबासा की बजाय पड़ोसी जिले सरायकेला-खरसावां में अपने प्लांट बैठाये हैं। ये प्लांट अगर चाईबासा में लगते तो प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से 10 हजार से ज्यादा स्थानीय लोग रोजगार से जुड़ते।

बड़े उद्योग जो दूसरे जिले में लगाने को मजबूर हुए व्यवसायी

- रुंगटा समूह ने सरायकेला जिला के चलियामा में बैठाया स्पंज प्लांट

- उद्योगपति राजकुमार शाह ने पोटका में लगाया अपना स्पंज प्लांट

- व्यवसायी नितिन प्रकाश ने आदित्पपुर में लगाया अपना बेसन प्लांट

- मनोज पटेल ने बिहार में शिफ्ट की अपनी राइस मिल

- राजीव अग्रवाल ने सरायकेला जिला में बैठायी राइस मिल

- लाइफ लाइन वाटर प्लांट राजनगर में लगाना पड़ा

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10 साल में भी घरों में नहीं पहुंचा सरकारी पानी

चाईबासा शहरी जलापूर्ति योजना को पूरा होने का छह साल से जनता कर रही है इंतजार। पिछले विधानसभा, लोक सभा और नगर निकाय चुनाव में भी पेयजल की समस्या चुनावी मुद्दा था लेकिन इसका अब निदान नहीं हो सका। वर्ष 2013 में शहरवासियों को पेयजल की समस्या से राहत दिलाने के लिए नई शहरी जलापूर्ति योजना को स्वीकृति दी गयी थी। छह साल बाद भी यह योजना पूरी नहीं हो सकी है। इस बार के विधानसभा चुनाव में भी यह चुनावी मुद्दा बनेगा। चाईबासा विधानसभा अंतर्गत आने वाले करीब 50 हजार शहरी मतदाता प्रत्याशियों से शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की मांग करेंगे। अभी करीब 57 साल पुरानी शहरी जलापूर्ति योजना से ही शहर के 60 हजार लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जा रहा है।

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चाईबासा में नहीं लग पाया कचड़ा निस्तारण प्लांट

चाईबासा के लोगों को सरकारें गंदगी से निजात दिलाने में अभी तक कामयाब नहीं हो पायी हैं। नगर विकास ने 3 साल पहले ठोस कचड़ा प्रबंधन के तहत प्लांट बैठाने की जमीन के लिए नगर प्रशासन को 5 करोड़ रुपए दिए थे, लेकिन आज तक जमीन उपलब्ध नहीं हो सकी। हालांकि, पीपीपी मोड पर कचरा संग्रहण, ट्रांसपोर्टेशन, प्रोसेसिग व डिप्लोजल के लिए एक साल पहले दिल्ली की एक एजेंसी पायोनियर को जिम्मा दिया है। लेकिन प्लांट के लिए जमीन नहीं मिलने के कारण आज भी कूड़ा मुक्तिधाम के पास डंप किया जा रहा है।

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कागजों में ही सिमट कर रह गयी रिग रोड की योजना

चाईबासा में राष्ट्रीय उच्च पथ संख्या 75 पर लगने वाले जाम से जनता आज भी जूझ रही है। चाईबासा-हाटगम्हरिया मुख्य मार्ग पर सड़क के दोनों ओर ट्रकों का जाम दिन भर लगा रहता है। इससे आवागमन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। जाम की समस्या को दूर करने के लिए करीब 5 साल पहले चाईबासा में रिग रोड बनाने का डीपीआर तैयार हुआ था। योजना थी कि बड़े वाहनों को सिंहपोखरिया से पहले ही एक सड़क असुरा-कोकचो-डोंकासाई होते हुए टाटा बाइपास तक निकाली जायेगी। यह योजना अभी तक फाइलों में लटकी है। रिग रोड नहीं बनने से चाईबासा से हाटगम्हरिया तक ट्रकों की लंबी कतार दोनों ओर लगी रहती है और एनएच जाम रहता है।

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क्या कहती है जनता

चाईबासा में 400 से ज्यादा बड़े, मध्यम व छोटे व्यवसायी हैं। औद्योगिक पार्क नहीं बनने से व्यवसायी वर्ग अपने उद्योगों को विस्तार नहीं दे पा रहा है। जिन्हे अपने उद्योग को विस्तार देना है, वो दूसरे जिलों में पलायन कर रहे हैं। हम चाहते हैं जो भी नया विधायक बने वो इस गंभीर मुद्दे को विधानसभा में उठाये और सकारात्मक पहल करे।

फोटो-13-अनूप सुल्तानिया, चाईबासा

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जनप्रतिधियों और प्रशासनिक पदाधिकारियों की इच्छा शक्ति की कमी के कारण रिग रोड अभी तक नहीं बन पायी है। इससे व्यापार काफी प्रभावित हो रहा है। आधा समय माला भाड़ा ट्रक जाम में ही फंसे रहते हैं। चाईबासा में सड़क हादसे भी इन्हीं सब कारणों से बढ़ रहे हैं। रिग रोड की योजना को धरातल पर उतारने का काम तेजी से होना चाहिए।

फोटो-14-मनीष चौबे, चाईबासा।

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शहरी जलापूर्ति योजना का सिर्फ बजट बढ़ रहा है। छह साल में सभी घरों में पाइप तक नहीं पहुंच पाया है। योजना को पूरा करने का सिर्फ आश्वासन ही मिलता है। काम कुछ नहीं हो रहा। चाईबासा शहर के इस बड़े मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों को गंभीरता से विचार कर योजना को जल्द से जल्द पूरा कराने की कोशिश करनी चाहिए।

फोटो-1-

दिलीप शर्मा, चाईबासा

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चाईबासा में कचड़ा उठाव की कोई मुकम्मल व्यवस्था नहीं की गयी है। मुक्तिधाम और इसके आसपास कचड़े का पहाड़ बनता जा रहा है। इसके निस्तारण पर कुछ नहीं हो रहा। वार्डों में कचड़ा उठाव भी काफी समय से बंद है। सड़क किनारे लोग मजबूरन कचड़ा फेंक रहे हैं। कचड़े का उचित प्रबंधन कराने की दिशा में पहल होनी चाहिए।

फोटो-2-शरद कुमार, चाईबासा।

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