विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

सिमडेगा गुरुकुल में गूंजा 'मिच्छामि दुक्कडम्', श्रद्धालुओं ने कटुता मिटाकर लिया सद्भाव का संकल्प

Published: Sat, 19 Sep 2026 06:16 PM (IST)

आचार्य पद्मराज स्वामी जी महाराज के सिमडेगा गुरुकुल आगमन पर क्षमापना पर्व का आयोजन किया गया। इस दौरान श्रद्धालुओं ने ...और पढ़ें

क्षमा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का साधन है।

क्षमा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का साधन है।

HighLights

  1. क्षमापना पर्व पर 'मिच्छामि दुक्कडम्' का उच्चारण किया गया।

  2. श्रद्धालुओं ने सद्भाव और आत्मशुद्धि का संकल्प लिया।

जासं, सिमडेगा। पर्युषण महापर्व की आध्यात्मिक साधना एवं विशेष आराधना जमशेदपुर में सफलतापूर्वक संपन्न कर आचार्य पद्मराज स्वामी जी महाराज का सिमडेगा स्थित आचार्य पद्मराज ज्योतिष गुरुकुल में पदार्पण हुआ। 
 
गुरुकुल पहुंचने पर शिष्यों, आचार्यों और गुरुकुल परिवार के सदस्यों ने गुरुकुल सभागार में क्षमापना पर्व का विशेष आयोजन किया। कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने एक-दूसरे के प्रति सद्भाव को जीवन में उतारने का संकल्प लिया।
 

क्षमा आत्मशुद्धि का महान साधन: आचार्य पद्मराज स्वामी

सभागार में आचार्य पद्मराज स्वामी जी महाराज ने कहा कि क्षमा भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का साधन है। 
 
मनुष्य से जाने-अनजाने में वाणी, व्यवहार अथवा अहंकार के कारण भूलें हो जाती हैं, जिससे रिश्तों में दूरियां आ जाती हैं। ऐसी स्थिति में क्षमा मांगने और क्षमा करने का साहस ही संबंधों को पुनः मधुर बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है।
 
आचार्य ने कहा क‍ि क्षमा करने वाला व्यक्ति किसी अन्य पर उपकार नहीं करता, बल्कि अपने ही मन को क्रोध और अशांति के बोझ से मुक्त करता है।
 

क्षमा वीरस्य भूषणम् - चरित्र की असली शक्ति

'क्षमा वीरस्य भूषणम्' का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कमजोर व्यक्ति प्रायः प्रतिशोध का मार्ग चुनता है, लेकिन क्षमा करने के लिए उच्च आत्मबल, विवेक और उदार हृदय की आवश्यकता होती है। 
 
इसलिए क्षमा मनुष्य की कमजोरी नहीं, बल्कि उसके चरित्र की शक्ति का परिचायक है। उन्होंने भगवान महावीर की शिक्षाओं का स्मरण कराते हुए कहा कि जैन परंपरा में क्षमा केवल दूसरों को माफ करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी भूलों को स्वीकार कर आत्ममंथन करने की साधना है।
 
आचार्य ने आह्वान किया कि क्षमा की भावना को केवल एक दिन के धार्मिक पर्व तक सीमित न रखकर इसे दैनिक जीवन का संस्कार बनाया जाना चाहिए, ताकि परिवार में प्रेम और समाज में स्थायी शांति स्थापित हो सके।
 

भक्तिमय भजनों से गूंजा परिसर

कार्यक्रम में गुरुकुल के शिक्षक राहुल प्रसाद ने कहा कि क्षमापना पर्व अहंकार को त्यागकर संबंधों को प्राथमिकता देने की प्रेरणा देता है।
 
वहीं, महासाध्वी वसुंधरा जी महाराज की सद्प्रेरणा और मार्गदर्शन में इस आयोजन को विशेष भक्तिमय स्वरूप प्रदान किया गया। 
 
उनके द्वारा प्रस्तुत मधुर भजनों और प्रेरणादायी विचारों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया, जिससे संपूर्ण गुरुकुल परिसर मैत्री और आत्मशुद्धि के वातावरण से सराबोर हो गया।
 
कार्यक्रम के दौरान सभी श्रद्धालुओं ने अतीत के समस्त मन-मुटाव को भुलाकर "मिच्छामि दुक्कडम्" का उच्चारण करते हुए परस्पर क्षमा-याचना की। 
 
अंत में विशेष आरती एवं मंगल पाठ के उपरांत प्रसाद का वितरण किया गया। श्रद्धालुओं ने भगवान के जयकारों के साथ जीवन में क्षमा, प्रेम और सद्भाव को आत्मसात करने का संकल्प लिया।