घर में मां, मैदान में चैंपियन; सिमडेगा की जनसेवक ने 40 साल की उम्र में पावरलिफ्टिंग कर जीते 2 पदक
कोलेबिरा में जनसेवक और 9 साल की बेटी की मां सीमा इंदु सिंह ने 40 वर्ष की उम्र में पावरलिफ्टिंग में दो पदक जीते हैं।

सीमा इंदु सिंह। फोटो जागरण
आर्यन कुमार, कोलेबिरा। मां होना, नौकरी करना और परिवार की जिम्मेदारियां निभाना। खासकर तब, जब घर और बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी भी हो, लेकिन कोलेबिरा प्रखंड कार्यालय में जनसेवक के पद पर कार्यरत सीमा इंदु सिंह, 40 वर्षीय ने साबित कर दिया कि मातृत्व किसी महिला के सपनों की सीमा नहीं, बल्कि उसकी ताकत बन सकता है।
9 साल की बेटी की परवरिश और सरकारी नौकरी की जिम्मेदारी के बीच उन्होंने पावरलिफ्टिंग में दो पदक जीतकर जिले का मान बढ़ाया है।
सीमा के लिए जिम्मेदारी के बीच अपने अभ्यास के लिए समय निकालना आसान नहीं रहा होगा। उनकी उपलब्धि उन महिलाओं के लिए खास संदेश है, जो मां बनने और परिवार संभालने के बाद अपने सपनों को पीछे छोड़ देती हैं।
95 किलो वजन उठाकर जीता रजत पदक
बोकारो में 6 और 7 अक्टूबर को आयोजित क्लासिक बेंच प्रेस एवं डेडलिफ्ट चैंपियनशिप में झारखंड के विभिन्न जिलों से करीब 300 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
प्रतियोगिता में सीमा ने 47 किलोग्राम वर्ग के बेंच प्रेस में 35 किलोग्राम वजन उठाकर कांस्य पदक जीता। वहीं डेडलिफ्ट में 95 किलोग्राम वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। 40 वर्ष की उम्र में दो पदक जीतना उनके अनुशासन, मेहनत और आत्मविश्वास को दर्शाता है।
बेटी के लिए मां बनी सबसे बड़ी प्रेरणा
सीमा की यह सफलता उनकी 9 वर्षीय बेटी के लिए भी एक बड़ी सीख है। मां को परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के साथ अपने लक्ष्य के लिए मेहनत करते देखना बच्चे के मन में आत्मविश्वास और संघर्ष की भावना पैदा करता है।
सीमा अपने प्रदर्शन से संदेश दे रही हैं कि महिलाओं की पहचान केवल घर और नौकरी तक सीमित नहीं है। वे अपने जुनून को भी नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती हैं।
छोटे शहर की प्रतिभा को मिले प्रोत्साहन
कोलेबिरा कसरत क्लब के कोच राहुल कुमार साहू ने कहा कि क्षेत्र के बच्चों, युवाओं और महिलाओं का राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन उत्साहजनक है। ऐसे खिलाड़ियों को समाज का सहयोग और प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
सीमा इंदु सिंह की जीत सिर्फ दो पदकों की कहानी नहीं, बल्कि उस मां के हौसले की कहानी है, जिसने बेटी की परवरिश और नौकरी की जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जिंदा रखा।
