30 साल तक फाइलों में दबी रही शहादत की कहानी, 35वीं पुण्यतिथि पर घर पहुंचे BSF जवान तो भर आईं आंखें
बड़बिल के बीएसएफ जवान विश्वम्भर प्रधान, जो 1991 में सीमा की रक्षा करते हुए शहीद हुए थे, उनकी शहादत की ...और पढ़ें

1991 में सीमा की रक्षा करते हुए हुए थे बलिदान, बीएसएफ के जवानों ने घर पहुंचकर दी श्रद्धांजलि।
HighLights
बीएसएफ जवान विश्वम्भर प्रधान 1991 में हुए थे शहीद।
तीन दशक बाद सामने आई उनकी शहादत की कहानी।
बीएसएफ जवानों ने बड़बिल में परिवार को दी श्रद्धांजलि।
संवाद सूत्र, बड़बिल। ओडिशा के क्योंझर जिले के बड़बिल से एक बेहद भावुक कर देने वाली और सुप्त पड़ चुकी कहानी सामने आई है। जिस माटी ने करगिल युद्ध के वीर बलिदानी रतन प्रधान जैसे सपूत को जन्म दिया, उसी बड़बिल की धरती से तीन दशक (30 साल) पहले देश के लिए कुर्बान हुए एक और गुमनाम वीर की गाथा अब दुनिया के सामने आई है।
यह कहानी है सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जांबाज जवान विश्वम्भर प्रधान की, जिनकी शहादत की गूंज 35 साल तक उनके घर की चारदीवारी तक ही सीमित रह गई थी।
35 साल बाद घर पहुंचे BSF के जवान, नम हुईं आंखें
23 सितंबर 1991 को पंजाब के फिरोजपुर में देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए विश्वम्भर प्रधान वीरगति को प्राप्त हुए थे। वक्त का पहिया घूमता रहा, तारीखें बदलती रहीं, लेकिन इस वीर की शहादत का इतिहास फाइलों में ही दबा रहा।
बुधवार को उनकी 35वीं पुण्यतिथि पर वह पल आया जिसने पूरे इलाके को भावुक कर दिया। BSF की एक विशेष टीम, जिसमें एएसआई जीडी दिलीप कुमार मल्लिक, हेड कांस्टेबल रामधारी और सीनियर कांस्टेबल राजकमल सिंह शामिल थे। खास तौर पर बड़बिल के वार्ड संख्या 15 स्थित 'दामु हाटिंग' पहुंची।
जवानों ने बलिदानी की वृद्ध माता मिथिला प्रधान, उनके भाई प्रकाश प्रधान और परिवार के अन्य सदस्यों से मुलाकात कर उन्हें नमन किया और सम्मानित किया। इसके बाद बलिदानी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर जैसी आत्मीय श्रद्धांजलि दी गई।
क्यों दब गई थी शहादत की यह कहानी?
बलिदानी के भाई प्रकाश प्रधान ने उस दर्द को साझा करते हुए बताया कि, उस दौर में आज की तरह संचार और परिवहन की आधुनिक व्यवस्थाएं नहीं थीं। शहादत के बाद भाई का पार्थिव शरीर भी घर तक नहीं पहुंच पाया था।
संसाधनों की कमी और तकनीकी दूरियों के कारण यह दुखद खबर व्यापक स्तर पर सार्वजनिक नहीं हो सकी और धीरे-धीरे समय के आगोश में छुप गई। हालांकि, BSF के आधिकारिक दस्तावेजों में वे गर्व के साथ दर्ज हैं कांस्टेबल विश्वम्भर प्रधान, 137वीं बटालियन, शहादत की तिथि: 23 सितंबर 1991।
बलिदान कभी पुराना नहीं होता
इस अवसर पर बड़बिल के एसडीपीओ देवेंद्र नाथ पिंगुआ और भाजपा मंडल अध्यक्ष परिमल चटर्जी समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।एसडीपीओ देवेंद्र नाथ पिंगुआ ने इस मौके पर बेहद प्रेरणादायक बात कही।
उन्होंने कहा, बीएसएफ जवानों का बलिदानी के घर पहुंचना सिर्फ एक श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि यह उस परिवार के लंबे इंतजार और दर्द को सम्मान देने का प्रयास है। शहादत की तारीखें पुरानी हो सकती हैं, लेकिन देश के लिए दिया गया बलिदान कभी पुराना नहीं होता। तीन दशक बाद ही सही, लेकिन बड़बिल के इस भूले-बिसरे हीरो की कहानी अब हर देशवासी के दिल में गर्व की एक नई अलख जगा रही है।
