डा. प्रणेश, साहिबगंज : पितृपक्ष चल रहा है। सनातन धर्म में मान्यता है कि पितृ पक्ष में तर्पण से पितरों को शांति मिलती है। अमूमन परिवार का बेटा ही यह जिम्मेदारी निभाता है। वे नदी तालाबों में जाकर दिवंगत की आत्मा की शाति को प्रार्थना कर जलार्पण करते हैं। साहिबगंज में मोक्षदायिनी गंगा बहती है। विभिन्न घाटों पर सुबह से जलार्पण को भीड़ पहुंचती है। मगर अब बेटियां भी अपने दिवंगत स्वजनों के लिए तर्पण कर रही हैं। जो जता रही हैं कि सिर्फ बेटा ही नहीं बेटी भी अपने स्वजन को मोक्ष दिलाने को हर जतन करने में सक्षम है।

साहिबगंज के बिजली घाट पर जलार्पण करने पहुंची आशा पाडेय बताती हैं कि पिछले साल भी इस परंपरा का निर्वहन किया था। आशा बिहार के भोजपुर जिले के छोटा सिमनपुरा गाव की रहनेवाली है। उनकी शादी बक्सर के कजरिया गाव के जेपी पाडेय से हुई। जेपी पाडेय पश्चिम बंगाल में पावर ग्रिड में कार्यरत हैं। मगर आशा का परिवार साहिबगंज में रहता है। वे चार बहनों में दूसरे नंबर पर हैं। भाई नहीं है। दस साल पूर्व मा भगवती देवी तो तीन साल पहले पिता आरएन ओझा नहीं रहे। आशा नित गीता व रामायण पढ़ती हैं। पितृपक्ष की महत्ता वे भी जानती हैं। तब लगा कि पिता के नाम पर कोई तर्पण नहीं करता है। उनकी आत्मा अतृप्त रह जाती होगी। बस पितृपक्ष में तर्पण का निर्णय लिया। बिजली घाट पर तर्पण करानेवाले धनेश्वर पंडित ने भी उनकी मंशा सुन प्रसन्नता जताई। वे गंगा घाट आकर तर्पण करती हैं। साहिबगंज के बड़तल्ला की रहने वाली उषा तिवारी के भी भाई नहीं है। चार साल से पितरों को तर्पण कर रही हैं। कई अन्य महिलाएं भी पितरों को तर्पण को आ रही हैं। जो दर्शा रही है कि बेटियां हर क्षेत्र में बेटों से कम नहीं। माता पिता के प्रति जितना फर्ज बेटे निभाते उतना ही बेटियां भी निभाने को तत्पर हैं।

---------------- पितृपक्ष के दौरान लोगों को अपने पूर्वजों को याद करना चाहिए तथा उन्हें जलार्पण करना चाहिए। पिता की मृत्यु के बाद यह अनिवार्य है। अब तो कुछ लोग अपनी मा के लिए भी जलार्पण करने आते हैं। ऐसा करने से मातृ तथा पितृ दोषों से मुक्ति मिली है। यहां कई महिलाएं नियमित रूप से जलार्पण करने आ रही हैं।

धनेश्वर पंडित, साहिबगंज

Edited By: Jagran