संवाद सहयोगी, कोटालपोखर (साहिबगंज) : बरहड़वा प्रखंड क्षेत्र के भीमपाड़ा गांव में मकर संक्रांति के बाद पहले रविवार को धूपची मेला लगता है। कोरोना की तीसरी लहर को देखते हुए राज्य सरकार ने सभी प्रकार के मेला पर रोक लगा दी है। सरकार के आदेश का अनुपालन के लिए एक सप्ताह पहले अंचलाधिकारी देवराज गुप्ता, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी प्रदीप उरांव, पुलिस इंस्पेक्टर कुलदीप कुमार व बरहड़वा थाना प्रभारी रवींद्र कुमार भीमपाड़ा गांव पहुंचे और मेला आयोजन कमेटी को कोरोना गाइडलाइन के तहत पूजा स्थल पर पूजा अर्चना करने को कहा था। मेला के आयोजन पर कार्रवाई करने की चेतावनी दी थी।

धूपची मेला पर प्रतिबंध की खबर लगते ही फर्नीचर कारोबारियों में मायूसी छा गई। मेला के लिए फर्नीचर बनाने का काम बंद कर दिया। धूपची मेला नहीं लगने की स्थिति में अब इन कारोबारियों को यह चिता सताने लगी है कि उनके समान की बिक्री कहां होगी? सामान नहीं बिका तो मुनाफे की बात छोड़िए पूंजी भी फंस जाएगी।

बता दें कि सौ साल से अधिक समय से भीमपाड़ा गांव में एक पीपल के पेड़ के पास सूर्य भगवान की पूजा की जाती है। यहां धर्म व आस्था के साथ महिलाएं भक्ति और श्रद्धा के पास पूजा करती हैं। आस्था के इस मंदिर में पूजा के साथ साथ एक दिवसीय मेला भी हर साल लगता है। इसमें लकड़ी से बने पलंग, चौकी, बक्सा, अलमारी, टेबुल, कुर्सी, बेंच आदि की बिक्री होती है। यहां बरहड़वा प्रखंड क्षेत्र के साथ बंगाल के भी दर्जनों कारोबारी लकड़ी से बने फर्नीचर बेचने के लिए आते हैं। एक दिन में लाखों-करोड़ों रुपये का कारोबार होता है।

इधर नुरूल इस्लाम, बबलू काठवाला, आतारी आदि फर्नीचर के कारोबारियों ने बताया कि धूपची मेला को लेकर हमलोग छह माह पूर्व से ही तैयारी में जुट जाते हैं। मेला में बेचने के लिए सामान तो तैयार कर लिया गया है। अंतिम समय में प्रशासन की ओर से मेला बंद करा दिया गया है। अब सामान की ब्रिक्री कैसे होगी, इसकी चिता सताने लगी है। इन लोगों ने बताया कि हमलोग महाजन से कर्ज लेकर लकड़ी खरीद कर लाते हैं और माल तैयार कर मेला में बेचकर उन्हें वापस कर देते हैं। अगर समान की बिक्री नहीं होती है तो हमलोग कर्ज में डूब जाएंगे।

Edited By: Jagran