सरायकेला, प्रमोद सिंह। सरायकेला विधानसभा क्षेत्र में 80 फीसद आबादी कृषि पर आश्रित है। सिंचाई के साधन नहीं होने के कारण यहां एक ही फसल धान उगाई जाती है। इसके बाद किसान साल भर बैठे रहते हैं। सरायकेला विधानसभा क्षेत्र कृषि आधारित है। जंगल और जमीन इनकी पहचान है। पूरे विधानसभा में कृषि आधारित उद्योग-धंधे नहीं हैं। जंगल उजड़ रहे हैं। खेती सिमट रही है। सिंचाई की सुविधाओं का घोर आभाव है। किसान अन्नदाता होते हैं। सिंचाई की सुविधा नहीं होने से किसान बारिश पर निर्भर हैं। पर्याप्त बारिश नहीं होने से सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

विधानसभा चुनाव प्रचार में नारे, दावे, वादे के बीच सरायकेला विधानसभा का दर्द भी उभर रहा है। खेत प्यासे हैं। खेतिहर मजदूरों को काम नहीं मिल रहा। ऐन चुनाव के समय मजदूर पश्चिम बंगाल जा रहे हैं। वहां धान की फसल कट रही है। इसलिए जीविका की जिदोजहद चल रही है। सरायकेला विधानसभा में 2.46 लाख हेक्टेयर जमीन कृषि योग्य है। पर पांच फीसद जमीन पर ही सिंचाई की व्यवस्था है। खेती चौपट होने से खेतिहर मजदूर बाहर जा रहे हैं। पलायन करने वाले हजारों मजदूरों का कोई डाटा जिला प्रशासन तैयार नहीं कराता। रोजगार की तलाश में मजदूरों का दूसरे राज्यों में पलायन कोई नई बात नहीं है। यह सिलसिला पूरे साल चलते रहता है। चुनाव के समय भी पलायन होने से वोट फीसद प्रभावित हो सकता है।

हर दो से तीन साल पर सुखाड़

मजदूरों का पलायन राजनीतिक दलों के लिए भी एक सवाल है। नेता चुनाव में हर खेत को पानी और हर हाथ को काम का वादा करते हैं। सरायकेला में रोजगार के लिए कृषि पर ही निर्भरता ज्यादा है। हर दो से तीन साल पर किसानों को सुखाड़ से जूझना पड़ता है। इस वर्ष भी यहां के किसान अनावृष्टि का सामना कर रहे हैं। जिला में काफी सपाट जमीन है, जो कृषि उपयोग के लिए उपयुक्त है। पहाड़ी क्षेत्र ज्यादातर जंगल से घिरे हैं। जिले की प्रमुख फसलें धान, मक्का और दलहन है। सिंचाई का प्रमुख स्नोत तालाब और कुआं हैं। यदि सिंचाई की सुविधा होती, तो किसानों के साथ जिले का आर्थिक विकास भी बढ़ता। परंतु इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।

क्या कहते हैं किसान

किसानों को कोई पूछने वाला नहीं है। किसान बारिश पर आश्रित हैं। बारिश अच्छी नहीं होती है, तो खेती की संभावना भी नहीं रहती है। मशीन से पटवन कर खेती करना संभव नहीं है।

मनमोहन सिंहदेव, किसान

किसान भगवान भरोसे हैं। सिंचाई की समुचित सुविधा नहीं है। बरसात पर निर्भर रहना पड़ता है। सिंचाई की व्यवस्था हो जाए, तो खेती अच्छी होगी। जब खेती अच्छी होगी, तो किसान समृद्ध होंगे।

भरत महाकुड़, किसान

खेती से मोह भंग होते जा रहा है। महंगाई आसमान छू रही है। संसाधन विकसित हो रहे हैं, लेकिन सिंचाई की सुविधा यथावत है। खेती से पूंजी भी नहीं निकल पाती है। यहां के जनप्रतिनिधि इस तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। चुनाव आते ही बड़े- बड़े वादे कर जाते हैं। चुनाव खत्म होते सब भूल जाते हैं।

हरिहर टुडू, किसान

किसानों की चिंता किसी को नहीं है। सिंचाई सुविधा नहीं होने से जिले के किसान सिर्फ एक ही फसल पर आश्रित हैं। वह भी बरसात पर निर्भर है। बारिश अच्छी नहीं होती, तो खेती की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। भूखे मरने की नौबत आ जाती है।

चंदन महतो, किसान

 

Posted By: Rakesh Ranjan

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